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ISRO को झटका: GSAT-6A से लॉन्चिंग के 48 घंटे बाद ही संपर्क टूटा, पिछले साल भी फेल हुआ था एक स्पेस मिशन

इसरो ने पहली बार जीसैट-6ए में नए इंजन का इस्तेमाल किया है। इसे लैम (liquid apogee motor) कहा जाता है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Apr 01, 2018, 02:57 PM IST

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    इसरो ने पहली बार जीसैट-6ए में नए इंजन का इस्तेमाल किया है। इसे लैम (liquid apogee motor) कहा जाता है।

    नई दिल्ली. इंडियनस्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) को अपने एक अहम मिशन में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। गुरुवार को लॉन्च किए गए GSAT-6A का संपर्क इसरो के कम्युनिकेशन विंग से टूट गया है। इसरो ने अपनी वेबसाइट पर खुद इसकी जानकारी देते हुए कहा कि कम्युनिकेशन बहाल करने की कोशिशें जारी हैं। बता दें कि इसके पहले पिछले साल 31 अगस्त 2017 को भी स्पेस एजेंसी का एक मिशन नाकामयाब हो गया था।

    LAM इंजन का इस्तेमाल
    - इसरो ने पहली बार जीसैट-6ए में नए इंजन का इस्तेमाल किया है। इसे लैम (liquid apogee motor) कहा जाता है।
    - वेबसाइट पर बताया गया है कि कम्युनिकेशन उस वक्त टूटा जब फाइनल राउंड के लिए कनफिगरेशन प्रॉसेस किया जा रहा था।

    कब किया गया था लॉन्च?

    - इसरो ने 29 मार्च को जीएसएलवी-एफ08 रॉकेट के जरिए जीसैट-6ए को लॉन्च किया था। इसे पृथ्वी से 35,900 किलोमीटर ऊपर कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर लिया गया था।
    - 31 मार्च को 53 मिनट की फायरिंग प्रॉसेस की गई। यह कक्षा में दूसरी स्थापना के लिए किया जाता है। 1 अप्रैल की सुबह जब जीसैट को नॉर्मल ऑपरेशन के लिए तीसरे राउंड की फायरिंग के लिए बूट किया गया तो इसका संपर्क इसरो की कम्युनिकेशन विंग से टूट गया।

    अब कितनी दिक्कत?
    - जानकारों की मानें तो इसरो को सैटेलाइट की लॉन्चिंग में महारत हासिल है। कक्षा यानी ऑर्बिट में स्थापित करने के बाद भी सैटेलाइट को नॉर्मल फंक्शन के लिए टेस्ट किया जाता है और इसमें कई बार दिक्कतें सामने आती हैं।
    - कहा जा रहा है कि इसरो इस सैटेलाइट को फिर से कम्युनिकेट करने में कामयाब हो जाएगा। लेकिन, हो सकता है कि इसमें कुछ वक्त लगे।

    ये भी पढ़ें: GSAT-6A सैटेलाइट से इसरो का संपर्क टूटा, दोबारा लिंक करने की कोशिश में जुटे वैज्ञानिक

    GSAT-6A से क्या होगा?
    - रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2140 किलोग्राम के इस सैटेलाइट से बेहद दूर-दराज के इलाकों में भी संचार सेवाएं आसानी से स्थापित करने में मदद मिलेगी। इसके लिए बड़े टॉवरों की जगह हैंड-हैल्ड टर्मिनल्स का इस्तेमाल किया जा सकेगा। GSAT-6A का इस्तेमाल 10 साल तक किया जा सकेगा।
    - दूर-दराज और दुर्गम इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों के लिए तो इस सैटेलाइट का खासा महत्व है। उनके लिए देश के किसी भी हिस्से में संपर्क करना बेहद आसान हो जाएगा।
    - इस तरह के 9 सैटेलाइट इसरो अगले 9 महीने में लॉन्च करने वाला है।

    जानिए कैसा है हमारा जीसैट-6ए
    - 270 करोड़ रुपए लागत
    - 21.40 क्विंटल वजन
    - 1.53X1.56X2.4 साइज

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    गुरुवार को लॉन्च किए गए GSAT-6A का संपर्क इसरो के कम्युनिकेशन विंग से टूट गया है।
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