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शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को कांची पीठ में दी गई महासमाधि, 1 लाख लोगों ने किए दर्शन

जयेंद्र सरस्वती का जन्म 18 जुलाई 1935 को तमिलनाडु में हुआ। वह कांची मठ के 69वें शंकराचार्य थे।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Mar 01, 2018, 11:22 PM IST

    • वैदिक हवन-पूजन के बाद जयेंद्र सरस्वती का वृंदावन भवन में प्रवेश हुआ। यहां महासमाधि के लिए 7X7 फीट का गड्ढा खोदा गया।

      चेन्नई.सबसे बड़े हिंदू मठ कांची कामकोटि पीठ के प्रमुख और 69वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को गुरुवार को अंतिम विदाई दी गई। करीब 3 घंटे तक चले वृंदावन प्रवेशम् (अंतिम संस्कार प्रक्रिया) में सबसे पहले उनका दूध और शहद से अभिषेक किया गया। वैदिक हवन-पूजन के बाद मठ के वृंदावन भवन में महासमाधि दी गई। जयेंद्र सरस्वती (83) का बुधवार को कांचीपुरम के हॉस्पिटल में निधन हो गया था। गुरुवार सुबह तक कांची मठ में 1 लाख से ज्यादा लोगों ने उनके अंतिम दर्शन किए। बता दें कि जयेंद्र ने 65 साल तक पीठ की गद्दी संभाली। अब शंकर विजयेंद्र सरस्वती उनकी जगह लेंगे।

      वैदिक विधि से अंतिम संस्कार

      - मठ के मैनेजर सुंदरेशन ने बताया कि वैदिक विधि से शंकराचार्य के वृंदावन प्रवेशम् (अंतिम संस्कार) की तैयारियां की गईं।

      - इस दौरान दूध और शहद से शंकराचार्य का अभिषेक करने के बाद उनकी देह को सजाया गया। वैदिक हवन-पूजन के बाद जयेंद्र सरस्वती का वृंदावन भवन में प्रवेश हुआ। यहां महासमाधि के लिए 7X7 फीट का गड्ढा खोदा गया।

      - यही रस्म 1993 में शंकराचार्य के गुरु चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के निधन के बाद उनके लिए भी कराई गई थी।

      संन्यासियों की देह को इसलिए नहीं दी जाती अग्नि
      - शैव परंपरा में संन्यासियों का अंतिम संस्कार समाधि से होता है। इसे महासमाधि कहा जाता है। मृत्यु के बाद शैव संन्यासी के शव को समाधि की मुद्रा में बैठाया जाता है। संन्यासी परंपरा के अनुसार उन्हें केसरिया (भगवा) वस्त्र पहनाया जाता है। रुद्राक्ष की माला, फूलों की माला, भस्म से उनको सजाया जाता है।
      - शवयात्रा को महासमाधि यात्रा के रुप में निकाला जाता है जिसमें पार्थिव देह को पालकी या रथ में बैठाकर निकाला जाता है। इसके बाद आश्रम या मठ में ही किसी स्थान पर 7 फीट गहरी समाधि बनाकर उसमें अंतिम संस्कार किया जाता है।
      - पार्थिव देह को पद्मासन (पालथी की मुद्रा) में ही समाधि दी जाती है। शैव संन्यासियों का अंतिम संस्कार उनकी गादी के उत्तराधिकारी या शिष्यों द्वारा ही किया जाता है। शैव परंपरा में सारे उत्तरकार्य 16वें दिन किए जाते हैं। जिसमें उनके उत्तरकार्य के साथ ही उत्तराधिकारी का अभिषेक भी होता है। इसे षोडशी कर्म कहा जाता है।

      चारों वेदों के ज्ञाता थे शंकराचार्य

      - जयेंद्र सरस्वती का जन्म 18 जुलाई 1935 को तमिलनाडु में हुआ। वे कांची मठ के 69वें शंकराचार्य थे। जयेंद्र 1954 में शंकराचार्य बने थे। इससे पहले उनका नाम सुब्रमण्यन महादेव अय्यर था। उन्हें सरस्वती स्वामिगल का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। तब उनकी उम्र महज 19 साल थी।

