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जंगी थोपन पवारी प्रोजेक्ट एसजेवीएनएल को देगी सरकार

960 मेगावाट के जंगी थोपन पवारी प्रोजेक्ट को राज्य सरकार ने सरकारी क्षेत्र के उपक्रम एसजेवीएनएल को देने की तैयारी कर...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 10, 2018, 02:05 AM IST

960 मेगावाट के जंगी थोपन पवारी प्रोजेक्ट को राज्य सरकार ने सरकारी क्षेत्र के उपक्रम एसजेवीएनएल को देने की तैयारी कर ली है। बारह सालों से चर्चित इस प्रोजेक्ट पर जयराम सरकार शीघ्र ही फैसला ले सकती है। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद इस प्रोजेक्ट का आवंटन सबसे बड़ा फैसला माना जाएगा। पूर्व सरकार के समय में रिलाएंस को ये प्रोजेक्ट देने का फैसला लिया। इससे मिलने वाली राशि को अदानी को देने का निर्णय भी लिया, हालांकि हिमाचल में मतदान के बाद तत्कालीन सरकार ने अपफ्रंट मनी लौटने की राशि का फैसला पूर्व सरकार ने ही वापस ले लिया था। अब जयराम सरकार केंद्र सरकार के पीएसयू को प्रोजेक्ट देने के पूर्व के फैसले के मुताबिक ही एसजेवीएनएल को इसे देने की तैयारी की है। इसका पूरा खाका तैयार कर ऊर्जा विभाग की आेर से कैबिनेट के समक्ष लाया जाना है।

सरकार ने तैयार किया प्रस्ताव, पीएसयू को पत्र लिखकर मांगी थी राय

40 साल बाद सरकार को वापस देना होगा प्रोजेक्ट

960 मेगावॉट की जंगी-थोपन बिजली परियोजना स्थापित करने के लिए प्रदेश सरकार अगली कैबिनेट की बैठक में फैसला ले सकती है। इस प्रोजेक्ट को राज्य सरकार को वापस देना होगा। इस प्रोजेक्ट के लेने के एवज में सरकारी निगम से राज्य सरकार अपनी हिस्सेदारी रख सकती है, इसके साथ ही प्रोजेक्ट में अपफ्रंट प्रीमियम की शर्त भी लागू हो सकती है । पूर्व सरकार ने जंगी-थोपन-पवारी जल विद्युत परियोजना के मामले में बहुद्देशीय परियोजनाएं एवं ऊर्जा विभाग को केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के साथ समझौता करने के लिए प्राधिकृत किया था।

2006 में पहली बार आवंटित हुआ था प्रोजेक्ट

वर्ष 2006 में राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट का टेंडर किया था। इस प्रोजेक्ट का आवंटन सबसे पहले ब्रैकल को आवंटित किया था। ब्रैकल ने अदानी से लेकर अपफ्रंट मनी की 280 करोड़ की राशि सरकार को दी। प्रोजेक्ट में ब्रैकल आैर रिलायंस की लड़ाई सुप्रीमकोर्ट तक चली। न्यायालय ने राज्य सरकार को इस प्रोजेक्ट को अपने स्तर पर फैसला लेने के निर्देश दिए। सरकार ने 2009 में इस प्रोजेक्ट के आवंटन को रद कर दिया था। पूर्व कांग्रेस सरकार ने इसे रिलायंस को देने का फैसला लिया, लेकिन रिलायंस ने ही इसे लेने से इंकार कर दिया था।

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