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नारकीय जीवन जी रहे मानसिक विक्षिप्त

प्रदेश सरकार भले ही विकास व जन कल्याण की बडी बडी बातें कर रही है लेकिन नारकीय जीवन जी रहे मानसिक विक्षिप्त लोगों की...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 02:05 AM IST
प्रदेश सरकार भले ही विकास व जन कल्याण की बडी बडी बातें कर रही है लेकिन नारकीय जीवन जी रहे मानसिक विक्षिप्त लोगों की दयनीय हालत सरकारों व प्रशासनिक अमले की इन दावों की पोल खोल रही है। मानसिक विक्षिप्त लोगों के प्रति सरकार के उदासीन रवैये व मानवीय संवेदनहीनता के चलते ये बदनसीब लोग जानवरों से भी बदतर जीवन जी रहे हैं।

खुले आसमान तले रहने को मजबूर : हैरानी की बात तो यह है कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद जहां सरकारी अमला सड़क पर छोड़े गए मवेशियों के रहने के लिए गौशालाओं के निर्माण की योजना को आगे बढा रहा है वहीं खुले आसमान तले जी रहे मानसिक विक्षिप्त लोगों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं बन पा रही है। परिणाम स्वरूप दिमागी संतुलन खो चुके ये लोग सर्दी , गर्मी हा या बारिश खुले आसमान तले नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।

कई बार सौंपे ज्ञापन : सेवा समिति रोहड़ू के अध्यक्ष मोहन सिंह पांजटा का कहना है कि रोहड़ू में रह रहे मानसिक विक्षिप्त लोगों को लेकर स्थानीय प्रशासन व जिला प्रशासन को कई बार ज्ञापन भेजे गए । इतना ही नहीं कई बार सड़क हादसों में घायल हुए ऐसे लोगों का इलाज भी समिति के सदस्यों ने किया और मौत हो जाने पर अंतिम संस्कार भी किया। लेकिन इन मानसिक विक्षिप्त लोगों का इलाज व इनके रहने की व्यवस्था करने में सरकार व प्रशासन ही सक्षम है लेकिन दुर्भाग्यवश न तो सरकार इनकी सुध ले रही है और न ही प्रशासन कोई ठोस कदम उठा रहा है।

अनदेखी

खुले आसमान के नीचे रह रहे पांच मानसिक विक्षिप्त, सरकार व प्रशासन नहीं ले रहा सुध

आखिर कहां से पहुंच जाते हैं ये लोग : रोहड़ू में हर साल नए नए मानसिक विक्षिप्त लोग पहुंच जाते हैं। इन अनजान लोगों को कौन यहां छोड़ कर चला जाता है या फिर ये लोग कैसे यहां पहुंच जाते है इसके बारे में किसी को भी कोई जानकारी नहीं है। पुलिस व प्रशासन की तरफ से मानसिक रूप से अस्वस्थ इन लोगों के बारे में कोई छानबीन तक नहीं की जाती है।

कूड़ेदानों से खातें हैं खाना : रोहड़ू नगर में पांच मानसिक विक्षिप्त लोग रह रहे हैं। स्थानीय ढाबों व होटलों के समीप से गुजरने पर कुछ दुकानदार इनको खाना दे देते है । इसके अलावा ये मानसिक विक्षिप्त लोग कूड़ेदान से भी खाना बीन कर खाते हुए देखे जाते हैं। बावजूद इसके न तो किसी समाज सेवी संस्था का दिल इनकी दयनीय हालत पर पसीज रही है और न ही प्रशासन को अपनी जिम्मेवारी का एहसास है।