शिमला

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हिमाचल में सीएम कैंडिडेट धूमल, प्रदेश BJP अध्यक्ष सत्ता हारे, 1919 वोट से पिछड़े धूमल

भाजपा क्यों जीती अौर कांग्रेस क्यों हारी- बता रहे हैं दोनों दिग्गज।

Dainik Bhaskar

Dec 19, 2017, 07:43 AM IST
वीरभद्र और धूमल। वीरभद्र और धूमल।

शिमला. हिमाचल में सरकार बदलने की परंपरा पर चलते हुए प्रदेश में भाजपा दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। पार्टी 44 सीटें जीतने में सफल रही। सीएम पद के उम्मीदवार होने के बावजूद पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल को सुजानपुर की जनता ने नकार दिया। रात 10:30 बजे तक चली काउंटिंग में कांग्रेस के राजेंद्र राणा ने उन्हें 1919 वोटों से हरा दिया। धूमल के अलावा भी भाजपा के कई दिग्गज अपनी सीट नहीं बचा पाए। इनमें प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती, रविंद्र रवि, कुल्लू के महेश्वर सिंह और जोगिंद्रनगर से गुलाब सिंह ठाकुर शामिल हैं।


वहीं कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अर्की सीट से जीत दर्ज की। पहली बार राजनीित में उतरे उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह शिमला ग्रामीण से चुनाव जीत गए। लेकिन उनके 5 मंत्री ठाकुर कौल सिंह, सुधीर शर्मा, जीएस बाली, ठाकुर सिंह भरमौरी, प्रकाश चौधरी हार गए। सिर्फ मुकेश अिग्नहोत्री, धनीराम शांडिल व सुजान सिंह पठानिया ही सीटें बचा पाए।

संसाधनों की कमी से हारे: वीरभद्र

मैं पांच साल मुख्यमंत्री रहा। इसलिए हार भी मेरी ही हुई है। राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराना गलत है। मैं जनता का फैसला स्वीकार करता हूं। हमनें पांच साल प्रदेश में अद्भुत विकास किया। पूरा विश्वास था कि रिपीट करेंगे इसके बावजूद जो भी जनादेश मिला है, उसका सम्मान करना चाहिए। हमारी हार में जो सबसे बड़ा कारण रहा, वह है संसाधनों की कमी। हमने अपने पास मौजूद संसाधनों से भरपूर कोशिश की लेकिन समर्थन को वोट में तबदील नहीं कर पाए। राजनीित में हार और जीत चलती रहती है। कभी कोई सत्ता में होता है तो कभी जनता उसे विपक्ष में िबठा देती है। ये नतीजे चौंकाने वाले इसलिए भी हैं क्योंकि कई सिटिंग मंत्री सीट गंवा बैठे। भाजपा तो अपने सीएम कैंडिडेट को ही नहीं जिता पाई।

जनता को जोड़ नहीं पाए: धूमल

सुजानपुर सीट से मुझे उतारने का फैसला हाईकमान का था। हममें ही शायद कोई कमी रह गई कि वहां की जनता को अहसास नहीं करवा पाए और खुद से नहीं जोड़ पाए। जो जीत गए वो हमसे अच्छे होंगे शायद। हार के बाद में सीएम पद की दौड़ में नहीं हूं, लेकिन इसका फैसला हाईकमान करेगा। पार्टी के जो भी बड़े नेताओं की हार या जीत हुई है, वो सब मेरे करीबी हैं। प्रदेश में केंद्रीय नेतृतव का भरपूर सहयोग मिला। मोदी समेत स्टार प्रचारकों ने उम्मीदवारों के समर्थन में खूब रैलियां कीं जिस कारण दो तिहाई बहुमत मिला है। पांच साल बाद सत्ता में वापसी हुई है और इस बार भी भाजपा जनता के लिए काम करेगी। व्यक्तिगत हार से पार्टी की जीत ज्यादा मायने रखती है। पार्टी को जिताने के लिए जनता का धन्यवाद।

राणा की घर-घर पैठ धूमल पर पड़ी भारी

प्रदेश के इतिहास में पहली बार सीएम कैंडिडेट प्रोजेक्ट किए गए चेहरे को हार का मुंह देखना पड़ा है। वहीं दो दशकों में पहली बार हमीरपुर में भाजपा सिमटकर दो सीटों पर रह गई है। यहां कांग्रेस की सेंध भाजपा को 2019 में भारी पड़ सकती है।

हार के प्रमुख कारण

- भाजपा उम्मीदवार प्रो. प्रेमकुमार धूमल के चुनाव प्रचार में बाहरी लोगों का हस्तक्षेप अौर संगठन की पैठ न होना।
- सुजानपुर में भाजपा संगठन के अलावा पार्टी के अन्य सहयोगी मोर्चे सक्रिय नही थे।
- चुनाव से 20 दिन पहले हमीरपुर से सुजानपुर आना और रणनीति के अभाव में रही खामियां।
- राजेंद्र राणा की घर-घर में पैठ और बमसन को छोड़कर 10 साल बाद धूमल का सुजानपुर अाना लोगों ने नहीं स्वीकारा।
- राणा का कैंपेन बूथ स्तर तक था। भाजपा सेंध नहीं लगा पाई।
- राणा के करवाए काम भी लोगों ने स्वीकार किए।
- चुनाव प्रबंधन में भाजपा की कमजाेरी, छुटभैय्ये नेताओं की मौजूदगी भी ले डूबी भाजपा को।
इस हार के मायने
धूमल की हार और गृह जिले हमीरपुर में पांच में से तीन सीटें गंवाने से आने वाले चुनावों में पार्टी ही राहें आसान नहीं होंगी। अब यहां से अनुराग ठाकुर की राजनीितक जमीन को बचाए रखना उनके लिए चुनौती होगी। सुजानपुर में बीते चार साल में संगठन और विधायक नरेंद्र ठाकुर के बीच पकी खिचड़ी का असर भी दिखेगा। भाजपा नेताओं की एक-दूसरे की टांग खिंचाई भी चुनावों में खूब हुई।
सीएम कैंडिडेट धूमल। सीएम कैंडिडेट धूमल।
राजिंदर राणा राजिंदर राणा
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वीरभद्र और धूमल।वीरभद्र और धूमल।
सीएम कैंडिडेट धूमल।सीएम कैंडिडेट धूमल।
राजिंदर राणाराजिंदर राणा
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