चंडीगढ़ / डॉ. पंकज की रिसर्च के आधार पर तलाशी जा रही 'जीका' की दवा

साइंटिस्ट डॉ. पकंज सेठ साइंटिस्ट डॉ. पकंज सेठ
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साइंटिस्ट डॉ. पकंज सेठसाइंटिस्ट डॉ. पकंज सेठ

  • ई-प्रोटीन की वजह से शरीर में 'ग्रो' करता है जीका वायरस, रोकता है सिर की ग्रोथ, पीयू पहुंचे एनबीआरसी के साइंटिस्ट्स ने दी जानकारी
  • पीयू में किया शेयर: अब इसी के आधार पर वैक्सीन बनाने पर हो रहा काम, एचआईवी पर रिसर्च करते हुए आया आइडिया

दैनिक भास्कर

Nov 16, 2019, 12:07 PM IST

चंडीगढ़. 'डेंगू' के मच्छर की वजह से फैसले वाले 'जीका' वायरस के इंसानी शरीर में प्रवेश की वजह से बनने वाले 'एनवलप प्रोटीन' (ई-प्रोटीन) को कंट्रोल करने के लिए इस समय भारत और यूएसए सहित विदेशों में भी रिसर्च चल रही है।


बीते अगस्त में ही नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर (एनबीआरसी) के साइंटिस्ट डॉ. पंकज सेठ ने अपनी रिसर्च के जरिए साबित किया है ई प्रोटीन इसका कारक है और इसी को आधार मानते हुए सभी देश इसकी वैक्सीन डिवेलप करने में जुटे हैं।

 

पंजाब यूनिवर्सिटी स्थित यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल स्टडीज (यूआईपीएस) में इंटरनेशनल ब्रेन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इब्रो) के स्कूल में रिसोर्स पर्सन के तौर पर पहुंचे डॉ सेठ ने यह जानकारी दी।

 

उन्होंने बताया कि उनकी लैब लंबे समय से एचआईवी वायरस पर काम कर रही है और इसी पर काम करते हुए आइडिया आया कि जीका भी वायरस ही है और उन्होंने अपनी लैब में स्टेम सेल पर एचआईवी की बजाए और जीका वायरस डाला और इसको स्टडी करना शुरू किया।

 

वायरस के कई हिस्से हैं और सभी की वर्किंग देखती। देखा कि वायरस का ई-प्रोटीन यानि बाहरी हिस्सा शरीर में प्रवेश करता है जिसकी वजह से गर्भ में पल रहे बच्चे का सिर छोटा हो जाता है। उनकी इस रिसर्च को आधार मानते हुए ही अब ई-प्रोटीन को कंट्रोल करने वाली वैक्सीन तैयार करने पर काम चल रहा है।


डॉ सेठ बताते हैं कि यूएसए में रहते हुए उन्होंने देखा कि एचआईवी एड्स वायरस के बाद भी लोग अब सामान्य जिंदगी जीते हैं। यहीं पर रिसर्च के दौरान ख्याल आया कि एचआईवी वायरस ब्रेन में जाकर क्या करता है, इसे देखे लेकिन कई लोग इसके खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि इस बारे में काम करने की जरूरत नहीं क्योंकि मरीज तो मर ही जाने हैं।

 

इसका पक्का इलाज बेशक नहीं है लेकिन इसको कंट्रोल करने वाली दवाइयां मौजूद हैं। लेकिन मरीज ये दवा एक दिन भी छोड़ नहीं सकता। रिसर्च की तो पता लगा कि एचआईवी का वायरस दिमाग में भी पहुंचता है और बार-बार ये बीमारी लौटती है क्योंकि दवा शरीर के बाकी हिस्से तक तो पहुंचती लेकिन ड्रग्स ब्रेन तक नहीं पहुंचती।

 

क्या है जीका वायरस: जयपुर में सबसे पहले रिपोर्ट हुआ जीका वायरस एक वायरल इंफेक्शन करता है जिससे बुखार, रैशेज, सिरदर्द होता है। अडल्ट के लिए ये सामान्य इंफेक्शन है लेकिन यदि गर्भवती महिलाओं को पहले ट्रिमेस्टर में होता है तो बच्चे के सिर का विकास रुक जाता है या गर्भपात हो जाता है। इनका कोई इलाज नहीं है। ये मच्छर दिन में काटता है। भारत के अलावा 79 अन्य देशों में भी ये पाया जाता है।


135 मामले सामने आने पर भारत में इसे समस्या माना गया:
एचआईवी पर ये रिसर्च चल ही रही थी कि 2015 में जीका वायरस दुनिया भर में फैला और छोटे सिर वाले लगभग एक हजार बच्चे ब्राजील में पैदा हुए। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु में लगभग 135 मामले सामने आने के बाद भारत में इसे समस्या माना गया। कुछ समय के लिए पर्यटन भी प्रभावित हुआ। इसलिए इस वायरस पर भी काम किया। इस बीच पता लगा कि छोटे सिर वाले इन बच्चों की मांओं को वायरल इंफेक्शन हुआ था। यदि पहले तीन महीनों में यदि इन महिला को ये इंफेक्शन हो जाए तो बच्चों का हैड साइज छोटा होगा। ये ब्रेन स्टेम सेल को प्रभावित करता है और ब्रेन की डवलपमेंट को रोकता है। एचआईवी की प्रोटीन की बजाए जीका की प्रोटीन को डाला। ई-प्रोटीन स्टेम सेल को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है अौर बच्चे का सिर सामान्य रूप से नहीं बढ़ पाता।

 

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