Hindi News »Himachal »Hamirpur» जन्म लेने वाले नवजात में कहीं बहरापन तो नहीं, अब अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले ही लग जाएगा पता, समय रहते मिलेगा इलाज

जन्म लेने वाले नवजात में कहीं बहरापन तो नहीं, अब अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले ही लग जाएगा पता, समय रहते मिलेगा इलाज

अगर जन्म के समय ही बच्चे में बहरपेन का पता चल जाए तो उसका इलाज आसान और संभव भी हो जाता है। लेकिन अभी तक प्रदेश के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 23, 2018, 02:00 AM IST

अगर जन्म के समय ही बच्चे में बहरपेन का पता चल जाए तो उसका इलाज आसान और संभव भी हो जाता है। लेकिन अभी तक प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जन्म के समय बच्चों के बहरेपन का पता न लग पाने से इलाज समय पर नही मिल पाता था। लेकिन अब प्रदेश के 10 बड़े अस्पतालों में जन्म से ही बच्चाें के बहरेपन का पता लगाना संभव हो गया है। अब इन अस्पतालों में शुरू हुई सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में डॉक्टर जन्म के समय ही नवजात बच्चे के कान की जांच करके पता लगा लेंगे कि बच्चे को सुनने में कोई प्रॉब्लम तो नही है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य योजना में शुरू की गई एसएनसीयू की सुविधा के जरिए नवजात को अस्पताल से डिस्चार्ज करने से पहले यह जांच की जाएगी। एसएनसीयू की सुविधा वाले अस्पतालों में ये टेस्ट करने के लिए ऑटो आकोस्टिक मशीन भी दे दी गई है। केएनएच अस्पताल में बहरेपन के टेस्ट करवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों और नर्सों को ट्रेनिंग भी दे दी है। बाल रोग विशेषज्ञ व स्टेट टीकाकरण अधिकारी डॉ. मंगला सूद ने बताया कि एसएनसीयू में एडमिट होने वाले अब हर नवजात शिशु के कान की जांच की जाएगी।

प्रदेश के 10 अस्पतालों में शुरू हुई न्यू बॉर्न बेबी के बच्चों के चेकअप की सुविधा, डॉक्टरों को दी ट्रेनिंग

इन अस्पतालों में सुविधा विभाग की लिस्ट के अनुसार केएनएच अस्पताल शिमला के अलावा, आईजीएमसी शिमला, एमजीएमएससी खनेरी, टांडा मेडिकल कालेज, जोनल अस्पताल मंडी, सुंदरनगर, सोलन, पांवटा साहिब, हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर, चंबा व कुल्लू अस्पताल के एसएनसीयू में एडमिट होने वाले शिशुओं की जांच की जाएगी। चिकित्सकों को जांच करने वाली मशीन भी दे दी गई है।

इसलिए टेस्ट जरूरी नवजात शिशुओं में बीमारी के कारण कई बार बहरापन आ जाता है। इसका पता तब तक नहीं चल पाता था, जब तक बच्चा कुछ बड़ा नहीं हो जाता था। तब उसका इलाज करना मुश्किल हो जाता था। शिशु को जन्म के बाद ही अगर निमोनिया, डायरिया, पीलिया जैसी कुछ प्रॉब्लम हो जाए तो उस बच्चे में बहरापन के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे में अब जो भी शिशु एसएनसीयू में एडमिट होगा, न सिर्फ उसकी जांच होगी बल्कि इन बीमारियों का सामना करने वाले बच्चों की भी जांच हो पाएगी।

कई तरह का बहरापनकई बच्चे एक या दोनों कानों से सुनने में अक्षम होते है। नवजात को सुनाई न देना भी ऐसे ही बहरेपन का हिस्सा है। कुछ नवजात को जन्म के समय बहरापन हो सकता है। सुनाई न देना भी हल्का, मध्यम, गंभीर या गहरा कई तरह का हो सकता है। कई बच्चों का बहरापन समय के अपने आप भी खत्म हो जाता है लेकिन कई बार यह बना रहता है।

बहरेपन का पारिवारिक इतिहास।

जन्म के समय कम वजन।

कान में वैक्स का निर्माण।

पर्दे के पीछे तरल पदार्थ बनना

चोट या कान के पर्दे का फटना।

संक्रमण से कान के पर्दे पर निशान।

गर्भ के दौरान मां का दवाओं का इस्तेमाल।

मां के पेट में बच्चे को संक्रमण।

कारण

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Hamirpur

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×