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ऋतुचक्र / सर्दी में पाचन क्षमता बढ़ती है इसलिए खाली पेट न रहें, भारी चीजें भोजन में लें और दिन में सोने से बचें



Ayurveda says change your diet according to weather
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Ayurveda says change your diet according to weather

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 07:14 PM IST

हेल्थ डेस्क. आयुर्वेद के अनुसार मौसम के बदलने पर खानपान में भी बदलाव करना जरूरी है। आयुर्वेदाचार्यों ने इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं। आमतौर पर लोग तीन ऋतुओं को ही जानते हैं लेकिन आयुर्वेद में इसे 6 भागों में बांटा गया है- शिशिर, बसंत और ग्रीष्म ऋतुओं को आदानकाल कहा जाता है। इनमें शरीर का बल और पाचन क्षमता कम होती जाती है। आदान काल में सूर्य का बल क्रमशः अधिक होता है और चन्द्रमा की सौम्यता क्रमशः कम होती जाती है; इसी के प्रभाव से शरीर का भी सौम्यांश घटता चला जाता है। वर्षा, शरद् और हेमन्त यानि सर्दी की ऋतु विसर्गकाल कहलाती हैं। इनमें क्रमशः शरीरिक बल और पाचन क्षमता बढ़ती है। इसलिए भोजन की मात्रा और भोजन का चयन इसी आधार पर करना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार वातावरण के परिवर्तन से सूर्य की रश्मियों, वायु और वातावरण की नमी की अधिकता या कमी से शरीर के त्रिदोष ( वात, पित्त और कफ ) में निरन्तर बदलाव होते रहते हैं। सर्दी की ऋतु में दिन में नहीं सोना चाहिए जबकि गर्मी की ऋतु में रात्रि में जागना नहीं चाहिए। किस मौसम में खानपान में क्या खाएं और क्या न खाएं, बता रही हैं आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. रेखा शर्मा...
 

6 प्वाइंट्स: किस ऋतु में क्या खाएं और क्या न खाएं

  1. शरद् ऋतु (आश्विन, कार्तिक माह/मध्य सितम्बर से मध्य नवम्बर ) 

    वर्षा ऋतु में शरीर में इकट्ठा पित्त शरद ऋतु में भरने लगता है। पित्त के कारण शरीर में बुखार, अतिसार, उल्टी, पेचिश और मलेरिया की आशंका बढ़ जाती है। शरीर में ऋतु प्रभाव से नमकीन गुण की वृद्धि के कारण पित्त की पाचक क्षमता कम हो जाती है और बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। आयुर्वेद में कार्तिक मास के अन्तिम 8 दिन और मार्गशीर्ष के प्रारंभिक 8 दिनों ( कुल 16 दिन ) को स्वास्थ्य की दृष्टि से ’’यमराज की दाढ़’’ जितना घातक कहा है। इस समय में विशेष रूप से बहुत हल्का भोजन लेना चाहिए। घी और दूध पित्त की तीक्ष्णता को कम करते हैं इसी कारण इस ऋतु में श्राद्धपक्ष में खीर आदि का सेवन विशेष रूप से किया जाता है। शरद् पूर्णिमा पर खीर को चन्द्रमा की शीतल किरणों में रखकर खाना भी पित्त शमन में मदद करता है।

     

    क्या करें 

    • शरद् ऋतु में विशेष रूप से हंसोदक ( दिन में धूप में तपे हुए और रात में चंन्द्रमा की शीतलमा से स्निग्ध हुए पानी ) के सेवन की सलाह आयुर्वेद के ऋषियों ने दी है। अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने पर यह पानी विशेष गुणकारी बन जाता है।
    • पचने में बेहद हल्का, मीठा, शीतल आहार सेवन करना चाहिए। 
    • कड़वी औषधियों के साथ पकाए हुए घी का सेवन करना चाहिए।
    • पित्त की उग्रता को कम करने के लिए नीम, करेला, सहजन आदि कड़वे और तुरई, लौकी, चौलाई आदि कसैले साग का सेवन करना चाहिए।
    • छिलके युक्त मूंग की दाल, परवल, आंवला, त्रिफला, मुनक्का, खजूर, जामुन, पपीता, अंजीर का सेवन करना चाहिए।
    • कपूर और चन्दन का लेप लगाएं, शरीर की मालिश और व्यायाम करना चाहिए।

  2. हेमन्त ऋतु ( मार्गशीर्ष, पौष माह/मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी ) 

    हेमन्त ऋतु बल संचय करने वाली पोषक ऋतु होती है। रातें लम्बी होती हैं और दिन छोटे; इसलिए शारीरिक परिश्रम का समय कम होने से ऊर्जा शरीर में संचित होती है। इस ऋतु में शरीर का बल सर्वाधिक और पाचक अग्नि तीक्ष्ण होती है। वातावरण की ठंड के कारण शरीर के अन्दर की गर्मी बाहर नहीं आकर अन्तर्मुखी होकर पाचक अग्नि को बढ़ा देती है। इसलिए देरी से पचने वाला भारी भोजन लेना चाहिए। खाली पेट नहीं रहना चाहिए वरना ये तीखी पाचक अग्नि शरीर को जला देती है। 

