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प्रदेश में भी तैयार होगा हाई क्वालिटी का कत्था

देशमें हिमाचल प्रदेश कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। हिमाचल में तैयार होने वाला कत्थे की देशभर मांग है। देश के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jan 06, 2018, 02:00 AM IST

देशमें हिमाचल प्रदेश कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। हिमाचल में तैयार होने वाला कत्थे की देशभर मांग है। देश के कुल कत्था उत्पादन का 70 फीसदी कत्थे का उत्पादन हिमाचल में होता है। हिमाचल में तैयार होने वाला कत्था अब पहले से साफ और हाई क्वालिटी का होगा। नौणी यूनिवर्सिटी के फॉरेस्ट प्रोडक्ट विभाग ने कत्था उत्पादन की नई तकनीक विकसित की है। शीघ्र ही यह तकनीक कत्था उत्पादन करने वाले उद्योगों को हस्तांतरित की जाएगी। इससे कत्था उत्पादन में बूम आएगा। कत्था उत्पादन की नई तकनीक में खैर की लकड़ी के टूकड़े (चिप्स) को ब्वॉयलर में डाला जाता है। उसे तब तक बनाया जाता है, जब तक उसमें थिकनेस आए। जब उसमें थिकनेस आनी शुरू होती है, तब उसे फ्रीजिंग कंडीशन में रखेंगे। इस दौरान तैयार उत्पाद को 4 से 7 डिग्री के तापमान में रखना चाहिए। कत्थे से इसी दौरान कच (डाई) को अलग करना है। इसके लिए ठंडे पानी से हलके से कत्थे साफ करना है। इससे कत्था अलग और कच को अलग किया जाएगा। पहले की विधि से जहां 7 से 10 फीसदी कत्था मिलता था, वहीं नई विधि से 8 से 12 फीसदी कत्था मिलेगा। इसी प्रकार नई विधि से 6 से 15 फीसदी कच मिलेगी।

साफ रंग, उच्च गुणवत्ता का कत्था उत्पादन करने में सफलता मिली

डॉ.यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी नौणी के फॉरेस्ट प्रोडक्ट विभाग के एचओडी डॉ. कुलवंत रॉय ने बताया कि यूनिवर्सिटी ने हाई क्वालिटी कत्था उत्पादन की तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से जहां साफ रंग और उच्च गुणवत्ता का कत्था उत्पादन करने में सफलता मिली है। इससे प्रदेश में कत्था उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी। यह तकनीक शीघ्र हस्तांतरित की जाएगी।

हिमाचल में नालागढ़, नुरपुर ऊना कत्था बेस्ट | कत्थाखैर के पौधों से तैयार होता है। हिमाचल प्रदेश में सोलन जिला के नालागढ़, कांगड़ा जिला के नुरपुर और ऊना जिला अच्छी क्वालिटी के कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। हिमाचल का कत्था 500 रुपए प्रतिकिलो की दर से बिकता है। खैर के पौधे की आयु 30 वर्ष होती है। इसमें 10 साल से 30 साल के बीच के पौधे का कत्था बनाने के लिए कटान किया जाता है। 30 साल बाद अक्सर खैर का पेड़ खोखला हो जाता है।

क्या है कत्था निकालने

की पारंपरिक विधि

पहलेदेसी तकनीक से कत्था निकाला जाता रहा है। लाल हार्ड वुड (नील) को ठंडे पानी में डाला जाता था। इससे डाई निकलती है, इसे कथई रंग निकलता है। इसके बाद खैर से बने टूकड़े (चिप्स) को 6 बार बॉलिंग दी जाती थी। जब हांडियों में या बॉयलर में पकाते- पकाते थिकनेस आती तो एक गड्ढा होता था, जिसे रेत से भरा होता था। इसमें जूट के बैग बिछाए जाते थे। इसमें उसे डाला जाता था। डाई का पार्ट रेत में डाला जाता था। इसमें कई बार फंगस लग जाती थी और कत्थे का रंग भी काला होता था। कत्थे से फंगस को दूर करने के लिए सोडियम बेंजोएट डाली जाती है।

उपलब्धि

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