हिम्मत रही कायम / 3 घंटें माउंट एवरेस्ट पर जाम में फंसे, अाॅक्सीजन हुई खत्म, लेकिन जिद ने जिताया एवरेस्ट



Stranded at Mt. Everest for 3 hours, oxygen finished yet scaled it.
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Stranded at Mt. Everest for 3 hours, oxygen finished yet scaled it.
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  • एचपीयू के स्टूडेंट रह चुके हैं, लाहाैल के रहने वाले एनएसजी के कमांडाें महेंद्र लेगदाे
  • यूथ से कहा नशा छोड़ना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने से ज्यादा आसान

Dainik Bhaskar

May 28, 2019, 11:19 AM IST

शिमला. पहाड़ जितने खामाेश हाेते हैं, उतने ही खतरनाक हाेते हैं। इसकाे जीतने की जिद जाे करते हैं, उनमें हाैसला हाेना जरूरी है। बिना हाैसले के ये पहाड़ नहीं जीते जा सकते हैं। एेसी ही जिद अाैर हाैसले के साथ माउंट एवरेस्ट जैसे पहाड़ काे भी जीता जा सकता है।

 

एचपीयू के स्टूडेंट रहे अाैर बीएसएफ, एनएसजी के कमांडाें महेंद्र लेगदाे ने माउंट एवरेस्ट काे फतह कर नया इतिहास रचा है। उन्हाेंने बताया कि मैं एवरेस्ट पर लगे जाम में करीब तीन घंटें फंसा रहा। मेरी अाॅक्सीजन खत्म हाे गई। मैंने हाैसला रखा। मन में एक ही बात थी, एवरेस्ट काे जीतना है।

 

किस्मत से मुझे एक साथी ने अाॅक्सीजन उपलब्ध करवा दी। उसके बाद मैं एवरेस्ट के शिखर पर था। महेंद्र लेगदाे ने कहा कि हम 1 अप्रैल काे दिल्ली से नेपाल की अाेर निकले। इसके बाद हमने चढ़ाई शुरू की। बेस कैंप पर पहुंचने के बाद, मैंने अपने 17 साथियाें के साथ 22 मई काे एवरेस्ट पर देश का तिरंगा लहराया।


महेंद्र कहते हैं कि अाप विश्वास नहीं कराेगे कि एवरेस्ट जैसी चाेटी पर भी जाम लग सकता है। यह मेरे लिए सबसे मुश्किल था। एवरेस्ट पर पहुंचनें के लिए हमें तीन घंटें इंतजार करना पड़ा। यहां पर पर्वताराेही एक के बाद एक ऊपर चढ़ने की काेशिश कर रहे थे। टाॅप पर पहुंचने के लिए रास्ता एक ही था। इस कारण हमें सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी।


यूथ के लिए संदेश, नशा छाेड़ना एवरेस्ट पर चढ़ने से ज्यादा अासान: लाहाैल के रापे गांव के रहने वाले अाैर एचपीयू में वर्ष 2008 एमएमसी बैच के स्टूडेंट महेंद्र लेगदाे के पिता प्रेम लाल किसान हैं। इनकी माता साेनम अंगमाे हाउस वाइफ हैं। वे कहते हैं कि हिमाचल का यूथ नशे की अाेर जा रहा है। जिसे राेकना जरूरी हैं। इन्हाेंने यूथ काे संदेश दिया है कि नशा छाेड़ना एवरेस्ट पर चढ़ने से भी ज्यादा अासान है। जब लाेग एवरेस्ट पर चढ़ सकते हैं ताे नशा क्याें नहीं छाेड़ सकते।

 

अपने साथी अाप खुद, दूसरा साथ नहीं देता: यही नहीं ये वो रास्ता है जहां आप पूरी टीम के साथ चल रहे होते हैं, लेकिन जैसे ही आपकी हिम्मत छूटी समझ लीजिए की आप भी छूट गए। इस सफर के मुसाफिर अपने साथियों को एक ही पल में भूल जाते हैं। जिस साथी की सांसें फूलने लगती है। दूसरे साथी उसे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।


कदम कदम पर खतरा, जाे हारा, उसकी माैत निश्चित: महेंद्र लेगदाे कहते हैं कि यहां जिंदगी और मौत के बीच बस एक कदम का फासला है। मैं अाैर मेरे साथी जब चढ़ाई कर रहे थे ताे एेसा लग रहा था कि हम किसी भी समय बर्फ में दफन हाे सकते हैं। खंबू अाईस फाॅल के पास पहुंचते ही मेरी सांसें काफी तेज चलने लगी थी। क्याेंकि, यहीं पर सबसे ज्यादा पर्वताराेही माैत के मुंह में समा जाते हैं। इसे एवरेस्ट पर चढ़ते हुए सबसे मुश्किल जगह माना जाता है। माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 30 हजार फीट है और जेट एयरक्राफ्ट भी 30 हजार फीट की ऊंचाई पर ही उड़ता है। जबकि लाइट एयरक्राफ्ट तो 10 हजार फीट की ऊंचाई को भी पार नहीं कर पाते।
 

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