चंडीगढ़ / चाय से कीमोथेरेपी का साइड इफेक्ट 80% तक होगा कम, डॉ. एन गणेश ने 25 कैंसर मरीजों पर हुई रिसर्च को किया साझा

देश के एकमात्र ऑनकोज जेनेटिक्स कंसल्टेंट हैं डॉ. गणेश देश के एकमात्र ऑनकोज जेनेटिक्स कंसल्टेंट हैं डॉ. गणेश
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देश के एकमात्र ऑनकोज जेनेटिक्स कंसल्टेंट हैं डॉ. गणेशदेश के एकमात्र ऑनकोज जेनेटिक्स कंसल्टेंट हैं डॉ. गणेश

  • भोपाल के डॉ. एन गणेश पंजाब यूनिवर्सिटी में आयोजित ‘आईकॉनिका 2020’ की प्री वर्कशॉप में एक्सपर्ट के तौर पर पहुंचे
  • साल 2000 से  डॉ. गणेश हर तरह के कैंसर खासतौर पर अनुवांशिक कैंसर की रिसर्च में काम कर रहे हैं

Dainik Bhaskar

Feb 13, 2020, 01:40 PM IST

चंडीगढ़. कोलोन कैंसर हो या कोई भी अन्य कैंसर, उपचार तो संभव है। लेकिन कीमोथेरेपी के दौरान स्वस्थ सेल मरने और इसके ढेरों साइड इफेक्ट के कारण मरीज का बचना मुश्किल हो जाता है। इसी साइड इफेक्ट को रोकेगी जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. एन गणेश की चाय।

वे देश के एकमात्र ऑनकोज जेनेटिक्स कंसल्टेंट हैं। उनके रिसर्च संबंधित योगदान के लिए 26 फरवरी को मिनिस्ट्री ऑफ ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट उन्हें सम्मानित भी करने जा रहा है। पंजाब यूनिवर्सिटी में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ‘आईकॉनिका 2020’ की प्री वर्कशॉप में वे एक्सपर्ट के तौर पर पहुंचे थे।

डॉ. गणेश हर तरह के कैंसर खासतौर पर अनुवांशिक कैंसर की रिसर्च में काम कर रहे हैं। वे 2000 से इस दिशा में काम कर रहे हैं। इससे पहले डॉ. गणेश ने कोलोन कैंसर की टारगेटेड ड्रग डिलीवरी के प्रोजेक्ट में कामयाबी से काम किया है। कोलोन कैंसर को रिसर्च के लिए डेवलप करना अपने आप में चैलेंज था।

मुंबई यूनिवर्सिटी की एक वैज्ञानिक डॉ कमलेंद्र ने टारगेटेड दवा तैयार की थी। बहुत कोशिश के बाद वे चूहों के मॉडल में कैंसर डेवलप कर नहीं पाए। कैंसर डेवलप हुआ लेकिन कहीं स्किन का, कहीं यूटरस का और कहीं पेट का। वे लगभग हिम्मत हार चुके थे और उन्हें लग रहा था कि अब कंसल्टेंसी फीस के साथ-साथ सम्मान भी जाएगा।

उसी रात उन्होंने अपनी एक नई तकनीक के जरिए कोलोन कैंसर डेवलप किया और बाद में टारगेटेड दवा भी उसके कैंसर ग्रस्त हिस्से तक पहुंची। अब टारगेट बेस ड्रग डिलीवरी सिस्टम में जॉइंट रिसर्च, डायग्नोज के साथ-साथ वह कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव रोकने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने देसी दवाओं की मदद से एक चाय तैयार की है।

इसका स्वाद कॉफी और चाय दोनों के तौर पर हो सकता है। लेकिन इसमें न तो पारंपरिक चाय है और न ही कॉफी। इनमें किसी तरह की शुगर या गन्ने से तैयार गुण व शक्कर का उपयोग भी नहीं है। हालांकि ताड़ के पेड़ का गुड़ और सोंठ आदि का उपयोग किया गया है।


कैंसर के बार-बार लौटने की वजह से ज्यादा मरीजों की मौत होती है
इन देसी दवाओं से तैयार चाय और कॉफी को रेगुलर कीमोथेरेपी या रेडियोथैरेपी करवा रहे पेशेंट को दिया जाए तो उसके ऊपर इन दवाओं के साइड इफेक्ट को 80 से 85 फीसदी तक रोका जा सकता है। कैंसर से कहीं ज्यादा उसकी दवाओं के साइड इफेक्ट और स्वस्थ सेल के मरने के कारण कैंसर के बार-बार लौटने की वजह से कैंसर मरीजों की मौत ज्यादा होती है।

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