      - जयेंद्र 65 साल तक शंकराचार्य रहे। 2003 में उन्होंने बतौर शंकराचार्य 50 साल पूरे किए थे। 1983 में जयेंद्र सरस्वती ने शंकर विजयेन्द्र सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

      जयेंद्र को हत्या के मामले में जेल भी जाना पड़ा

      - जयेंद्र सरस्वती को शंकररमन हत्याकांड मामले में गिरफ्तार किया गया। हालांकि बाद में उन्हें बरी कर दिया गया था। इस केस में कांचीमठ के शंकराचार्य और उनके सहयोगी मुख्य आरोपी थे। उस समय तमिलनाडु में जयललिता की सरकार थी। जयललिता जयेंद्र सरस्वती को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं। जिस वक्त जयेंद्र को पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो वह ‘त्रिकाल संध्या’ कर रहे थे।

      अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश कर रहे थे शंकराचार्य

      - जयेंद्र सरस्वती एक समय अयोध्या विवाद के हल के लिए काफी सक्रिय थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अयोध्या मसले के समाधान की कोशिशों के लिए शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की सराहना की थी। जयेंद्र ने 2010 में ये दावा किया था कि वाजपेयी सरकार अयोध्या विवाद सुलझाने के करीब पहुंच गई थी। वह संसद में कानून बनाना चाहती थी।

      शंकराचार्य के लिए कलाम ने अपनी कुर्सी छोड़ दी थी

      - जयेंद्र सरस्वती जब पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे, तब कलाम ने जयेंद्र को अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। जयेंद्र बोले ये क्यों किया? तब कलाम ने कहा- ताकि इस कुर्सी पर हमेशा आपका आशीर्वाद बना रहे।

      क्या है कांची मठ?
      - कांची मठ की स्थापना खुद आदि शंकराचार्य ने की थी। यह कांचीपुरम में स्थापित सबसे बड़ा हिंदू मठ है। यह 5 पंचभूतस्थलों में से एक है। यहां के मठाधीश्वर को शंकराचार्य कहते हैं।

      कांची मठ के अलावा आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में स्थापित किए ये मठ

      1. शृंगेरी मठ

      -शृंगेरी शारदा पीठ कर्नाटक के चिकमंगलुर में है। यहां दीक्षा लेने वाले संयासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती, पुरी लगाया जाता है।

      2. गोवर्धन मठ

      - गोवर्धन मठ ओडिशा के पुरी में है। इसका संबंध भगवान जगन्नाथ मंदिर से है। इसमें बिहार से ओडिशा व अरुणाचल तक का भाग आता है।

      3. शारदा मठ

      - द्वारका मठ को शारदा मठ कहा जाता है। यह गुजरात में द्वारकाधाम में है। यहां दीक्षा लेने वाले के नाम के बाद तीर्थ और आश्रम लिखा जाता है।

      4. ज्योतिर्मठ

      - ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में है। यहां दीक्षा लेने वाले के नाम के बाद गिरि, पर्वत और सागर का विशेषण लगाया जाता है।

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      यही रस्म 1993 में शंकराचार्य के गुरु चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के निधन के बाद उनके लिए भी कराई गई थी।
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      बुधवार को शंकराचार्य के निधन के बाद 1 लाख से ज्यादा लोगों ने उनके दर्शन किए।
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      जयेंद्र सरस्वती ने 65 साल तक कांची कामकोटि पीठ की गद्दी संभाली।

      उन्होंने 65 साल तक कांची कामकोटि की गद्दी संभाली।

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      पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने शंकराचार्य को अपनी कुर्सी पर बैठाया था। -फाइल
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      जयेंद्र सरस्वती 19 की उम्र में कांची मठ के शंकराचार्य बने थे। -फाइल
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