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सफाई पर सालाना ७ करोड़ खर्च, फिर भी हम स्वच्छ शहरों की लिस्ट में नहीं

पिछले एक वर्ष में शिमला शहर में सफाई व्यवस्था को सही रखने और स्वच्छता सर्वेक्षण की सूची में अच्छी रैंक पाने के लिए...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 02:15 AM IST

सफाई पर सालाना ७ करोड़ खर्च, फिर भी हम स्वच्छ शहरों की लिस्ट में नहीं
पिछले एक वर्ष में शिमला शहर में सफाई व्यवस्था को सही रखने और स्वच्छता सर्वेक्षण की सूची में अच्छी रैंक पाने के लिए लगभग 7 करोड़ रुपए नगर निगम प्रशासन की ओर से खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजों को लेकर जारी की गई पहली सूची में शिमला शहर का नाम गायब है। इतना ही नहीं शिमला शहर न ही तो स्टेट कैपिटल, नार्थ जोन और हिल्स सिटी की कैटेगरी में रैंक हासिल नहीं कर पाया है। सर्वेक्षण के नतीजों में इंदौर पहले, भोपाल दूसरे और चंडीगढ़ तीसरे स्थान पर रहा है। स्वच्छता सर्वेक्षण की जांच के लिए शिमला शहर में 15 और 16 फरवरी को केंद्र से एक टीम शिमला के दौरे में आई थी और इस दौरान टीम ने शहर के विभिन्न हिस्सों में दौरा कर सफाई की जांच की थी। इसके अलावा टीम ने लोगों से भी फीडबैक लिया था। यहां खर्च होती है राशिः शहर की सफाई व्यवस्था के लिए नगर निगम प्रशासन को अलग अलग हेड में पैसा खर्च करता है। शहर में सफाई व्यवस्था का जिम्मा सैहब सोसायटी के हवाले है। सैहब सोसायटी का हर माह लगभग 40 लाख रुपए खर्च आता है। इसके अलावा निगम के रेगुलर सफाई कर्मचारियों के ऊपर भी लगभग एक करोड़ रुपए से अधिक की राशि वेतन और भत्तों के रुपए में खर्च की जाती है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत भी नगर निगम प्रशासन को 35 लाख रुपए की राशि मिली है। इसी साल सैहबकर्मियों को के ईपीएफ में 1 करोड़ भी जमा किया गया है।

इन वजहों से पिछड़ा शिमला... बार-बार सफाई कर्मियों की हड़ताल से होता है ये हाल

टॉप के 51 शहरों में न आने के पीछे शहर में आए दिन होने वाली सैहब कर्मचारियों की हड़ताल हो सकती है। सैहब कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से शहर में गंदगी बढ़ती है। इसके अलावा जब केंद्र की टीम शिमला शहर के दौरे पर थी उस दौरान भी सैहब कर्मचारियों की मनमानी की वजह से रैंकिंग पर असर पड़ा है। हड़ताल की वजह से लोगों को मजबूरी में कूड़ा खुले में डालना पड़ता है। इसके अलावा नगर निगम की ओर से बनाए गए कलेक्शन प्वांइट पर बंदरों के आंतक के चलते भी शहर की सुंदरता पर असर पड़ता है।

कूड़े से बिजली बनाने वाला शहर, सफाई में फिसड्डीकूड़े से बिजली बनाने वाला शिमला शहर देश का एकमात्र शहर है। कूड़े से बिजली बनाने के लिए भरयाल में 42 करोड़ रुपए की लागत से संयंत्र स्थापित किया गया है। इसमें रोजाना 1.7 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाता है।

मेयरः कुसुम सदरेट

मिलकर करेंगे काम, रैंकिंग में लाएंगे सुधार

स्वच्छता की रैंकिंग में शिमला शहर को अव्वल लाने के लिए शिमला शहर में लोगों को सफाई के लिए जागरूक किया जाएगा। लोगों के सहयोग से स्वच्छता अभियान चलाए जाएंगे। व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए इसकी मॉनिटरिंग को बढ़ाया जाएगा।

पूर्व मेयरः संजय चौहान

पहली बार रैंकिंग से बाहर हुई स्मार्ट सिटी

यह पहला मौका है जब स्वच्छता सर्वेक्षण में शिमला शहर का नाम ही नहीं है। भाजपा शासित निगम सफाई व्यवस्था की ओर ध्यान देने के बजाए ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दे रहा है। अपने चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। जिस कारण पिछ

कभी 14वीं रैंकिंग तक पहुंचे थे हम वर्ष 2014 में हुए स्वच्छता सर्वेक्षण में शिमला शहर 14वें पायदान में रहा था।

2015 में रैंकिंग में गिरावट आने के साथ सर्वेक्षण में शिमला शहर 90 वें पायदान पर पहुंच गया था।

2016 में रैंकिंग में सुधार देखा गया था और शहर की रैंकिंग 27वीं रही थी।

2017 में शिमला शहर की रैंकिंग 47 वी रही थी और शिमला शहर नॉर्थ जोन में अव्वल भी रहा था।

1 हजार कर्मचारी और अफसरों की फौजशहर की सफाई के लिए लगभग एक हजार कर्मचारियों और अफसरों की फौज होने के बावजूद भी रैंकिंग में सुधार नहीं हो पा रहा है। पिछली बार 434 शहरों के बीच में यह स्पर्धा हुई थी और इसमें शिमला शहर की रैंकिंग 47 वीं आई थी। जबकि अब तो शिमला शहर टॉप की 50 शहरों की सूची से भी बाहर है। लोगों के घरों से कूड़ा उठाने के लिए 503 सैहब कर्मचारी, 30 सुपरवाइजर, 250 के करीब रेगुलर सफाई कर्मचारी, 3 कोऑर्डीनेटर, 8 कार्यालय कर्मचारियों के अलावा चीफ सेनेटरी आफिसर, सीएचओ, सेनेटरी इंस्पेक्टर और आउटसोर्सिंग पर भी 300 के करीब कर्मचारी काम कर रहे हैं। इन सबके बावजूद लगभग 32 वर्ग किलोमीटर एरिया में फैले शिमला शहर की सफाई व्यवस्था पटरी पर नहीं उतर रही है। पब्लिक को भी अगली बार होने वाले सर्वे में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चिहए।

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