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किसी जमाने में लोन लेकर बनाया था घर, अब बेच दें तो भी नहीं करा सकेंगे रेगुलर

एनजीटी के अब आए नए फैसले में लगाया गया एनवायर्नमेंट सैस तो इन परिवारों की कमर तोड़ देगा।

bhaskar news | Last Modified - Nov 18, 2017, 06:43 AM IST

  • किसी जमाने में लोन लेकर बनाया था घर, अब बेच दें तो भी नहीं करा सकेंगे रेगुलर
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    शिमला शहर में ही ग्रीन एरिया और कोर एरिया में सैकड़ों भवन हैं जिन्हें रेगुलर करने पर संकट आ गया है। फोटो: अजय भाटिया

    शिमला. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का अवैध बने मकानों के संबंध में आया फैसला प्रदेश के 30 हजार परिवारों के सामने चुनौती बन गया है। पूरे प्रदेश में पहले ही 21 हजार परिवार अपने मकानों को इसलिए रेगुलर नहीं करवा पा रहे थे कि मौजूदा पेनल्टी इतनी ज्यादा थी कि खून पसीने की कमाई से बनाए मकान के बाद अब पेनल्टी चुकाने के लिए पैसे नहीं थे। एनजीटी के अब आए नए फैसले में लगाया गया एनवायर्नमेंट सैस तो इन परिवारों की कमर तोड़ देगा।

    30 हजार मकान मालिकों में से अभी 30 फीसदी भी अपने मकानों को रेगुलर करवाने की हिम्मत नहीं कर पाए थे। प्रदेश सरकार के पास पूरे प्रदेश से अभी सिर्फ 8782 घरों को रेगुलर करने के ही आवेदन आए थे। लेकिन अब मकान की कीमत से कहीं ज्यादा तय किया गया एनवायर्नमेंट सैस तो ये 8782 मकान मालिक भी देने की हालत में नहीं हैं। शिमला जिले में ही 15 हजार मकानों को रेगुलराइज किया जाना है लेकिन प्रदेश सरकार के पास अभी शिमला जिले से ही साढ़े पांच हजार मकानों को रेगुलर करने के आवेदन आए। लेकिन अब शिमला के लोग ही अपने मकानों को रेगुलर करवाने की स्थिति में नहीं हैं। अब इन लोगों की आसा प्रदेश सरकार और सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है। एनजीटी के फैसले पर प्रदेश सरकार का अगला मूव अगले कुछ दिनों में तय होगा। लेकिन प्रभावित लोग एनजीटी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात खुलेआम कह रहे हैं।

    ग्रीन एरिया| सन 2000 में रिटायरमेंट पर लिए प्लॉट पर आज तक नहीं बना सके मकान: जैन
    ग्रीन एरिया जाखू में 2000 से पहले नई कंस्ट्रक्शन पर रोक नहीं थी। आरएल जैन 1999 में रिटायर हुए तो जाखू में सात लाख का प्लॉट खरीदा। प्लॉट शहर के पॉश एरिया में था तो खरीद लिया। लेकिन 2000 में जब मकान का नक्शा पास करवाने गए तो पता चला कि जैन ने तो प्लाट ग्रीन एरिया में खरीद लिया है। दरअसल, 2000 में जाखू के ग्रीन एरिया में घर बनाने पर रोक लगा दी। रिटायरमेंट पर मिले पैसे से खरीदे प्लाॅट पर मकान बनाने के लिए आरएल जैन लगातार नगर निगम से लेकर हर संबंधित एजेंसी से मकान बनाने की मंजूरी के लिए चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन मकान बनाने की मंजूरी नहीं मिली। अब एनजीटी के फैसले ने तो यहां पर घर बनाने की पूरी उम्मीद ही खत्म कर दी है। जैन की कुछ जमीन जम्मू कश्मीर में थी लेकिन हालात ऐसे बने कि वो भी चली गई। 26 साल की नौकरी के बाद खरीदे प्लॉट पर पहले ग्रीन एरिया घोषित करने की मार पड़ी। अब रिटायरमेंट के बाद अपने बेटे के घर में रहना पड़ रहा है क्योंकि सिर छिपाने का जगह नहीं बची।

