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नेशनल एपिलेप्सी डे / दिमागी रूप से कमजोर नहीं होते मिर्गी के रोगी, दवाओं से 80 फीसदी तक इलाज है संभव



national epilepsy day 2018 myths and facts about epilepsy of mirgi
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national epilepsy day 2018 myths and facts about epilepsy of mirgi

Dainik Bhaskar

Nov 16, 2018, 07:59 PM IST

हेल्थ डेस्क. मिर्गी ऐसी बीमारी है जिसमें रोगी को अचानक दौरा पड़ता है। इस दौरान वह अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है और हाथ-पैर अकड़ने लगते हैं। शरीर कांपने लगता है और ऐंठ जाता है। इलाज करवाने पर काफी हद तक बीमारी में राहत मिल जाती है। मिर्गी मस्तिष्क से जुड़ी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। सिर पर चोट लगने, ज्यादा शराब का सेवन करने, ब्रेन ट्यूमर होने पर मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी केी स्थिति में मिर्गी का दौरा पड़ सकता है। मिर्गी को लेकर अक्सर लोगों ने मन में कई सवाल होते हैं जैसे इसके रोगी दिमागी रूप से कमजोर होते हैं  या इसका इलाज संभव नहीं है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हर साल 17 नवंबर को नेशनल एपिलेप्सी डे मनाया जाता है। इस मौके पर न्यूरोफिजिशियन डॉ. केसी कावरे बता रहे हैं इससे जुड़े भ्रम और सच...

 

भ्रम : यह एक जेनेटिक बीमारी है। 
सच :
मिर्गी के हर मामले का कारण आनुवांशिक हो, ऐसा जरूरी नहीं है। फैमिली हिस्ट्री के अलावा गंदे पानी में उगी सब्जियाें के जरिए पेट के कीड़ों के अंडे या तेज बुखार का दिमाग तक पहुंचना भी इसका कारण हो सकता है। इसके अलावा जन्म के समय दिमाग में ऑक्सीजन की कमी, अधूरी नींद, दिमागी बुखार, सिर की चोट या इन्फेक्शन भी इस बीमारी की वजह हो सकते हैं। 

 

भ्रम : मिर्गी के पेशेंट मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। 
सच : मिर्गी के रोगियों को दिमागी रूप से कमजोर माना जाता है जो एक भ्रम है। मिर्गी की स्थिति दिमाग में मौजूद न्यूरॉन्स के अधिक सक्रिय होने पर बनती है। इसका असर कुछ समय के लिए जरूर रहता है। लेकिन इससे पेशेंट स्थायी रूप मानसिक कमजोर नहीं होता। दौरे के समय मरीज छटपटाता है, मुंह से झाग निकलता और हाथ-पैर अकड़ जाते हैं लेकिन ऐसा कुछ समय के लिए रहता है।

 

भ्रम : मिर्गी पेशेंट महिला को प्रेग्नेंसी में दिक्क्त होती है। 
सच : मिर्गी के उपचार के लिए ली जाने वाली दवाओं का असर प्रजनन क्षमता पर नहीं पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान भी ऐसी कई दवाएं हैं जिन्हें लिया जा सकता है।

 

भ्रम : इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। 
सच : मिर्गी का इलाज काफी हद तक संभव है। तकरीबन 80 फीसदी मरीज एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से ही ठीक हो जाते हैं। गंभीर स्थिति में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। ऐसे मरीजों को कुछ सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है जैसे देर रात तक न जागें, तले-भुने और तेज मिर्च वाले भोजन से परहेज करें, शराब न लें, अधिक ऊंचाई वाली जगह पर जाने से बचें।

 

भ्रम: दौरा पड़ने पर मरीज को पकड़ कर रखना चाहिए।
सच : यह सही नहीं है। मरीज को जबरदस्ती न पकड़ कर रखें। दौरा पड़ने पर मरीज के गर्दन के पास के कपड़े ढीले करें ताकि उसे सांस लेने में तकलीफ न हो। मरीज को कुछ भी न खिलाएं। ऐसी स्थिति में ज्यादतर लोग मरीज के मुंह में चाबी या चम्मच रखते हैं जो गलत है। उसे एक करवट की ओर लेटा दें।
 

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