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अंग्रेजों के टाइम की मशीनों से चल रहा 104 साल पहले बना उत्तर भारत का सबसे बड़ा हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट

104 साल पहले सबसे ज्यादा क्षमता का हाईड्रो पावर पैदा करने वाला उत्तर भारत का पहला और देश का दूसरा पावर प्लांट शिमला...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 07, 2018, 02:10 AM IST

  • अंग्रेजों के टाइम की मशीनों से चल रहा 104 साल पहले बना उत्तर भारत का सबसे बड़ा हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट
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    104 साल पहले सबसे ज्यादा क्षमता का हाईड्रो पावर पैदा करने वाला उत्तर भारत का पहला और देश का दूसरा पावर प्लांट शिमला के नजदीक चाबा में आज भी बिजली पैदा कर रहा है। अंग्रेजों के जमाने में उत्तर भारत के दोनों हाईड्रो पावर प्राेजेक्ट हिमाचल में ही शुरू हुए, लेकिन चंबा में लगा पावर प्रोजेक्ट कम क्षमता का था। उस जमाने में शिमला में बिजली नहीं थी तो अंग्रेजों ने शिमला को समर कैपिटल बनाने के बाद अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने बिजली पैदा करने के लिए चाबा को चुना। 119 साल पहले बिना किसी सड़क के यहां तक पहुंचाई गई मशीनें न सिर्फ आज भी काम कर रही हैं बल्कि ये प्रोजेक्ट तकनीकी दक्षता की मिसाल है। इस प्रोजेक्ट की खासियत ये है कि ये प्रोजेक्ट सतलुज नदी के किनारे बनाया तो गया, लेकिन ये पावर प्लांट सतलुज नदी के पानी से नहीं बल्कि नौटी खड्ड से लाए गए पानी से बिजली पैदा कर रहा है

    प्रोजेक्ट की ये है खासियत, सतलुज नदी के किनारे बनाया लेकिन नौटी खड्ड से लाए गए पानी से हो रही है बिजली पैदा

    इंग्लैंड से नहीं आ सकती थी मशीनें तो यहां बनाई वर्कशॉप |येपावर प्लांट शिमला से 43 किमी. दूर है। शिमला से यहां तक सड़क नहींं थी, तो अंग्रेजों ने मशीनें मुश्किल ये यहां पहुंचाई। लेकिन अंग्रेजों को मालूम था कि पावर प्लांट का कोई पुर्जा खराब हुआ तो दोबारा यहां से ले जाना आसान नहीं। इसलिए पावर प्रोजेक्ट ने साथ ही वर्कशॉप भी बना दी। आज भी ये वर्कशॉप वहीं है। 119 साल पहले पैदा होने वाली बिजली की मात्रा को नापने के लिए लगाए गए मीटर आज भी सही तरीके से चल रहे है। ये सभी मशीनें बहुत ही कम जगह घेरने वाले हैं।

    2004 के बाद से नहीं हो पा रहा रखरखाव |2004 से बाद से इस प्रोजेक्ट का बेहतर रखरखाव नहीं हो पा रहा है। प्रोजेक्ट स्थल पर बनाए भवन दिखता तो मजबूत है, लेकिन इसकी हालत देख कोई भी सहज समझ सकता है कि प्रोजेक्ट के भवन को अब मरम्मत की दरकार है।

    पांच टरबाइन पैदा करती हैं 1.75 मेगावाट बिजली

    चाबा पावर हाउस में पांच टरबाइन लगाए गए हैं। दो टरबाइन पांच पांच सौ किलोवाट और तीन 250 किलोवाट की बिजली पैदा करते हैं। गर्मियों में नौटी खड्ड में पानी की मात्रा कम होने की वजह से इसके सभी टरबाइन नहीं चलाए जा रहे हैं।

    3 किमी दूर से 5 पाइपों में आता है पानी

    चाबा पावर हाउस बिलकुल सतलुज नदी के किनारे हैं। लेकिन सतलुज नदी में आने वाली मिट्टी को देखते हुए अंग्रेजों ने सतलुज नदी का पानी इस्तेमाल नहीं किया। बल्कि पास ही बहने वाली नौटी खड्डा का पानी इस्तेमाल किया। इस खड्डा का पानी चाबा से तीन किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बड़े टैंक में लाया जाता है और फिर पांच बड़े पाइपों से पानी चाबा पावर हाउस आता है। हर पाइप का पानी एक एक टरबाइन को चला रहा है।

    भूरी सिंह पावर हाउस चंबा में 1902 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट, उसके बाद यह दूसरा प्रोजेक्ट रहा

    प्रोजेक्ट से जुड़े सबसे पहले जो कर्मी | इस पावर प्रोजेक्ट को बनाने वाले कर्नल बासिक बाल्यै। इस पावर के बनने के बाद पहले इंचार्ज एल्गरनॉन शैल्टन सैंट मारटिन।

    देश में चौथे नंबर पर यह प्रोजेक्ट

    अगर देश में शुरू हुए सबसे पुराने हाईड्रो पावर प्रोजेक्टों की बात की जाए, तो चाबा पावर हाउस का नंबर चौथे नंबर पर आता है। देश का पहला पावर हाउस दार्जलिंग में 1887 में शुरू हुआ और फिर कर्नाटक का शिवानासमुद्रा में 1902 में 4.5 मेगावाट बिजली बनना शुरू हुई थी। तीसरे नंबर पर हिमाचल के चंबा में भूरी सिंह हाईड्रो पावर हाउस शुरू हुआ था। उत्तर भारत के पहले दो हाइड्रो पावर हाउस हिमाचल प्रदेश में लगे थे। इसमें पहला भूरी सिंह पावर हाउस चंबा में था जो 1902 में शुरू हुआ था।

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