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स्कूल में मंत्री, नेता काे टोपी, शॉल और फूलमाला देने पर लगी रोक, देने ही हैं तो फूल या मोमेंटो दें

स्कूलों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में मंत्रियों और नेताओं का स्वागत फूल मालाओं से नहीं होगा। न ही सम्मान...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 02:10 AM IST

स्कूल में मंत्री, नेता काे टोपी, शॉल और फूलमाला देने पर लगी रोक, देने ही हैं तो फूल या मोमेंटो दें
स्कूलों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में मंत्रियों और नेताओं का स्वागत फूल मालाओं से नहीं होगा। न ही सम्मान स्वरूप उन्हें शॉल और टोपी पहनाई जाएगी। राज्य सरकार ने इस पर पूर्णत: रोक लगा दी है। शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने इस संबंध में सभी स्कूलों को निर्देश जारी कर दिए हैं। उन्होंने स्कूलों के प्रिंसिपल, हेडमास्टर और शिक्षकों से अपील की है कि सम्मान समारोह पर वह व्यर्थ का खर्चा न करें। उन्होंने कहा कि यदि सम्मान करना ही है तो फूल या फिर मोमेंटो देकर किया जाए। स्कूलों में वार्षिक कार्यक्रम, वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह के अलावा खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन में मंत्री, विधायक या फिर स्थानीय नेता जाते हैं। इसके अलावा जिला प्रशासन या शिक्षा विभाग से भी कई अधिकारी बतौर मुख्य अतिथि कार्यक्रमों में पहुंचते हैं। स्कूल प्रबंधन इनका स्वागत पहले फूल मालाएं पहनाकर करता है। टीचर और स्कूल के बच्चे भी मुख्य अतिथि को मालाएं पहनाते हैं। इसके बाद उन्हें शॉल और टोपी के साथ स्मृति चिन्ह भेंट किया जाता है। इस पर काफी खर्च होता है। स्कूल प्रबंधन इस खर्च का वहन स्कूल के खर्च से करता है या फिर टीचर इसके लिए खुद पैसा इक्ट्ठा करते हैं।

सख्ती

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क्यों लिया फैसलाशिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने सभी स्कूलों के मुखिया से अपील की है कि स्कूलों में होने वाले सम्मान समारोह में फूल, मालाएं शॉल और टोपी पर होने वाले खर्चे को रोकें। उन्होंने कहा कि इस का मकसद फिजूलखर्ची को रोकना है। शिक्षा मंत्री ने कहा कि यह आदेश सभी पर लागू होगा। चाहे वह खुद ही स्कूल में बतौर मुख्य अतिथि क्यों न गए हों।

स्कूल कार्यक्रम पर पहले से है सख्तीराज्य के सरकारी स्कूलों में धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों पर पहले से रोक लगा रखी है। लेकिन स्कूलों में आयोजित होने वाली खेलकूद प्रतियोगिता या फिर वार्षिक दिवस के आयोजनों में बतौर मुख्य अतिथि मंत्री, स्थानीय विधायक या किसी नेता को बुलाया जाता है, यहां शॉल, टोपी, माला की परंपरा बरकरार है।

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