    क्या करें

    • रात लम्बी होने से सुबह पोषक आहार की जरूरत विशेष रूप से होती है। इसलिए पोषणयुक्त नाश्ता जरूर करना चाहिए। 
    • घी, दूध आदि से युक्त, देर से पचने वाला, मीठा, खट्टा, नमक युक्त भोजन करना चाहिए।
    • लड्डू, पाक, हलवा, आदि पौष्टिक आहार का सेवन करना चाहिए।
    • नया धान्य, तेल, दूध, दही, घी का सेवन, मांस, मछली, गुनगुना पानी। 
    • सिर में तेल मालिश, धूप का सेवन, योगाभ्यास, नियमित और कठोर व्यायाम करना चाहिए।
    • सौंठ, पिप्पली, त्रिफला रसायन, ब्रह्म रसायन, शिजीत रसायन, वर्धमान पिप्पली आदि का प्रयोग आयुर्वेद विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए।
    • 3 से 5 ग्राम हरड़ और सौंठ का सेवन करना चाहिए।

    क्या ना करें

    • व्रत, उपवास नहीं करना चाहिए। आहार ना मिलने पर तीक्ष्ण पाचक रस शरीर की धातुओं को पचा डालते हैं। जिससे शरीर के बल की हानि होती है।
    • दिन में सोना नहीं चाहिए।
    • खुले में व ठण्डे स्थान पर नहीं सोना चाहिए। 
    • खुले वाहन में सवारी नहीं करनी चाहिए।

  3. शिशिर ऋतु (माघ, फाल्गुन माह/मध्य जनवरी से मध्य मार्च ) 

    शिशिर ऋतु और हेमन्त ऋतु में लगभग एक जैसा भेजन और दिनचर्या अपनाई जाती है। लेकिन शिशिर ऋतु में वातावरण में तेज हवाओं के कारण रूक्षता बढ़ने लगती है। यह आदान काल की पहली ऋतु है। इस ऋतु में हेमन्त की तरह शरीर का बल सर्वाधिक और पाचक अग्नि तीक्ष्ण रहती है। इसलिए देरी से पचने वाला भारी भोजन लेना चाहिए। खाली पेट नहीं रहना चाहिए वरना ये तीखी पाचक अग्नि शरीर की धातुओं को जला देती है। 

    क्या करें

    • लड्डू, पाक, हलवा आदि पौष्टिक आहार लेना चाहिए।
    • लहसुन, अदरक की चटनी आदि लेने चाहिए।
    • दूध, घी, तिल आदि से बने पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
    • गुनगुना पानी पीना चाहिए। 
    • तेल मालिश, धूप सेवन, व्यायाम करना चाहिए।
    • 3 से 5 ग्राम हरड़ के साथ पिप्पली चूर्ण लेना चाहिए।

    क्या ना करें

    • कसैले, कड़वे, प्रकृति से ठंडे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • व्रत उपवास नहीं करना चाहिए।
    • खुले वाहनों में सवारी नहीं करनी चाहिए।

  4. बसन्त ऋतु ( चैत्र, वैशाख माह/मध्य मार्च से मध्य मई )

    शीत और ग्रीष्म ऋतु का संधिकाल बसन्त ऋतु होता है। आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में शरीर में संचित हुआ कफ बसन्त की तीखी धूप से पिघलकर स्रोतों से बाहर आने लगता है। कफ से स्रोतों के भर जाने केे कारण पाचक रसों की उत्पत्ति और उनकी कार्यक्षमता कम होने लगती है। सर्दी, जुकाम आदि कफजन्य रोग आसानी से होते हैं। शरीर में भारीपन रहता है।
    क्या करें 

    • साल भर पुराने अन्न व धान्य का सेवन करना चाहिए, नए अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • हल्का, आसानी से पचने वाला सामान्य से कम मात्रा में, शहदयुक्त भोजन करना चाहिए।
    • मूंग, मसूर, अरहर, चना का सेवन करना चाहिए।
    • बढ़े हुए कफ दोष को बाहर निकालने के लिए असयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में वमन कर्म, नस्य कर्म करवाना चाहिए।
    • कुंजल, जलनेति करना चाहिए।
    • शरीर की मालिश, हल्के गर्म पानी से स्नान, योगासन, हल्का व्यायाम, उबटन लगाना, 3 से 5 ग्राम हरड़ के साथ शहद का सेवन करना बेहतर है। 

    क्या न करें

    • ठंडी प्रकृति का, पचने में भारी, ज्यादा घी व तैल युक्त, तला भोजन, मिठाइयां नहीं खानी चाहिए।
    • नया अन्न, नया गुड़, उड़द दाल, आलू, प्याज, भैंस का दूध, दही से परहेज करना चाहिए।
    • दिन में सोना और रात में देर तक जागना नहीं चाहिए।

