Hindi News »Himachal »Thiyog» विद्यानंद को मिला राष्ट्रीय संगीत अकादमी पुरस्कार

विद्यानंद को मिला राष्ट्रीय संगीत अकादमी पुरस्कार

प्रसिद्ध लोक संस्कृति कर्मी विद्यानंद सरेईक को लोक सांस्कृतिक विधाओं खासकर हिमाचल लोकसंगीत के संरक्षण के कार्य...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 04, 2018, 02:10 AM IST

प्रसिद्ध लोक संस्कृति कर्मी विद्यानंद सरेईक को लोक सांस्कृतिक विधाओं खासकर हिमाचल लोकसंगीत के संरक्षण के कार्य के लिए वर्ष 2016 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला है। सरेईक को यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद ने इस साल 17 जनवरी को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में प्रदान किया। उन्हें यह पुरस्कार हिमाचल की कई प्राचीन लोक संगीत, नाट्य आदि विधाओं पर कार्य के लिए दिया गया है जिनमें ठोडा, सिंहटू, बढ़ालटू, देव पूजा पद्धति, पांजड़े आदि शामिल हैं। सरेईक ने इसके अलावा गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर की रचना गीतांजली से 51 कविताओं का सिरमौरी बोली में अनुवाद किया है।

सरेईक चार साल की आयु में अपनी संस्कृति से जुड़ गए थे। पिता देव संस्कृति से जुड़े होने के कारण उनके पहले गुरू बने। ठियोग व सिरमौर सहित प्रदेश में जहां जहां देव संस्कृति है वहां का संगीत व नृत्य देवी देवताओं से जुड़ा हुआ है। हमारी संस्कृति में कई ताल व नृत्य शैलियां हैं। सिरमौर में मुखौटा नृत्य सिंहटू लुप्त होती विधा है। नाटी में प्राचीन ताल गुम हो रहे हैं। हमारे लोक में जीवन से मृत्यु और बसंत से शिशिर तक बजाई जाने वाली तालें व संगीत है। उनका उद्येश्य है कि यह पंरपराएं आगे बढ़ें। चूड़धार में भेड़ें चराने वाले बच्चों पर आधारित बढ़ेलटू लोकगाथा का भी वर्णन किया। जिसमें एक भेड़ चराने वाले बालक का हाथ कट जाने पर उसके वहां मिलने वाली जड़ी बूटी काटिया का वर्णन है जो घाव को भर देती है।

लोकगीतों, लोकसाहित्य के अलावा अन्य लोकविधाओं के संरक्षण में बहुमूल्य योगदान

राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद से पुरस्कार प्राप्त करते विद्यानंद सरेईक।

लोक विधाओं के लुप्त होने पर चिंता

विद्यानंद सरैईक ने कहा कि आज प्रदेश में प्राचीन लोक विधाओं पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा हैं। सरैईक ने कहा वे चाहते हैं कि हमारी पहचान ये सारी विधाएं बची रहें ओर इसके लिए सभी को मिलजुलकर प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने सिरमौर व साथ लगते ठियोग क्षेत्र में कई प्राचीन विधाओं के अब तक जीवित रहने पर संतोष जताते हुए बताया कि वे गिरी नदी के साथ-साथ खड़ापत्थर से लेकर नदी के अंतिम स्थल डाकपत्र तक की लोकविधाओं पर कार्य कर रहे हैं। इसमें नाटी से लेकर करयाला और कई लोकगाथाएं भी शामिल हैं। सरैईक ने लोकगायकों किशनलाल सहगल, किशन वर्मा, महेन्द्र राठौर आदि को प्राचीन तालों के संवर्धन के लिए याद किया।

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Thiyog

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×