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पराली को बायो या ग्रीन कोल में बदलेगा नाबी, स्वीडिश सरकार की मदद से प्रोजेक्ट शुरू

8 महीने पहले
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पराली से ग्रीन कोल बनाया जाएगा। डेमो फोटो
  • मोहाली स्थित नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट और स्वीडिश कंपनी इस प्रोजेक्ट पर काम करेगी
  • इस तकनीक की मदद से पराली जलाने के कारण जलने वाले कार्बन को 95 फीसदी तक रोका जा सकेगा

चंडीगढ़.  

मोदी और स्वीडिश किंग काल ने की शुरूआत
स्वीडन सरकार की मदद से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की शुरुआत सोमवार की शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्वीडिश किंग काल 16वें गुस्ताफ ने बटन दबाकर की। इनोवेशन पॉलिसी पर हाई लेवल पॉलिसी डायलॉग के दौरान इसे लाॅन्च किया गया। इसमें गवर्नमेंट प्राइवेट सेक्टर और एकेडमी के लोग जॉइंट इनोवेशन पॉलिसी फॉर्मूलेशन के लिए काम करेंगे। नाबी के डायरेक्टर टीआर शर्मा ने बताया कि मोहाली कैंपस में जो सिस्टम लगाया गया है, उसमें पराली को ग्रीन कॉल में तब्दील कर दिया जाएगा जो फॉसिल फ्यूल के अल्टरनेट के तौर पर उपयोग किया जाएगा। यह इंडो स्वीडन कोलेबोरेशन के तहत होगा।




नाबी ने स्वीडिश कंपनी बायो एंडेव एबी के साथ इसके लिए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग साइन किया है। वह अपना प्लांट नाबी सीआईएबी में लगा रहे हैं। इसमें न सिर्फ पराली बल्कि अन्य तरीके का एग्रीकल्चर बेस्ट जैसे मक्के की बचत, गन्ने की बचत, दालों की बचत और गेहूं की बचत को भी हाई एनर्जी डेंसिटी बायोकोल में तब्दील किया जा सकेगा। इसकी मदद से पराली जलाने के कारण जलने वाले कार्बन को 95 फीसदी तक रोका जा सकेगा।


पराली जलाने के कारण हर साल करोड़ों रुपए का कार्बन धुआं हो जाता है और जमीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है। इसके साथ ही पराली जलाने के बाद होने वाला धुआं लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। अभी तक जो भारतीय तकनीक इसके लिए उपलब्ध है, वह सस्ता विकल्प नहीं है। हालांकि, कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने इससे कोयला बनाने, सेल्यूलोज निकालने और ईट बनाने वाला काम किया है लेकिन इन तकनीकों को कमर्शियल करने के लिए आगे सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया।

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