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अब मुनाफा नहीं सिर्फ परंपरा को बचाना ही लक्ष्य

बैंटनी कैसल में पारंपारिक वस्तुओं की प्रदर्शनी लगी। प्रदर्शनी में शिल्पकला का बेहतर नमूना देखने को मिला।...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 02:15 AM IST

अब मुनाफा नहीं सिर्फ परंपरा को बचाना ही लक्ष्य
बैंटनी कैसल में पारंपारिक वस्तुओं की प्रदर्शनी लगी। प्रदर्शनी में शिल्पकला का बेहतर नमूना देखने को मिला। प्रदर्शनी में रखीं अधिकतर चीजें मिट्‌टी और लकड़ियों की बनाई हुई थीं, जिनमें हिमाचल के विभिन्न जिलों का पारंपारिक वस्तुओं की झलक देखने को मिलीं। इनमें पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीजों के नमूने शिल्पकारों ने पेश किए थे। जिन्हें देखकर पुराने जमानों को याद काे ताजा हो रही थी। ग्राम शिल्प मेले में प्रदेश के विभिन्न भागों के शिल्पकारों को अपने वास्तुशिल्प पेश करने का अवसर मिला । मेले में 50 स्टॉल लगे है। मेले में वह सब चीजें देखने को मिलेंगी जो पुराने समय में हमारे घरों में होती थी आज वह सब गायब होती जा रही है। वहीं शिल्पकारों का कहना है कि अब मुनाफे के लिए नहीं बल्कि परंपरा को जीवित रखने के लक्ष्य से ऐसी प्रदर्शनियों का लगना जरूरी है।

संतोषगढ़ के कारीगर सोहनलाल ने पेश किए मिट्‌टी के घड़े ...

मेले में ऊना के संतोषगढ़ से आए कारीगर सोहनलाल पिछले 45 साल से मिट्‌टी के घड़े और मिट्‌टी के फिल्टर बना रहे हैं। मिट्‌टी के घड़े की खासियत ये है कि इसका पानी स्वाद होता है। घड़े के पानी को पीने से कभी भी न तो बुखार आता है न कब्ज होती है। वहीं फ्रीज का पानी इतना स्वाद नहीं होता है। आज बदलते समय में मिट्‌टी के घड़े की जगह फ्रीज ने ले ली है। कभी गर्मियों में ठंडे पानी के लिए मिट्‌टी के घड़ों का इस्तेमाल होता था। इसके अलावा मिट्‌टी से बना कुकर रखा है, जिसमें आसानी से खाना पक जाता है। मिटटी से बने गुलक भी छोटे बच्चों के लिए रखे है।

हमीरपुर के करतार सिंह की डोली ले गई बीते जमानों में, जूस बनाने वाला बांस का बेलना भी था दिलचस्प

कभी दुल्हन को विदाई के समय कहार डोली में लेकर चलते थे, अब कार ने ली जगह

हमीरपुर के करतार सिंह ने कभी विदाई के समय में दुल्हन को डोली में विदा किया जाता था। कहार दुल्हन को डोली में उठाकर ले चलते थे। अब डोली की जगह कार ने ले ली है। करतार ने बांस से बनाकर ऐसी ही डोली प्रदर्शनी में दिखाई। इसमें दिखाया है कि लगभग पिछले बीस सालों से डोली गायब हो गई है। इसकी जगह अब कार ने ले ली है। उन्होंने कहा कि डोली की परंपरा खत्म नहीं होनी चाहिए। चाहे इनसे मुनाफा कम मिले लेकिन पारंपारिक चीजें बचाने का लक्ष्य रखना चााहिए।

कभी गर्मियों मंे ठंडे पानी के लिए मिट्‌टी के घड़े होते थे इस्तेमाल, अब फ्रीज ने ली जगह

ढालपुर के बॉबी लेकर आए थे कैनन बैंबू से बनी टोकरियां

भले ही कैसरोल में कुछ देर गर्म रहती हैं रोटियां, पर खराब होने से बचाया नहीं जा सकता, बांस की टोकरी कई दिन सेफ रहती थीं

कुल्लु के ढालपुर से आए कारीगर बॉबी अपने परंपरागत पेशे को अपना रहे है। बॉबी ने पिता मेहरचंद से कैनन बैंबू यानि बांस के छिलकों से ब्याह शादियों में समान रखने के लिए चंगेर, गोबर उठाने के किल्टे, ताकली, करंडी, बनानी सीखी है। करंडी यानि टोकरी पहले घरों में रोटी रखने के लिए काम आती थी। वहीं, लगभग 15 साल पहले लोग इसमें रोटियां रखते थे। टोकरी में ढक्कन लगाकर इसमें रोटियों को कई दिन तक रख सकते थे। लेकिन आज इसकी जगह कैसरोल ने ले ली है। कैसरोल में रोटियां कुछ देर के लिए भले ही गर्म रहती है, लेकिन दूसरे दिन तक लगातार रखने पर रोटी खराब हो जाती है।

कभी बैंबू के बेलने से निकालते थे गन्ने का जूस |वहीं आज से 40 पहले का बांस से बेलना बनाया है। इसमें दिखाया है कि पुराने समय में बैंबू से बने बेलना से बैलो को घुमाया जाता था, तो गन्ने का जूस घड़े को आगे रखकर निकाला जाता था,यह जूस दो दिनों तक पी सकते थे। आज इसकी जगह लोहे की मशोनो ने ली है यह जूस एक दिन तक रख सकते है। दो दिनों में खराब हो जाता है।

25 करोड़ की लागत से बैंटनी कैसल का होगा जीर्णाद्धार : मुख्यमंत्री

सिटी रिपोर्टर |
शिमला

शिमला स्थित बैंटनी कैसल को 25 करोड़ रुपए की लागत से जीर्णोद्धार कर पर्यटन के मुख्य आकर्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। वीरवार को मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने भाषा कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से पांच दिवसीय राज्य स्तरीय ग्रामीण शिल्प मेले का उद्‌घाटन करने के बाद यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बैंटनी कैसल शिमला शहर का एक ऐतिहासिक एवं धरोहर भवन है, जिसका समृद्ध इतिहास है। यह भवन न केवल ऐतिहासिक है बल्कि एंग्लो-गोथिक वास्तुकला का सुंदर उदाहरण भी है। यह भवन मालरोड पर स्थित होने के कारण पर्यटकों के लिए और भी आकर्षण का केंद्र होगा। उन्होंने कहा कि ज़िला स्तरीय एवं अंतर-राज्य ग्राम शिल्प मेलों का आयोजन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने भाषा कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा तैयार की गई वास्तुकारों की निर्देशिका व ब्रोशर का भी विमोचन किया। भाषा कला एवं संस्कृति सचिव डॉ. पूर्णिमा चौहान ने मुख्यमंत्री और अन्य का स्वागत किया। विभाग की निदेशक रूपाली ठाकुर ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

ये रहे उपस्थित |इस अवसर पर खादी बोर्ड के उपाध्यक्ष संजीव कटवाल, नगर निगम महापौर कुसुम सदरेट, उपमहापौर राकेश शर्मा, उपायुक्त शिमला अमित कश्यप, निदेशक सूचना एवं जन संपर्क अनुपम कश्यप, उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक प्रो. शोभगयावर्धन भी उपस्थित थे।

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Web Title: अब मुनाफा नहीं सिर्फ परंपरा को बचाना ही लक्ष्य
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