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​चंद्रबाबू या जगन रेड्डी!

चंद्रबाबू नायडू और जगन रेड्डी ने बीजेपी को दुविधा में डाल रखा है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Feb 06, 2018, 11:35 AM IST

​चंद्रबाबू या जगन रेड्डी!

चंद्रबाबू या जगन रेड्डी!
चंद्रबाबू नायडू और जगन रेड्डी ने बीजेपी को दुविधा में डाल रखा है। जगन रेड्डी एनडीए में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन चंद्रबाबू पहले से ही एनडीए में हैं। आंखें भी दिखा लेते हैं और फिलहाल के लिए मान भी जाते हैं। लेकिन बीजेपी क्या करे? बीजेपी आकलन कर रही है कि 2019 में कौन ज्यादा शक्तिशाली साबित होगा। जगन या चंद्रबाबू? बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने बाबू से भी मुलाकात की है और जगन से भी संपर्क में है। उधर चंद्रबाबू भी वही आकलन कर रहे हैं, जो बीजेपी कर रही है। माने, 2019 में एनडीए में रहना फायदेमंद रहेगा या नहीं।

डेवी ले डूबा डेनमार्क को
मोदी जल्द ही स्वीडन जा रहे हैं, लेकिन वे डेनमार्क नहीं जा रहे हैं। हालांकि डेनमार्क चाहता था कि मोदी वहां भी आएं। डेनमार्क ने मोदी का तब भी समर्थन किया था, जब वह प्रधानमंत्री नहीं बने थे। लेकिन किम डेवी के प्रत्यर्पण को लेकर अजीत डोभाल बहुत गंभीर हैं और उन्होंने डेनमार्क यात्रा के प्रस्ताव का बहुत सशक्त विरोध किया है। इसीलिए प्रधानमंत्री वहां नहीं जा रहे हैं।

ओनली डेटिंग, नो मैरिज
वाजपेयी के एनडीए की तीन फांस थीं- ममता, समता, जयललिता। अब यही हाल यूपीए का है। शरद पवार ने विपक्षी नेताओं की बैठक बुलाई और सपा-बसपा-डीएमके के अलावा ममता ने भी इस बैठक का बॉयकाट कर दिया। प्रफुल्ल पटेल ने दिनेश त्रिवेदी से अनुरोध किया था, त्रिवेदी गए भी, लेकिन ममता ने वीटो कर दिया। क्यों? दो बातें हैं। एक यह कि ममता बनर्जी राहुल गांधी के अहंकार से परेशान हैं। दूसरा यह कि दीदी को भरोसा है कि 2019 में विपक्ष में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी वही होंगी। फिर यूपीए की संयोजक वह क्यों न बनें? वास्तव में ममता राहुल से इतनी नाराज हैं कि वह कह चुकी हैं कि अब कांग्रेस से रिश्ते रोजाना के हिसाब से देखेंगी। कोई एकमुश्त या पक्का सौदा नहीं।

बदल चुका समय
प्रधानमंत्री फिलीस्तीन जा रहे हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि यह इजरायल को खटकेगा। जरा भी नहीं। समय बदल चुका है। अब खुद इजरायल सरकार दुनिया से कह रही है कि हमने इस मुद्देका समाधान कर लिया है। अराफात रहे नहीं। अब इजरायल दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह फिलीस्तीन के खिलाफ नहीं है। राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी ने फिलीस्तीन का दौरा किया था। अब इजरायल को भारत-फिलीस्तीन से ज्यादा भारत के साथ रक्षा व्यापार में रुचि है।

जो भी होगा, टाइम पर ही होगा
बहुत से बीजेपी नेता यह चर्चाकरते देखे जा सके हैं कि प्रधानमंत्री 2019 के चुनाव समय से पहले करा लेंगे। लेकिन सूत्र इससे इनकार करते हैं। वास्तव में आडवाणी ने वाजपेयी पर चुनाव 6 महीने पहले कराने के लिए दबाव डाला था, लेकिन अब आडवाणी को इसका अफसोस होता है और वह कहते हैं कि यह मेरी गलती थी।

पुश्तों का सवाल है माई-बाप
इस बार कुछ अर्थशास्त्रियों ने सरकार को सुझाव दिया था कि विरासत पर टैक्स लगा दिया जाए, जिससे सरकार कुछ राजस्व एकत्र करके राजस्व घाटे से निपट सके। लेकिन इसकी सुगबुगाहट लगी, तो सभी उद्योगों ने इसका विरोध करने का संकेत दे दिया। चतुर अरुण जेटली तुरंत समझ गए कि सभी औद्योगिक घराने अपने अंदाज में बेहद सामंतशाही हैं। इसीलिए वे चाहते थे कि सरकार कॉर्पोरेट टैक्स भले ही वसूल ले, लेकिन उत्तराधिकार पर कर न लगाए।

इस्तीफा, अभी शर-शैया पर
चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी के प्रमुख मुकेश खन्ना ने अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया है। उनका कहना है कि वह बच्चों के लिए ठीक से काम नहीं कर पा रहे हैं। स्मृति ईरानी मंत्री हैं और चर्चायह है उन्होंने अभी तक इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। स्मृति भी उसी दुनिया से आई हैं और वह मुकेश खन्ना को व्यक्तिगत रूप से भी जानती हैं। स्मृति मुकेश खन्ना से बात करना चाहती हैं। मुकेश को समस्या स्मृति ईरानी से नहीं, बल्कि शायद कुछ अधिकारियों से है। और स्मृति ईरानी जानना चाहती हैं कि आखिर मामला क्या है।

नाम अच्छा है
आपको कर्नाटक के पूर्व डीजीपी एचटी सांगलियान याद हैं, जो सेवानिवृत्ति के बाद एक बार बीजेपी में शामिल हो गए थे और उन्हें भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे पर लोकसभा में पार्टी की लाइन के खिलाफ मतदान करने पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था? उन्होंने एक बार सुझाव दिया गया था कि अगर बीजेपी-भारतीय जीसस पार्टी- नाम से एक और पार्टी गठित करवा दे, तो उसे ईसाइयों का समर्थन मिल सकता है। तब तो बात आई-गई हो गई थी, अब फिर से याद आ रही है।

दो साल, दो चार्जशीट
दो साल से भी कम समय में साईं मनोहर ने संयुक्त निदेशक और सीबीआई के चंडीगढ़ प्रभारी के तौर पर रिकार्ड के समय में दो चार्जशीट पूरे कर दिए हैं। एक राम रहीम का और दूसरा हुड्डा का।

कोई नहीं सुनने वाला

न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ द्वारा 2002 में दिए गए उच्चतम न्यायालय के सख्त आदेश के बावजूद कि उच्च न्यायालय की रिक्तियों में से एक तिहाई रिक्तियां निचले स्तर की न्यायपालिका के न्यायाधीशों को प्रमोट करके भरी जाएं, एक भी ऐसी भर्ती नहीं की गई है। पद खाली पड़े हैं और ऊपर से निचले स्तर की न्यायपालिका के न्यायाधीश 58 वर्ष 6 माह की उम्र के बाद प्रमोशन का दावा नहीं कर सकते। अब अगली तारीख भला कौन देगा?

व्यापमं की गाज!
एक जाने माने गोपनीय प्रिंटर को यूपीएससी/सीबीएससी के ठेके प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। क्योंकि मध्यप्रदेश के व्यापमं के दौर का प्रिंटर वही था। हालांकि आज तक प्रिंटर के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है।

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