इनोवेशन / अमेरिकी वैज्ञानिकों ने बनाया बच्चों की आवाज से डिप्रेशन और एंग्जाइटी का पता लगाने वाला एआई सिस्टम



Artificial intelligence can detect anxiety depression in childs speech
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Artificial intelligence can detect anxiety depression in childs speech

  • अमेरिका की वर्मोंट यूनिवर्सिटी ने इसे तैयार किया है, शोधकर्ताओं का दावा- 80 फीसदी सटीक परिणाम सामने आए
  • शोधकर्ता एलेन मैकगिनीस के मुताबिक, आठ साल से कम उम्र के बच्चों को देखकर डिप्रेशन और एंग्जाइटी का पता लगाना मुश्किल

Dainik Bhaskar

May 08, 2019, 05:50 PM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. बच्चा डिप्रेशन और बेचैनी से जूझ रहा है या नहीं यह उसकी आवाज से जाना जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस ऐसा सिस्टम तैयार किया है जो आवाज का विश्लेषण करके डिप्रेशन और बेचैनी का पता लगाता है। इसे अमेरिका की वर्मोंट यूनिवर्सिटी ने तैयार किया है। शोधकर्ता एलेन मैकगिनीस का कहना है कम उम्र के बच्चे जल्द ही डिप्रेशन से घिर जाते हैं, हमें जल्द से जल्द ऐसी स्थिति का पता लगाने की जरूरत है। 

3-8 साल की उम्र के बच्चों पर हुआ प्रयोग

  1. यह रिसर्च 3-8 साल की उम्र के 71 बच्चों पर की गई है। शोध के दौरान बच्चों के मूड का अध्ययन किया गया। उन्हें एक तीन मिनट की स्टोरी दी गई और उसे बोलने को कहा गया। शोधकर्ता जज की भूमिका में रहे। जिन्होंने केवल न्यूट्रल या निगेटिव फीडबैक ही दिया।

  2. पहले 90 और फिर 30 सेकंड रहने पर शोधकर्ता घंटी बजाते थे और पूछते थे कितनी कहानी बाकी है। यह प्रोग्राम ऐसे बनाया गया था ताकि बच्चों में तनाव की स्थिति बने। इसके बाद बच्चों का क्लीनिकल इंटरव्यू लिया गया और कई तरह के सवाल पूछे गए। इस दौरान एआई सिस्टम सफल रहा। 

  3. शोधकर्ताओं ने बच्चों की कहानियों की ऑडियो रिकॉर्डिंग को एआई सिस्टम से विश्लेषण कराया। परिणाम के तौर पर सामने आया एल्गोरिदिम बच्चों के ऐसे डिसऑर्डर को 80 फीसदी तक सटीक बताने में सक्षम है। इसके बाद उनके पेरेंट से बात करके परिणामों का मिलान किया गया। बायोमेडिकल एंड हेल्थ इंफॉर्मेटिक्स जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस सिस्टम में मौजूद एल्गोरिदिम बेहद तेज और आसान तरीके ऐसी स्थितियों का पता लगाता है। 

  4. शोधकर्ता एलेन मैकगिनीस का कहना है कि आठ साल से कम उम्र के बच्चों में डिप्रेशन और बेचैनी की पहचान हो ही नहीं पाती है। ऐसे मामलों का शुरुआत में इलाज करना जरूरी है क्योंकि इस उम्र में उनके दिमाग का विकास हो रहा होता है। इस ओर ध्यान न देने पर भविष्य में उनमें सुसाइड और जहर खाने के मामले बढ़ने का खतरा अधिक रहता है।

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