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पत्थर मेला / दो गांव के दो गुटों में आधा घंटा पथराव, चोट लगना माना जाता है सौभाग्य



मेले में एक ओर राज परिवार की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थरबाजी में भाग ले सकते हैं। शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है। मेले में एक ओर राज परिवार की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थरबाजी में भाग ले सकते हैं। शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है।
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मेले में एक ओर राज परिवार की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थरबाजी में भाग ले सकते हैं। शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है।मेले में एक ओर राज परिवार की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थरबाजी में भाग ले सकते हैं। शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है।

  • शिमला से 30 किमी दूर हलोग धामी में हर साल दिवाली के दूसरे दिन निभाई जाती है परंपरा
  • जब तक किसी का खून न बहने लगे, तब तक पत्थरबाजी नहीं रुकती है, दूर-दूर से देखने आते हें लोग
  • पहले नरबलि की परंपरा थी, राजा की मौत के बाद पशुबलि, फिर इसकी जगह इस मेले ने ले ली

Dainik Bhaskar

Nov 10, 2018, 03:07 AM IST

शिमला. हिमाचल प्रदेश में शिमला से 30 किमी दूर हलोग धामी गांव में हर साल परंपरागत रूप से दिवाली के दूसरे दिन पत्थर मेला लगता है। पत्थर का ऐसा अजीब खेल, जब तक खून न बहने लगे, तब तक पत्थरबाजी नहीं रुकती है। गुरुवार को इस मेले में हजारों लोग जुटे।

 

stone fair

 

धामी रियासत के राजा जगदीप सिंह के पहुंचते ही दो गुटों के बीच पत्थर चलने शुरू हो गए। आधे घंटे तक चली पत्थरबाजी के बाद जमोगी गांव के सुरेश को माथे पर पत्थर लगा और उसके खून से मां भद्रकाली का अभिषेक किया गया। मेले में पत्थर लगना सौभाग्य की बात मानी जाती है। धामी गांव में लगने वाला यह मेला प्रसिद्ध है, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं।

 

नरबलि के बाद पशुबलि, अब पथराव : पहले यहां हर साल नरबलि दी जाती थी। राजा की मौत के बाद रानी सती हो गई। मरते समय रानी ने यहां पर नरबलि बंद करवा दी। इसके बाद पशुबलि शुरू हुई। फिर इसे भी बंद कर दिया। अब पत्थर मेला शुरू किया गया।

 

पत्थरबाजी के लिए दो टोलियां ही मान्य : एक ओर राज परिवार की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थरबाजी में भाग ले सकते हैं। बाकी लोग केवल मेला देख सकते हैं। मेले की शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है।
 

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