  5. ग्रीष्म ऋतु ( ज्येष्ठ, आषाढ़ माह/मध्य मई से मध्य जुलाई ) 

    ग्रीष्म ऋतु में तेज धूप और गर्मी के कारण शरीर का बल और सौम्य अंश कम हो जाता है। इस ऋतु में शरीर सर्वाधिक बलहीन होता है। पाचन क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है। 

    क्या करें 
    मीठा, पचने में हल्का, ठंडी तासीर वाली तरल और सुपाच्य भोजन करना चाहिए।
    दूध, मिश्री, शक्कर, लस्सी, छाछ, सत्तू का सेवन
    मौसमी, अंगूर, अनार, तरबूज आदि रसीले फल व फलों का रस, नारियल पानी, गन्ने का रस, कैरी का पना, ठण्डाई, शिकंजी का सेवन
    मूंग की दाल का सूप, गुलकंद, आम का पना, पेठा, ककड़ी, चैलाई, परवल आदि भोजन में लेने चाहिए। 
    शरीर को तरल और ठण्डा रखना चाहिए। सिर में ठंडे तेल की मालिश करनी चाहिए।
    अधिक पानी पीएं और सिर और आंखों को धूप और गर्मी से बचाएं।
    सुबह पैदल चलें और दिन में सोना चाहिए
    3 से 5 ग्राम हरड़ के साथ गुड़ का सेवन करें

     

    क्या ना करें

    • गर्म, तीखे, मसालेदार, नमकीन, खट्टे, तले हुए, कसैले, कड़वे रस वाले पदार्थ इस ऋतु में नहीं खाने चाहिए। 
    • अचार, सिरका, दही, शराब विशेष हानिकारक है।
    • धूप में रहना, अधिक व्यायाम, अधिक परिश्रम, अधिक स्त्री सहवास नहीं करना चाहिए। 
    • रात में जागना विशेष हानिकारक है।
    • धूप व गर्मी में और भूखा और प्यासा नहीं रहना चाहिए।
    • व्रत उपवास आदि नहीं करना चाहिए। 

  6. वर्षा ऋतु ( श्रावण, भाद्रपद माह/मध्य जुलाई से मध्य सितम्बर )

    वर्षा ऋतु में विसर्गकाल शुरू हो जाता है। ग्रीष्मकाल की रूक्षता के कारण शरीर में वात बढ़ी हुई होती है, जठराग्नि ग्रीष्म ऋतु से भी ज्यादा मंद हो जाती है। इसलिए इस ऋतु में अजीर्ण, अपच आदि पाचन से संबंधि रोग ज्यादा होते हैं। वर्षा के कारण सभी स्रोतों का पानी अशुद्ध रहता है। इस कारण दस्त, हैजा, पीलिया, टायफाइड, त्वचारोग आदि रोग हो सकते हैं। वर्षा ऋतु में हवा की अत्यधिक नमी और तेज धूप के प्रभाव से शरीर में पित्त की वृद्धि होने लगती है। इसलिए इस ऋतु में पित्त बढ़ाने वाले तीखे, नमकीन, तले हुए, मसालेयुक्त और खट्टे पदार्थ नहीं खाने चाहिए। नदियों में और बारिश में नहाना हानिकारक होता है।

    क्या करें 

    • पुराना अन्न और धान्य का सेवन, आसानी से पहचने वाला भोजन, घी, दूध, राबड़ी, शहद, जौ, गेंहू, साठी चावल विशेष रूप से खाने चाहिए। 
    • अजीर्ण, थकान और वात रोगों से बचाव के लिए थोड़ा शहद और तिल तेल को भोजन में शामिल करना चाहिए। 
    • पेट से जुड़े रोगों से मुक्त रहने के लिए अदरक या सौंठ और नीबू ,जामुन खाना चाहिए। 
    • पानी को उबालकर, फिटकारी से शुद्ध करके या अन्य विधियों से शुद्ध किया पानी पीना चाहिए
    • तेल मालिश करना, मच्छरों और अन्य कीटों से बचकर सोना चाहिए। त्वचा की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
    • 3 से 5 ग्राम हरड़ व सेंधा नमक लेना चाहिए

    क्या ना करें 

    • 6 घंटे से ज्यादा देर का बना खाना खाने से बचें। बिना तेल या घी का रूखा और आसानी से न पचने वाला भोजन नहीं खाना चाहिए। 
    • वर्षाजल से ताजा उगी सब्जियां खाने के कारण पालतू पशुओं का दूध भी अशुद्ध हो जाता है इसलिए इस मौसम में दूध, दही, छाछ और हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खानी चाहिए। 
    • शराब, दही, मांस, मछली सेवन नहीं करना चाहिए।
    • बिना उबला पानी नहीं पीना चाहिए। 
    • दिन में सोना, रात में जागना, खुले में नहीं सोना चाहिए।
    • अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए और धूप में ज्यादा नहीं रहना चाहिए।

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