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भूत-प्रेत को भगाने के लिए दी जाती हैं गालियां, कुल्लू के पलदी में मनाया जाता है उत्सव

7 महीने पहले
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कुल्लू में भूत पिचाश भगाने के लिए मनाया जाता है अजीब कार्यक्रम
  • महिला, बच्चे और बुजूर्ग एक साथ होते हैं उत्सव में शरीक
  • मुखौटे पहनकर अश्लील जुमले कसते हैं और करते हैं देव नृत्य

कुल्लू (गौरीशंकर). कुल्लू जिले की दुर्गम पलदी घाटी में एक ऐसा उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अश्लील गालियां देने का प्रचलन है। उत्सव में महिला, बच्चे, बुजूर्ग एक साथ शिरकत करते हैं लेकिन  अश्लीलता परोसने वाले इस उत्सव वाले दिन उफ तक नहीं करते। दरअसल, यह उत्सव देव परंपरानुसार मनाया जाता है।


मान्यता है कि इस उत्सव में अश्लील जुमलों का प्रयोग कर भूत पिशाच को भगाया जाता है। लिहाजा पलदी में पारंपारिक वस्त्र पहनकर और मुंह पर प्राचीन मुखौटे पहन वो अश्लील जुमले कसते गए। इस बार भी हजारों की भीड़ इस उत्सव का गवाह बनी।


घाटी के करथा और वासुकी नाग को समर्पित पलदी फागली उत्सव में प्राचीन दैवीय परंपरा का निर्वाहन किया गया। अश्लील जुमले कसते हुए ढोल नगाड़ों की थाप पर हारियानों ने मडियाहला (मुखौटा) नृत्य किया और पुरानी परंपरा का निर्वाहन किया गया। इस परंपरागत दैवीय रिवायत और प्राचीन नृत्य को देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ी। इस फागली उत्सव में क्षेत्र के विशेष देवताओं से जुडे़ लोगों व कारकूनों बीठ मडियााहली पहन कर परंपरा निभाते हुए अश्लील जुमले सुनाए।


आधी रात बीत जाने के बाद उत्सव के दौरान मरोड गांव से करीब 100 फुट लम्बी जलती मशाल ढोल नगाड़ों के साथ थाटीबीड गांव लाई गई। मुखौटाधारियों हारियानों ने इस दौरान दहकते अंगारो पर कूदकर नृत्य किया गया। यह दैवीय नृत्य कई घंटो तक चला परन्तु दहकते अंगारों से किसी को कोई नुकसान नहीं होता देख लोग दंग रह गए।


मान्यता है कि पोष महीने में यहां के देवी-देवता स्वर्ग प्रवास पर होते हैं और क्षेत्र में भूत-प्रेतों का वास रहता है। देवता वासुकी के हारियानों की माने तो प्राचीन काल से उनके पूर्वज हर्षोल्लास के साथ इस फागली उत्सव को मनाते आ रहे हैं। इस फागली उत्सव कि विशेषता यह है कि जब पूरे हिमाचल में देवता अपने स्वर्ग प्रवास पर होते है तो बंजार के पलदी में देवता करथनाग, वासुकी नाग स्वर्ग प्रवास पर न जाकर हारियानों के बीच रह कर इस अनोखे पर्व को निभाने की रस्म अदा करते हैं। उनके अनुसार प्रदेश का यह एक ऐसा उत्सव है जहां देवता अपने देवलूओं के साथ अदभुत नृत्य पेश कर सदियों से चली आ रही लोक परंपरा का निर्वाहन करते हैं।

महाभारत के युद्ध का वर्णन करते हैं
इस दौरान साठ मढिय़ाल्ले (मुखौटाधारियों) ने देवता करथा नाग व बासुकी नाग के समक्ष रामायण व महाभारत काल के युद्ध का वर्णन कर नृत्य किया। देव परंपरा के अनुसार यह उत्सव देवताओं व राक्षसों के रामायण व महाभारत काल के युद्ध के स्वरूप को दोहराता है। खास कर समुंद्र मंथन का जिक्र भी इस उत्सव में होता है।

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