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CJI ने अहम केसों के लिए बनाई कॉन्स्टीट्यूशन बेंच, प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले 4 जज शामिल नहीं

आधार की वैधता और मैरिटल रेप जैसे अहम मामलों पर कॉन्स्टीट्यूशन बेंच को ही करनी है सुनवाई।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 16, 2018, 12:53 PM IST

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    चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने 5 जजों की कॉन्स्टीट्यूशन बेंच का गठन किया है।

    नई दिल्ली. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अहम मामलों की सुनवाई के लिए कॉन्स्टीट्यूशन बेंच का गठन किया। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, बेंच में केसों के अलॉटमेंट और SC के कामकाज पर सवाल उठाने वाले चार सीनियर जजों को जगह नहीं दी गई है। हालांकि, इन जजों ने सोमवार को कोर्ट अटेंड की थी, जिसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने कहा था कि विवाद खत्म हो गया है। हालांकि, अभी ये कन्फर्म नहीं हो पाया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल चार जजों से CJI ने मुलाकात की या नहीं। बता दें कि 12 जनवरी को जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस जोसेफ कुरियन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर केसों के अलॉटमेंट और अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए थे।

    कॉन्स्टीट्यूशन बेंच में कौन-कौन शामिल?

    - ऑफिशियल इन्फॉर्मेशन के मुताबिक, CJI दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली कॉन्सटीट्यूशन बेंच में जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल किए गए हैं। ये बेंच 17 जनवरी से अहम मामलों की सुनवाई शुरू करेगी।

    किन मामलों की सुनवाई करेगी कॉन्सटीट्यूशन बेंच?

    - सोर्सेस के मुताबिक, "5 जजों की बेंच आधार एक्ट की संवैधानिक मान्यता, 2013 में गे सेक्स री-क्रिमिनिलाइजेशन पर दिए अपने फैसले पर सुनवाई करेगी। इसके अलावा केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन, एडल्टरी पर बने एक कानून की वैधता पर भी बेंच को सुनवाई करनी है। इस कानून के तहत किसी शादीशुदा महिला से एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखने पर सिर्फ आदमियों को ही सजा मिल सकती है।

    - इसके अलावा क्रिमिनल केसों का सामना कर रहे लीडर्स के डिसक्वालिफिकेशन के मामले की भी सुनवाई होगी।

    जस्टिस लोया के मामले की सुनवाई कौन करेगा?

    - सुप्रीम कोर्ट के कामकाज की लिस्ट (बिजनेस फॉर टुमारो) के मुताबिक, "जस्टिस लोया की मौत की जांच की दो पिटीशन की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच में होगी।"

    - बता दें कि इस केस की सुनवाई जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच को सौंपे जाने पर भी सीनियर जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल उठाया था।

    जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर SCBA ने क्या कहा था?

    - सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की भी शनिवार को मीटिंग हुई। एसोसिएशन के प्रेसिडेंट विकास सिंह ने कहा था, "हम इस मामले का जल्द से जल्द निपटारा चाहते हैं। हमारा प्रपोजल है कि अब जनहित याचिकओं के मामले सुनवाई चीफ जस्टिस को दी जाए या 5 जजों की कॉलेजियम को सौंपी जाए। हमने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। चारों जजों का खुलेआम मीडिया के सामने आना काफी गंभीर बात है।"

    जस्टिस लोया की फैमिली का क्या कहना है?

    - जस्टिस बीएच लोया के बेटे अनुज लोया ने रविवार शाम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। अनुज ने कहा, "मेरे पिता की मौत संदिग्ध नहीं थी। पिता की मौत हार्टअटैक से हुई थी और हमें इस पर कोई शक नहीं है। कृपया हमें परेशान ना करें।"

    - हालांकि, सोमवार को कांग्रेस लीडर अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जस्टिस लोया की मौत की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि जब कोई मामला लोकतंत्र के किसी बड़े अंग से जुड़ा होता है तो इस पर फैसला फैमिली के किसी एक सदस्य की डिमांड पर तय नहीं किया जा सकता है कि वो जांच चाहता है या नहीं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या बोले थे सीनियर जज?

    - सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने अभूतपूर्व कदम उठाया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद दूसरे नंबर के सीनियर जज जस्टिस जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने शुक्रवार को मीडिया में 20 मिनट बात रखी। दो जज बोले, दो चुप ही रहे।

    - जस्टिस चेलमेश्वर ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए। कहा- "लोकतंत्र दांव पर है। ठीक नहीं किया तो सब खत्म हो जाएगा।" चीफ जस्टिस को दो महीने पहले लिखा 7 पेज का पत्र भी जारी किया। इसमें कहा गया है कि चीफ जस्टिस पसंद की बेंचों में केस भेजते हैं। चीफ जस्टिस पर महाभियोग के सवाल पर बोले कि यह देश तय करे। उन्होंने जज लोया की मौत के केस की सुनवाई पर भी सवाल उठाए।

    जजों ने चीफ जस्टिस पर क्या आरोप लगाए?

    1.चीफ जस्टिस ने अहम मुकदमे पसंद की बेंचों को सौंप दिए। इसका कोई तर्क नहीं था। यह सब खत्म होना चाहिए। कोर्ट में केस अलॉटमेंट की मनमानी प्रॉसेस है।

    2. जस्टिस कर्णन पर दिए फैसले में हममें से दो जजों ने अप्वाइंटमेंट प्रॉसेस दोबारा देखने की जरूरत बताई थी। महाभियोग के अलावा अन्य रास्ते भी खोलने की मांग की थी।

    3. कोर्ट ने कहा था कि एमओपी में देरी न हो। केस संविधान पीठ में है, तो दूसरी बेंच कैसे सुन सकती है? कॉलेजियम ने एमओपी मार्च 2017 में भेजा पर सरकार का जवाब नहीं आया। मान लें कि वही एमओपी सरकार को मंजूर है।

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