    60 प्लॉटों पर नही बना सकते घर
    राजधानी के ग्रीन एरिया यानी जाखू बैल्ट में 60 लोगों ने प्लाट खरीद हैं। लेकिन इन लोगों को आज तक भवन निर्माण करने की अनुमति नहीं मिल सकी है। इन भवन मालिकों ने लाखो रुपए की राशि खर्च कर प्लाॅट खरीदे हैं। इनकी लाखों की कमाई पर लगातार बदलने वाले फैसलों की मार पड़ रही है। आगे की लड़ाई लड़ने के लिए अब इन लोगों ने शिमला ग्रीन एरिया एफक्टिड सोसायटी बनाई है।

    कोर एरिया में टूटेंगे 157 मकान
    एनजीटी के फैसले के बाद शहर के कोर एरिया में नियमों के खिलाफ बने माने गए 157 घर तोड़े जाएंगे। एनजीटी ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि कोर एरिया में अवैध निर्माण रेगुलर नहीं किया जा सकता और न ही यहां पर भविष्य में निर्माण किया जा सकेगा। जिन्होंने चोरी छिपे निर्माण किया है, उनके द्वारा किए निर्माण को नियमित करने को आवेदन नहीं लिए जाएंगे। जिन लोगों ने पहले आवेदन भी किए हैं, उन्हें निर्माण तोड़ना ही होगा। ऐसे में साफ है कि 157 लोगों के पास अनधिकृत निर्माण को तोड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।यह है शहर का कोर एरिया|काेर एरिया में पुराना शिमला यानि मालरोड, लोअर बाजार, रामबाजार, छोटा शिमला, चौड़ा मैदान और बालूगंज का कुछ हिस्सा शामिल है।

    ये है शहर का न्यू मर्ज एरिया
    न्यू मर्ज एरिया के मल्याणा, चम्याणा, ढली, मशोबरा, न्यू शिमला, कुसुम्पटी सहित कई क्षेत्र 1997 तक पंचायतों के तहत ही आते थे। इसके बाद इन क्षेत्रों को नगर निगम में शामिल किया। 2002 में इन क्षेत्रों को नगर निगम से बाहर करके नगर पंचायतें बना दी गईं। 2003 में फिर नगर पंचायतें खत्म कर साडा का गठन कर दिया। 2007 में फिर से शिमला को जेएनएनयूआरएम के तहत लाया गया तो राजधानी की आबादी 2 लाख होने की शर्त पूरा करना जरूरी था। सरकार ने इन एरिया नगर निगम में शामिल कर लिया। अब इन पर फिर से नगर निगम के नियमों को लागू किया जा रहा है।

    इस तरह किया गया है अवैध निर्माण|ओल्ड लाइन के नाम पर परमिशन लेने के बाद मनमर्जी से एंटीक बढ़ाई, तो किसी ने मंजिलें बढ़ा दी। बाजारों में जिनके पास स्पेस कम था, उन्हें अवैध तौर पर छज्जे बढ़ा दिए। लोअर बाजार, रामबाजार में बिना अनुमति के निर्माण करने वालों के खिलाफ नगर निगम ने कई बार कार्रवाई भी की है। इसके बावजूद लोग रुके नहीं।

    ये है फैसला और उसका असर

    - एनजीटी के नियमों के मुताबिक नियमों के खिलाफ बने मकानों या कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स को पेनल्टी के तौर पर इन भवनों को रेगुलर करने के लिए एनवायर्नमेंट सैस चुकाना हाेगा।
    - एनजीटी ने घरों के लिए एनवायरमेंट सैस 5 हजार और कमर्शियल के लिए 10 हजार स्क्वैयर फीट तय किया है।
    - अब अगर औसतन 100 स्क्वेयर मीटर यानी पौने तीस बिस्वा में बने छोटे से घर की एक मंजिल को रेगुलर करना है तो 15 लाख रुपए एनवायरमेंट सैस देना है।
    - इस मकान के तीन फ्लोर काे रेगुलर करने के लिए ही 40 से 45 लाख एनवायरमेंट सैस देना है।
    - प्रदेश भर में 30 हजार मकान नहीं हुए हैं रेगुलर।
    - शिमला नगर निगम एरिया में ही रेगुलर नहीं हुए हैं 15 हजार मकान।
    - प्रदेश भर से अभी 8782 मकानों को रेगुलर करने के लिए आए है आवेदन।
    - शिमला शहर में ही पूरी तरह टूटेंगे 157 मकान।

    नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रेड सिग्नल ऐसे बन गया है आफत

    पहले पंचायत, फिर साडा, अब ढाई लाख से बने फ्लोर के लगेंगे 20 लाख

    उप नगर टुटू में सुरेंद्र ठाकुर ने जब मकान बनाया तो टुटू पंचायत में आता था। फिर टुटू को साडा में मिलाया गया। ठाकुर ने अपना मकान 1990 से पहले बनाया। उस समय एक मंजिल को बनाने का खर्च ढाई लाख रुपए आया था। फिर एरिया नगर निगम में शामिल कर दिया गया। अब ढाई लाख में बनी मंजिल को 20 लाख में नियमित कैसे करवाएं। इतना पैसा जुटाना एक आम आदमी के लिए कैसे संभव है।

    कैसे देंगे इतनी पेनल्टी, पाॉलिसी के बारे में बताया ही नहीं गया

    विजय नगर के रहने वाले जगत राम गांगटा ने 1989 में मकान बनाया था। उस समय बिना नक्शा पास किए बिजली पानी का कनेक्शन मिल गया। लेकिन 1992 में जब कनेक्शन नहीं मिले तो पता चला कि नक्शा बनाना जरूरी है। न मकान बनाते हुए बताया गया कि आने वाले दिनों में नई पॉलिसी आएगी। अब मकानों को रेगुलर करने के लिए इतना एनवायरमेंट सैस कैसे देंगे।

    हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, हर पॉलिसी में नई शर्त लगाई जाती है

    पूर्व पार्षद महेंद्र चौहान कहते हैं कि सभी मकानों में बिजली पानी के कनेक्शन हंै। लेकिन बाद में बनती गई हर नई पॉलिसी में नई शर्त लगती गई। अब मकानों को रेगुलर करने की लड़ाई कई साल से लड़ रहे हैं। 1985 में लोन लेकर 15 लाख में मकान बनाया। किसी तरह लोन खत्म हुआ तो मकान को नियमित करवाने के लिए और बोझ आ गया है। लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

    ग्रीन सैस काफी ज्यादा, सुप्रीम कोर्ट में दी जाएगी चुनौती

    उप नगरीय जन कल्याण समिति के महासचिव गोविंद चितरांटा मकानों को रेगुलर करने के लिए ग्रीन सैस लगाने को सही नही मानते। मकान रेगुलर करने के लिए तय ग्रीन सैस काफी ज्यादा है। समिति पहले ही हाईकोर्ट में लड़ रही है। सरकार से आग्रह करेंगे कि एनजीटी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे। अगर सरकार कोर्ट नहीं जाती तो हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

    जो घर 1985-90 में बने वह अवैध कैसे, सब में बिजली पानी

    उप नगरीय जन कल्याण समिति के अध्यक्ष चंद्रपॉल मेहता कहते हैं कि जो मकान 1985 व 1990 के बीच बने हैं वो अवैध हो ही नहीं सकते क्योंकि बिजली पानी के कनेक्शन सभी के पास हैं। समिति अब सभी लोगों को साथ लेकर बैठक बुलाएगी। ग्रीन सैस इतना ज्यादा है कि ये पैसा लोग अपने भवन बेचकर भी नहीं जुटा पाएंगे। इस फैसले का मिलकर प्रदेश भर में विरोध किया जाएगा।

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    सुरेंद्र ठाकुर, जगत राम, महेंद्र चौहान, गोविंद चितरांटा, चंद्रपॉल मेहता।
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