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आंखों देखी हकीकतः बाइक को साइड देना पड़ा भारी, 200 फीट खाई से ऐसी निकली 22 बच्चों की लाशें...

सीएम ने मृतक बच्चों के परिवारों को 5-5 लाख देने की घोषणा की, आज जाएंगे नूरपुर

Bhaskar News | Last Modified - Apr 10, 2018, 01:46 AM IST

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    हादसे में चकनाचूर हुई स्कूल बस।

    नूरपुर (कांगड़ा).नूरपुर के वजीर राम सिंह पठानिया हाई पब्लिक स्कूल बस के दुर्घटनाग्रस्त होने से 27 लोगों की मौत हो गई। इनमें 23 बच्चे (13 लड़के, 10 लड़कियां) दो टीचर, एक ड्राइवर व एक महिला शामिल है जिसने लिफ्ट ली थी। बस में कुल 37 लोग थे। सोमवार को लगभग 4.30 बजे स्कूल से छुट्टी होने के बाद निजी स्कूल की बस बच्चों को घर छोड़ने जा रही थी। चेली गांव के समीप संकरे रास्ते में एक मोटरसाइकिल वाले को साइड देते हुए बस अनियंत्रित हो गई और 200 फीट गहरी खाई में जा गिरी। हादसे में बस ड्राइवर सेवानिवृत सैनिक मदन सिंह सहित 22 लोगों की मौके पर मौत हो गई जबकि बाकी को गंभीर हालत में नूरपुर अस्पताल में भर्ती करवाया गया।

    अस्पताल में भर्ती 5वीं के छात्र रणवीर ने बताया कि बस जब चेली के पास पहुंची तो एक बाइक सवार आ रहा था। बस ने उसे साइड दी और उसके बाद बस ढांक से नीचे की तरफ लुढ़क गई। बस का दरवाजा खुला होने की वजह से वह बाहर गिर गया। इसके बाद वह लकड़ी का सहारा लेकर ऊपर पहुंचा।

    ऐसे निकाला बच्चों को

    - गंभीर रूप से घायल 6 छात्रों का इलाज अमनदीप हॉस्पिटल पठानकोट में चल रहा है जबकि चार घायल छात्रों का उपचार नूरपुर हॉस्पिटल में चल रहा है जिनमें मनीष, कनिका ईशांत व रणवीर शामिल हैं।

    - कुल 10 बच्चों को पठानकोट भेजा गया था जिनसे से इलाज के दौरान 3 की मौत हो गई थी। घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने बताया कि बस गिरने के दौरान एक बच्चा उसमें से उछलकर बाहर गिर गया।

    - वह जैसे तैसे ऊपर पहुंचा और जिसने शोर मचाकर लोगों को इकट्‌ठा किया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने खाई में उतरकर बच्चों को निकाला।

    - प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने दुर्घटना पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदनाएं प्रकट की हैं।

    - इसके साथ ही दुर्घटना में मारे गए छात्रों,अध्यापकों व ड्राइवर के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए की फौरी राहत देने की घोषणा की है।

    निजी स्कूल प्रशासन के प्रबंधक बिट्‌टू ने बताया कि बस का मॉडल 2015 का था जिसकी पासिंग30अप्रैल तक वैध थी। बस की इंश्योरेंस मार्च2018 में ही करवाई गई थी। बस ड्राइवर मदन सिंह (60) निवासी सुल्याली पिछले 13 वर्षों से स्कूल बस चला रहा था। इससे पूर्व वह सेना से सेवानिवृत होकर घर आया था। घर आते ही उसने स्कूल बस चलाने की नौकरी कर ली थी। 35स्टूडेंट्स जोकि चक्की दरिया के कुठेड़ा, संगोता,कयोड़ा व ठेहड़ा गांव के रहने वाले थे। इनमें से अधिकतर छात्र सोमवार को पहली बार स्कूल गए थे।

    प्रदेश में अब तक हुए बड़े हादसे


    - अप्रैल 2011 में चंबा में गिरी बस में 32 लोगों की मौत।
    - सितंबर 2011 में कांगड़ा जिले में आशापुरी जाती बस हादसे में 34 मौतें। इस हादसे के बाद हर कोई सहम गया था।
    - 11 अगस्त 2012 को चंबा में बस गिरने से 47 की माैत।
    - अप्रैल 2017 में शिमला जिले के गुम्मा में बस गिरने से 46 मौतें।
    - मई 2017 में मंडी में बस ब्यास में गिरने से 16 मौतें।
    - जुलाई 2017 में रामपुर में गिरी बस में 20 की मौत।

    500 से ज्यादा ब्लैक स्पॉट सिर्फ फाइलों में

    राज्य लोक निर्माण विभाग ने 500 से ज्यादा ब्लैक स्पॉट हिमाचल में चिंहित कर रखे हैं। इन्हें सुधारने के लिए कई बार राजनीतिक मंचों से वादे होते हैं, लेकिन सुधार दिखता नहीं है। इन्हें चिंहित कर सरकार ने फाइल तो तैयार कर दी है, लेकिन अभी तक सुधारने के लिए कोई जहमत नहीं उठाई है। इसका खामियाजा हिमाचल की जनता को अपनी जान गवां कर भुगतना पड़ रहा है।

    कहां जाते हैं सड़क सुरक्षा के 50 करोड़

    पहाड़ में सड़क के दोनों तरफ मौत है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है, क्रैश बैरिअर सड़क किनारे लगने के बाद इसमें कमी आई है। राज्य में जहां क्रैश बैरिअर लगाए हैं, वहां पर हादसे घटे हैं। राज्य सरकार सड़क सुरक्षा पर 50 करोड़ का प्रावधान करती है, लेकिन सड़क आज तक असुरक्षित है।

    हर हादसे की जांच, पर नतीजा जीरो


    राज्य में नियमों के मुताबिक कागजी कार्यवाही करने के लिए हर सड़क हादसे की जांच के लिए कमेटी बनती है। जांच रिपोर्ट भी आती है, लेकिन फाइलों से बाहर नहीं निकलती। प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों की हालत और नेटवर्क का अंदाजा इस बस हादसे ने सामने ला दिया। हादसे के बच्चों को प्रदेश के दूसरे बड़े हॉस्पिटल टांडा भेजने की बजाय पठानकोट भेजना पड़ा।

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    यहां से नीचे गिरी थी बस।
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    हादसे के बाद आसपास के लोग बच्चों को बस से बाहर निकालने के लिए पहुंच गए, लेकिन घायल बच्चों और टीचरों को उल्टी पड़ी बस से निकालने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
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