साहस / 21 तस्वीरों में दिखाया निहंगों की जिंदगी को



In the exhibition, showing the life of Nihang Sikhs
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In the exhibition, showing the life of Nihang Sikhs
In the exhibition, showing the life of Nihang Sikhs
In the exhibition, showing the life of Nihang Sikhs

  • सिख कौम के निहंग सिखों के जीवन को फोटो में दर्शाया
  • श्री आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला, राडा साहिब से जुड़ी तस्वीरें हैं

Dainik Bhaskar

Sep 06, 2019, 10:01 AM IST

चंडीगढ़. पंजाबी कल्चर को अपने कैमरे की नजर से फोटोग्राफर देवेंद्र सिंह रंगी ने दिखाया है। सेक्टर-35 के प्राचीन कला केंद्र की गैलरी में उनकी सोलो एग्जिबीशन "निहंग- द खालसा ट्राइब' लगाई गई, जिसमें उन्होंने निहंगों की दुनिया को अपनी रियलिस्टिक फोटोग्राफी से बयां किया है।

 

यहां उनकी खींची 21 तस्वीरों को डिस्प्ले किया गया, जिसमें निहंगों का रहन-सहन, पहरावा, रोजमर्रा की जिंदगी, उनके हथियार, घोड़े से लेकर खाना-पीना आदि को दिखाया गया है। वह बताते हैं- यह मेरी दूसरी फोटो एग्जिबीशन है। 2016 से निहंगों को लेकर फोटोग्राफी कर रहा हूं। यहां उसे ही मैंने दर्शाया है। वह जो भी करतब करते हैं, गतका खेलते हैं। उन्हीं सब चीजों को फोटोग्राफी से दिखाने की कोशिश की है।

 

इसमें आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला, राडा साहिब जैसी अलग-अलग जगह से जुड़ी तस्वीरें हैं। जहां जाकर मैंने फोटोग्राफी की। बताया कि मेरी पहली एग्जिबीशन पंजाब के पिंड व कल्चर पर थी, जैसे पुराने-कच्चे घर, छप्पड़, थड्‌डे विच बैठे हुए बाबे। तब पुराने पिंड के उसी कल्चर को दिखाने की कोशिश की थी।

 

पंजाबी कल्चर को फोटोग्राफी से दिखाने का काेई खास कारण? देवेंद्र बताते हैं- मैं पंजाब के पिंड से ताल्लुक रखता हूं। उस मिट्‌टी से जुड़ा हुआ हूं और वहां की चीजों को देखकर बड़ा हुआ हूं। इतिहास से जुड़ी ऐसी दर्जनों चीजों के बारे में लोगों को पता नहीं है। जैसे निहंग सिख धर्म का हिस्सा है। ऐसी कई चीजों को अपनी फोटोग्राफी से दिखाने की कोशिश की है, ताकि लोगों को जागरूक कर सकूं।

 

इसलिए खास होते हैं निहंग
देवेंद्र ने बताया- लोग निहंगों की छवि का गलत आंकलन कर बैठते हैं। उन्हें लगता है यह काफी गुसैल मिजाज के होते हैं। पर असलियत में वह इसके विपरीत होते हैं। यह काफी निड़र, अच्छे व्यक्तित्व वाले और मिलनसार होते हैं। हमेशा वह चढ़दी कला में रहते हैं।

 

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की लाड़ली फौज के रूप में इन्हें जाना जाता है। दलों के जत्थेदार एक निहंग को चार से पांच घोड़े संभालने को देते हैं। इसके बाद वह निहंग की जिम्मेदारी बन जाते हैं। निहंग उन घोड़ों को अपने बच्चों की तरह रखता है।

 

इसके अलावा वह एक-दूसरे से कोड लैंग्वेज में बातें करते हैं। अगर हम कहते हैं एक बंदा आ गया तो उसे वो सवा लाख फौज आ गई कहकर संबोधित करते हैं। सिर पर दुमाला बांधते हैं, जो दस से 100 मीटर तक का होता है।

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