आर नानक-पार नानक /भारत-पाक में सद्‌भाव का 5वां सबसे बड़ा कदम, पाकिस्तान के वो 4 गुरुद्वारे जहां कण-कण में नानक



गुरुद्वारा ननकाना साहिब (लाहौर)। गुरुद्वारा ननकाना साहिब (लाहौर)।
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गुरुद्वारा ननकाना साहिब (लाहौर)।गुरुद्वारा ननकाना साहिब (लाहौर)।

  • दोनों देशों के बीच सद्‌भाव बढ़ाने के लिए समय-समय पर हुए थे समझौते

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 04:16 AM IST

अमृतसर। भारत और पाकिस्तान के बीच करतारपुर कॉरिडोर आपसी सद्‌भाव की और बढ़ाया गया पांचवां कदम है। इससे पहले सिंधु जल संधि, समझौता एक्सप्रेस, मैत्री बस सेवा और सीजफायर संधि जैसे सौहार्दपूर्ण कदम इस ओर उठाए गए थे। वहीं पाकिस्तान में भी चार बड़े गुरूद्वारे हैं जहां श्रद्धालु दूर-दूर से माथा टेकने आते हैं।

  • सिंधु जल संधि -1960 में नेहरू-अयूब में समझौता

    जल विवाद पर एक सफल उदाहरण है। कराची में 19 सितंबर, 1960 को पीएम नेहरू और पाक राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों में दो युद्धों के बावजूद ये संधि कायम है। सिंधु का इलाका करीब 11.2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। पाक मेें 47%, भारत (39%), चीन (8%) और अफ़गानिस्तान (6%) में है। 

  • समझौता एक्सप्रेस-1976 में अटारी-वाघा के बीच चली ट्रेन

    दोनों देशों में सौहार्द बढ़ाने के लिए 22 जुलाई 1976 को अटारी-लाहौर के बीच शुरू की गई थी। समझौता एक्सप्रेस अटारी-वाघा के बीच 3 किमी का रास्ता तय करती है। इस ट्रेन के लोको पायलट और गार्ड चेंज नहीं होते। शताब्दी और राजधानी जैसी ट्रेनों के ऊपर प्राथमिकता दी जाती है। फिलहाल ट्रेन बंद है।

  • मैत्री बस सेवा- करगिल युद्ध में भी बस बंद नहीं की

    19 फरवरी 1999 को मैत्री बस की शुरुआत की गई। शुभारंभ पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। वह पाक भी गए थे। 1999 में जब कारगिल हुआ, तो भी बस को बंद नहीं किया गया। हालांकि, 2001 में संसद पर हमले के इसे रद्द कर दिया गया। यह 2003 में फिर से चली। फिलहाल, बस सेवा है।

  • सीजफायर संधि- सीमा पर शांति के लिए बढ़ाए हाथ

    सीमा पर शांति के लिए दोनों देशों ने 2003 में युद्धविराम का ऐलान किया था। 25 नवंबर 2003 की आधी रात से युद्धविराम लागू हुआ था। अटल बिहारी वायपेयी की पहल के बाद एक औपचारिक युद्धविराम का ऐलान किया था। हालांकि, इसका कभी-कभी उल्लंघन भी किया जा रहा है। 

  • गुरुद्वारा ननकाना साहिब (लाहौर)

    लाहौर से करीब 80 किलोमीटर दूर गुरु नानक जी का जन्म स्थान है। पहले इसे राय भोए दी तलवंडी के नाम से जानते थे। नानक जी के जन्म स्थान से जुड़ा होने से अब यह ननकाना साहिब बन गया है। गुरुद्वारा ननकाना साहिब लगभग 18,750 एकड़ में है। ये जमीन तलवंडी गांव के एक मुस्लिम मुखिया राय बुलार भट्टी ने दी थी।

  • गुरुद्वारा पंजा साहिब (रावलपिंडी)

    रावलपिंडी से 48 किलोमीटर दूर है। बताते हैं कि एक बार गुरु जी अंतरध्यान में थे, तभी वली कंधारी ने पहाड़ के ऊपर से एक विशाल पत्थर को गुरु जी पर फेंका। जब पत्थर उनकी तरफ आ रहा था तभी गुरु जी ने अपना पंजा उठाया और वह पत्थर वहीं हवा में ही रुक गया। इस कारण गुरुद्वारे का नाम ‘पंजा साहिब’ पड़ा। आज भी पंजे के निशान ज्यों के त्यों है।

  • करतारपुर साहिब (नारोवाल)

    सिखों के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। गुरु नानक 4 यात्राओं को पूरा करने के बाद यहीं बसे थे। यहां उन्होंने हल चलाकर खेती की। गुरु जी अपने जीवन काल के अंतिम 18 वर्ष यहीं रहे और यहीं अंतिम समाधि ली। यहीं गुरु जी ने रावी नदी के किनारे ‘नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ का उपदेश दिया था। लंगर की शुरुआत भी यहीं से हुई थी। यह नारोवाल जिले में है।

  • गुरुद्वारा चोआ साहिब (पंजाब प्रांत)

    यहां श्री गुरु नानक देव जी ठहरे थे, यह जगह 72 साल बाद 550वें प्रकाश पर्व पर श्रद्धालुओं के लिए खोली गई है। यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मौजूद है। इस गुरुद्वारा साहिब को महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाने का काम शुरू किया था, जो 1834 में बनकर पूरा हुआ। 72 वर्ष बंद रहे इस गुरुद्वारे में बनी भित्ति चित्रकला लगभग लुप्त हो चुकी है।

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