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चौथी स्टेज के कैंसर में पड़ती है जरूरत लेकिन खराब पड़ी है गामा कैमरा मशीन

एक वर्ष पहले
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मरीज के चौथी स्टेज में कैंसर हड्डियों में कहा तक पहुंच चुका है। इसका पता करने के लिए आईजीएमसी में गामा कैमरा मशीन लगाई गई है। इस मशीन से डॉक्टर चौथी स्टेज के कैंसर को आसानी से डिटेक्ट कर सकते हैं। फिर जिस जगह पर बीमारी हो वहीं से इलाज शुरू किया जाता है। मगर आईजीएमसी में गामा कैमरा मशीन पिछले कई माह से बंद पड़ी है। अब यहां पर जो भी मरीज इस टेस्ट के लिए आ रहे हैं उन्हें पीजीआई भेजा जा रहा है। कैंसर अस्पताल में हर रोज सैकड़ों मरीज दूर-दराज के इलाकों से इलाज करवाने के लिए आ रहे हैं, लेकिन उन्हें अस्पताल पहुंच कर ही पता चल रहा है कि मशीन बंद पड़ी है। 14 साल पुरानी इस मशीन की वैल्यू अब खत्म हो चुकी है। मशीन का जो पार्ट मरीज के कैंसर वाले पार्ट की फाेटाे लेता है वही खराब हाे गया है। विशेषज्ञाें की माने ताे अब यह पार्ट ठीक नहीं हाे पाएगा। अगर जबरदस्ती मशीन काे ठीक करवाना भी चाहे ताे भी इसमें साफ फाेटाे नहीं अाएगी। इससे पहले 2017 में भी यह मशीन खराब हुई थी ताे तीन साल तक इसे ठीक नहीं करवाया गया। उस दाैरान विभाग ने सरकार काे कई पत्र लिखे मगर सरकार ने काेई जबाव नहीं दिया। जिस वजह से डाॅक्टराें काे मजबूरन लोगों का इलाज करवाने के लिए पीजीआई रेफर करना पड़ा।

मशीन की लाइफ हो गई पूरीः यह मशीन वर्ष 2006 में लगाई गई थी। मशीन अपनी लाइफ पूरी कर चुकी है। वर्ष 2017 के बाद से मशीन खराब है। विभाग ने मशीन दुरुस्ती को लेकर प्रयास शुरू कर दिए हैं लेकिन अब कंपनी द्वारा पार्ट न बनाने के बाद से मामला लटका पड़ा है। कैंसर अस्पताल में यूरोलॉजी, गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी और मेडिसन के चिकित्सक जांच के लिए मरीजों को यहां भेजते है। ऐसे में न्यूक्लियर मेडिसन विभाग में लगी इस गामा कैमरे की मदद से हड्डियों, यूट्रिस में समस्या और थॉयरायड की बीमारी का पता लगाया जाता है। अस्पताल में औसतन 10 से 12 मरीजों के टेस्ट रोज होते थे।

अब मशीन को बदलना ही विकल्प मशीन की वैल्यू खत्म हाे गई है। इसमें काेबाल्ट यूनिट रिप्लेस किया जाना है। यह पार्ट ही मरीज के कैंसर कहां तक फैला है वहां की तस्वीरे देता है। मगर जब यह पार्ट एक बार खराब हाे जाता है ताे इसे ठीक करवाने का फायदा नहीं हाेता, क्याेंकि इसमें सही तस्वीरें नहीं अाती। एेसे में अब मशीन काे रिप्लेस करना ही विकल्प है। उनका कहना है कि जब वह विभागाध्यक्ष थे उस समय भी इस मशीन की जगह दूसरी मशीन खरीद के लिए कई पत्र लिखे। मगर काेई फायदा नहीं हुअा। उनका कहना है कि मरीजाें का इलाज डाॅक्टराें की प्राथमिकता रहती है। एेसे में जब तक सही मशीनरी नहीं मिलती डाॅक्टराें काे भी इलाज करने में दिक्कतें अाती है

एक्सपर्ट

व्यू

डाॅ अारके सीम, कैंसर अस्पताल के रैडियाेथैरेपी विभाग के पूर्व एचअाेडी

शरीर के अंदर फैले कैंसर का लगाती है सही पता जिस तरह शरीर की अंदरूनी बीमारी के जांच के लिए एक्स-रे करवाया जाता है, जिससे अंदर की बीमारी का पता लगता है। इसी तरह गामा कैमरा मशीन भी शरीर के अंदर फैले कैंसर की जांच करती है, जिससे कैंसर की चाैथी स्टेज में कैंसर हड्डियाें में कहा तक फैला है उसका पता लगता है। इससे यह सटीक पता चलता है कि मरीज काे कहां तक है अाैर डाॅक्टर वहीं से अपना इलाज शुरू करते हैं। अगर सही स्टेज का पता न चले ताे डाॅक्टराें काे भी इलाज के लिए परेशानी अाती है। नहीं ताे डाॅक्टराें काे यही पता करने में काफी समय लग जाता है कि कैंसर कितना फैल चुका है। जब तक डाॅक्टर इसका पता लगाते हैं तब तक कैंसर काफी बढ़ चुका हाेता है।

राेजाना अाते हैं लगभग 50 मरीज कैंसर अस्पताल में राेजाना 100 से 150 मरीज जांच के लिए अाते हैं। इसमें जिन मरीजों काे कैंसर डिटेक्ट हाेता हैं, उसमें करीब 50 मरीज एेसे हाेते हैं जिन्हें मजबूरन यह टेस्ट लिखना पड़ता है। क्याेंकि डाॅक्टराें काे यह पता नहीं चल पाता कि मरीज काे चाैथी स्टेज में कैंसर कहां तक फैल चुका है। एेसे में उन्हें पीजीआई जाने की सलाह दी जाती है। गरीब तबके के लाेग ताे खर्चे के डर से जा नहीं पाते, वहीं अन्य मरीजों काे भी काफी पैसा खर्च करके पीजीआई पहुंचना पड़ता है।


पीजीअाई रेफर हुए तो अाने-जाने का खर्चा अलग, डेट भी नहीं मिलती गामा कैमरा मशीन स्कैनिंग के लिए आईजीएमसी में 400 से 800 रुपए तक फीस ली जाती थी। मगर निजी अस्पतालों में ये टेस्ट करीब आठ हजार रुपए में होता है। इसके अलावा आईजीएमसी शिमला से चंडीगढ़ जाने में भी पांच से छह हजार रुपए खर्चा अाता है। एेसे में मरीजों काे यह टेस्ट करीब 10 से 15 हजार रुपए में पड़ता है। यही नहीं पीजीअाई में मरीजाें काे एक बार में डेट नहीं मिलती। उन्हें कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे उनका काफी खर्चा हाे जाता है। यहां पर अाने वाले सभी मरीजों काे पीजीआई भेजा जा रहा है। एेसे में जब तक यह मशीन ठीक नहीं हाेती मरीजों के लिए परेशानी हाेना तय है।

मरीजों को टेस्ट के अाईजीएमसी में 400 से 800 रुपए तो प्राइवेट हॉस्पिटल्स में चुकाने पड़ते हैं 8000 रुपए तक
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