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स्कूल में हुआ मंत्री का कार्यक्रम और अब खर्चे की उगाही स्टाफ से

कबीना मंत्री का कार्यक्रम हुए तो काफी समय बीत चुका है, लेकिन उस पर हुए खर्च की भरपाई अब की जा रही है। वह भी स्कूल के...

Danik Bhaskar

Apr 24, 2018, 02:00 AM IST
कबीना मंत्री का कार्यक्रम हुए तो काफी समय बीत चुका है, लेकिन उस पर हुए खर्च की भरपाई अब की जा रही है। वह भी स्कूल के स्टाफ से। यह उगाई करनी भी पड़ेगी, क्योंकि खर्चा तो हुआ है। दिलचस्प बात तो यह है कि कार्यक्रम सरकारी था, बावजूद इसके शिक्षकों की जेब से उसमें हुए खर्चे की यदि भरपाई की जाए तो सवाल तो उठने ही हैं।

हमीरपुर के एक सरकारी स्कूल में यह कार्यक्रम हुआ था। कार्यक्रम के लिए पूरी तरह टूर प्रोग्राम भी बना लेकिन उसके लिए खर्चा कौन करेगा? कहां से आएगा यह रहस्य इसलिए छिपा हुआ रह गया, क्योंकि यह परंपरा तो वर्षों से चली आ रही है। खैर कार्यक्रम भी हो गया, आवभगत भी हो गई, लेकिन इसका सेंक स्कूल के उस स्टाफ को झेलना पड़ा है, जिसका कोई कसूर ही नहीं है। अब स्टाफ करे भी तो करे क्या? क्योंकि ऐसा तो हर बार होता है, मंत्री आए चाहे विधायक, कर्मचारी तो हमेशा सहमा हुआ ही होता है। इसलिए उसे मजबूरी में पैसे चुकाने ही पड़ते हैं, जेब से दिया खर्च सभी को चुकाना पड़ता है। बराबर हो या चाहे कम या ज्यादा। भले ही सरकार के मंत्री अब यह भी कह रहे हों कि ऐसे कार्यक्रमों में शॉल, टोपी या फूलों के गुलदस्ते आदि पर होने वाले खर्चे से परहेज किया जाएगा। इसका फायदा कोई नहीं होता है, लेकिन व्यवहारिक रूप में ऐसा संभव हो पाएगा, इस पर किंतु-परंतु लगा हुआ है।

1 से 7 अप्रैल तक प्रदेश भर के स्कूलों में बंटनी थी किताबें

उधर शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने फरमान जारी किया था कि नि:शुल्क किताबें बांटे जाने का प्रदेश भर के स्कूलों मे व्यवस्थित कार्यक्रम होगा और इसके लिए 1 से 7 अप्रैल तक का समय सुनिश्चित किया गया था। इसमें जनप्रतिनिधियों ने स्कूलों में जाकर यह भूमिका अदा करनी थी। उन्हीं के माध्यम से यह नि:शुल्क किताबें बच्चों को वितरित करनी थी। लेकिन इन आदेशों को भी ठेंगा दिखाने का काम अभी जारी है। व्यवहारिक रूप में यह आदेश सिरे नहीं चढ़ पाए और 7 अप्रैल के बाद भी न केवल हमीरपुर, बल्कि प्रदेश के सभी जिलों में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजनों का सिलसिला जारी है। अब जब किताबें 7 तारीख तक ही बंटी जानी थीं, तो इन्हें अवधि के बाद भी क्यों बांटा जा रहा। ऐसा फरमान जारी करने की अधिकारियों ने ज़हमत ही क्यों उठाई, क्योंकि जनप्रतिनिधियों को इनसे कोई सरोकार नहीं होता।

ऐसे कार्यक्रम का मालूम नहीं


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