लापरवाही / मरीज काे था जॉन्डिस, आईजीएमसी के डाॅक्टर देते रहे सिट्राजिन

अाईजीएमसी की डायग्नोज स्लिप अाईजीएमसी की डायग्नोज स्लिप
निजी अस्पताल की टेस्ट रिपोर्ट निजी अस्पताल की टेस्ट रिपोर्ट
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अाईजीएमसी की डायग्नोज स्लिपअाईजीएमसी की डायग्नोज स्लिप
निजी अस्पताल की टेस्ट रिपोर्टनिजी अस्पताल की टेस्ट रिपोर्ट

  • हफ्ते भर देते रहे खुजली की दवाई, मरीज को जब फर्क नहीं पड़ा तो पहुंचा निजी अस्पताल, वहां टेस्ट में निकला जॉन्डिस
  • आईजीएमसी के डाक्टर्स की इस लापरवाही से मरीज की जान भी पड़ सकती थी खतरे में

दैनिक भास्कर

Jan 08, 2020, 02:26 PM IST

शिमला. शरीर में खुजली हाेने के बाद अाईजीएमसी में जांच के लिए पहुंचे एक पेशेंट काे डाॅक्टर सिट्राजिन देते रहे। सिट्राजिन से पेशेंट की खुजली ताे ठीक नहीं हुई, उल्टा मरीज का जॉन्डिस बढ़ गया। ऐसा नहीं है कि मरीज के टेस्ट नहीं हुए।

आईजीएमसी में बाकायदा टेस्ट भी करवाए, मगर इसमें केवल ब्लड से संबंधित टेस्ट करवाए, जॉन्डिस का टेस्ट करवाया ही नहीं। करीब एक सप्ताह तक जब मरीज की खुजली ठीक नहीं हुई ताे पेशेंट निजी क्लीनिक में पहुंचा, वहां पर उसने जांच करवाई ताे पता चला कि उसे जॉन्डिस हाे गया है।

ऐसे मरीज काे फिर जॉन्डिस की दवा दी गई। अभी भी मरीज की हालत ठीक नहीं है। डाॅक्टराें ने मरीज काे पूरी तरह से आराम की सलाह दी है। मरीज काे ठीक हाेने में अभी एक से डेढ़ सप्ताह का समय लग सकता है। आईजीएमसी में पहुंचे सतनाम को पहले डाॅक्टर ने लीवाे सिट्राजिन लिखी, जाेकि एलर्जी हाेने पर दी जाती है। जब सतनाम की तबीयत नहीं सुधरी वे दोबारा आईजीएमसी पहुंचे तो डॉक्टर ने उनकी डोज की मात्रा बढ़ा दी लेकिन तबीयत नहीं सुधरी।


एसजीओटी और एसजीपीटी में बढ़ाेतरी लीवर में इंफेक्शन के संकेत है। यह जॉन्डिस के लक्षण हैं। एसजीओटी की सामान्य रेंज 8-40 हाेती है जबकि रिपाेर्ट में 72 है। इसी तरह एसजीपीटी की सामान्य रेंज 3-41 रहती है जबकि रिपाेर्ट में यह 88 है। इसका मतलब पेशेंट काे शुरुआती जॉन्डिस है। दूसरी ओर आईजीएमसी शिमला के एमएस डॉ. जनकराज के मुताबिक मुझे इस तरह के मामले की काेई शिकायत नहीं मिली है। मरीज काे अगर काेई गलत दवाई दी गई है ताे वह इसकी शिकायत मुझे दें। मैं मामले में जांच बिठाउंगा। दाेषियाें पर कार्रवाई की जाएगी। यहां पर डाॅक्टराें की काेशिश रहती है कि मरीज काे सही अाैर समय पर इलाज मिले। लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। 


जब पेशेंट ने बताया कि दवाई से फर्क नहीं पड़ा तो डॉक्टर ने सिट्राजिन की डोज बढ़ाने को कहा: कुफ्टाधार के रहने वाले सतनाम ने बताया कि उनके शरीर में छाेटे छाेटे लाल रंग के दाने हाे गए और उसमे खुजली हाे रही थी, जिसके चलते वह 26 दिसंबर काे वह आईजीएमसी के स्किन डिपार्टमेंट में पहुंचे। यहां पर उन्हाेंने डाॅक्टर काे दिखाया ताे डाॅक्टर ने उन्हें कुछ टेस्ट लिखे और शरीर में लाल रंग के दाने देखकर सिट्राजिन खाने के लिए दे दी। सतनाम ने आराेप लगाया कि 28 दिसंबर काे वह ब्लड टेस्ट रिपाेर्ट लेकर दाेबारा स्किन डिपार्टमेंट में गए ताे डाॅक्टर ने रिपाेर्ट देखी और कहा कि रिपाेर्ट में कुछ नहीं है। मगर शरीर में अगर खुजली हाे रही है उन्होंने ताे सिट्राजिन की हैवी डाेज दे दी।

सतनाम का कहना है कि वह राेज उस दवाई काे खाते रहे, मगर ना ताे खुजली ठीक हुई और ना ही लाल रंग के दाने। उन्हाेंने कहा कि जब एक सप्ताह तक उन्हें फर्क नहीं पड़ा और बीमारी बढ़ने लगी ताे 3 जनवरी काे उन्हें मिडल बाजार स्थित निजी क्लीनिक में डाॅक्टर काे अपनी बीमारी बताई। वहां डाॅक्टर ने सबसे पहले जॉन्डिस का टेस्ट लिखा। टेस्ट रिपाेर्ट में जॉन्डिस आया। उसके बाद अब दवाई से कुछ फर्क पड़ रहा है। अभी भी डाॅक्टर ने उन्हें आराम की सलाह दी है। मरीज का कहना है कि अगर आईजीएमसी में ही उन्हें जॉन्डिस टेस्ट लिख देते ताे उन्हें इतनी परेशानी नहीं हाेती।


जॉन्डिस है खतरनाक बीमारी: जॉन्डिस एक खतरनाक बीमारी है। इससे पूरा शरीर टूटने लगता है। शुरूआत में मरीज की टांगाें और शरीर में दर्दें हाेती है। उसे बार-बार उल्टी का मन करता है। इसके अलावा उसकी आंखें और शरीर पीला पड़ने लगता है। मरीज की भूख पूरी तरह से खत्म हाे जाती है और खून का पानी बनना शुरू हाे जाता है। अगर समय पर जॉन्डिस की जांच और इलाज ना हाे ताे मरीज की जान तक जा सकती है या फिर किडनी तक फेल हाे जाती है।

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