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ड्रग पकड़ने पर नहीं, आरोपी ने कितनी पाॅपर्टी बनाई ये भी बताना होगा तभी मिलेगा अवार्ड

देवभूमि हिमाचल में पांव पसार रहे ड्रग्स माफिया पर नकेल कसने के लिए पुलिस महकमे की कार्यशैली में बदलाव की तैयारी...

Danik Bhaskar | May 12, 2018, 02:05 AM IST
देवभूमि हिमाचल में पांव पसार रहे ड्रग्स माफिया पर नकेल कसने के लिए पुलिस महकमे की कार्यशैली में बदलाव की तैयारी है। अब तक की व्यवस्था के अनुसार ड्रग्स के मामले पकड़ने पर संबंधित पुलिस कर्मियों को अवार्ड दिया जाता है, लेकिन अब केवल इससे बात नहीं बनेगी। नई व्यवस्था में पुलिस कर्मियों को ऐसे मामलों की तह तक जाना पड़ेगा। इस बात की पड़ताल करनी होगी कि आरोपी ने नशे के कारोबार से कितनी संपत्ति अर्जित की है, अथवा ड्रग सप्लाई का मुख्य सोर्स कौन है। प्रॉपर इन्वेस्टिगेशन के बाद ही पुलिस कर्मियों को अवार्ड देने पर विचार होगा। यह खुलासा एडीजीपी (लाॅ एंड आॅर्डर) अनुराग गर्ग ने शुक्रवार को बिलासपुर एसपी आॅफिस में पत्रकारों से बातचीत में किया।

अनुराग गर्ग ने कहा कि नशे का कारोबार चलाने वाले सरगना अमूमन पर्दे के पीछे ही रहते हैं। वे भोले-भाले अथवा नशे के आदी हुए लोगों को लालच देकर ड्रग्स सप्लाई करते हैं। ऐसे लोग एक तरह से कोरियर डिलीवरी का ही काम करते हैं। उन्हें सरगना के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। उन्हें केवल इतना पता होता है कि सप्लाई कहां और किसके पास पहुंचानी है। सरगना तक पहुंचने के लिए अब व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है। केवल कोरियर पकड़ने पर अवार्ड नहीं मिलेगा। प्रॉपर इन्वेस्टिगेशन करके पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि ड्रग्स सप्लाई का मुख्य सोर्स कौन है अथवा इस अवैध कारोबार से उसने कितनी संपत्ति अर्जित की है। बड़ी मछलियां पकड़ने वालों को ही अवार्ड दिया जाएगा।

एडीजीपी ने कहा कि विभिन्न आपराधिक वारदातों में संलिप्तता के चलते जेलों में बंद कैदियों की अदालत में पेशी के मामले में भी नई व्यवस्था की जा रही है। इसके तहत उन्हें वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में प्रोड्यूस किया जाएगा। यह व्यवस्था होने से पुलिस कर्मियों को जहां कैदियों को लेकर कोर्ट में जाने की जरूरत नहीं रहेगी, वहीं कैदियों के भागने की आशंका भी नहीं रहेगी। पड़ोसी राज्यों से भी आग्रह किया गया है कि वे अपने यहां वीडियो काॅन्फ्रेंसिग के माध्यम से कैदियों को कोर्ट में पेश करने की व्यवस्था करें। पुलिस के साथ ही संबंधित विभागों में सारा सिस्टम ऑनलाइन होने के बाद यह व्यवस्था लागू कर दी जाएगी।

बिलासपुर में पत्रकारों से बातचीत करते एडीजीपी अनुराग गर्ग।

मोबाइल चोरी मामले की जांच को अलग सैल बनाने की योजना

हिमाचल में मोबाइल गुम या चोरी होने के मामलों की जांच के लिए अलग सैल बनाने की भी योजना है। इस सैल में गुम या चोरी हुए मोबाइल का आईएमईआई नंबर स्थाई रूप से ट्रैकिंग पर लगाया जा सकेगा। जैसे ही कोई व्यक्ति उस मोबाइल को आॅन करेगा, उसकी लोकेशन ट्रेस की जा सकेगी। अनुराग गर्ग ने कहा कि पुलिस थानों में स्थापित किया गया 100 नंबर तकनीकी खामी के कारण अकसर व्यस्त ही मिलता है। अब एनईआरएस ( नेशनल इमरजेंसी रिस्पॉंस सिस्टम) डवलप किया जा रहा है। इसके तहत हेल्पलाइन नंबर 112 लॉन्च किया जाएगा। किसी भी तरह की शिकायत इस नंबर पर की जा सकेगी। कंट्रोल रूम में कंपलेंट रिकॉर्ड करने के बाद उसे संबंधित थाने को प्रेषित कर दिया जाएगा, जिस पर तुरंत कार्रवाई होगी। हिमाचल में हर साल लगभग 14 हजार केस रजिस्टर्ड होते हैं। इनकी इन्वेस्टिगेशन के लिए केवल हेड कांस्टेबल स्तर तक के कर्मचारी अधिकृत हैं। 1-1 आईओ के पास कई-कई केस आ जाते हैं, जिसकी वजह से इन्वेस्टिगेशन प्रभावित होती है। प्रयास किए जा रहे हैं कि कांस्टेबल स्तर के कर्मचारी को भी जांच के लिए अधिकृत किया जाए। इससे काम जल्द निपटाने में मदद मिलेगी। इस मौके पर एसपी अशोक कुमार, आईपीएस प्रोबेशनर वत्सला गुप्ता, एएसपी भागमल ठाकुर व डीएसपी राजेंद्र जसवाल भी मौजूद थे।

मोबाइल एप से दर्ज होगी शिकायत

अनुराग गर्ग ने कहा कि हिमाचल पुलिस ने एक मोबाइल एप भी तैयार की है। इसे एंड्रॉयड फोन पर डाउनलोड किया जा सकता है। इसमें कई ऑप्शन हैं। इस पर न केवल किसी भी तरह की शिकायत दर्ज कराई जा सकेगी, बल्कि प्रदेश के किसी भी स्थान पर दर्ज हुई एफआईआर की जानकारी भी हासिल की जा सकेगी। इतना ही नहीं, इस एप के माध्यम से यह भी पता लगाया जा सकेगा कि राजधानी शिमला की किसी पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने लायक जगह है या नहीं। इससे शिमला के सैर-सपाटे पर आने वाले पर्यटकों को मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि हिमाचल में कानून व्यवस्था में अपेक्षित सुधार आ रहा है। अलबत्ता कुछ मामले बहुत अधिक हाइलाइट हो जाते हैं। इसके चलते यही संदेश चला जाता है कि हिमाचल में हालात ठीक नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। पुलिस थानों में दर्ज होने वाले मामलों में आ रही कमी इसका स्पष्ट प्रमाण है। वहीं, डराने-धमकाने, रास्ता रोकने अथवा गालीगलौज जैसे मामले अब एसडीएम कोर्ट के बजाए सीधे कोर्ट में भेजे जाएंगे। इससे इस तरह का कोई भी मामला पेंडिंग नहीं रहेगा। कोर्ट में उसकी सुनवाई हो सकेगी।