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रियल इंडिया इंक में कायम रखें भरोसा

पिछले कुछ दिनों से नेशनल मीडिया में चल रहे इवेंट्स को देखें तो ऐसा महसूस होता है कि वही पुराने शो रिपीट किए जा रहे हैं।

Danik Bhaskar

Mar 07, 2018, 08:51 PM IST

पिछले कुछ दिनों से नेशनल मीडिया में चल रहे इवेंट्स को देखा जाए तो ऐसा महसूस होता है कि वही पुराने शो रिपीट किए जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि नीरव मोदी द्वारा भारतीय बैंकों में किए गए फ्रॉड को बताने वाला कोई भी खुलासा अब बाकी नहीं रह गया। इस तरह की घटनाएं इंडियन इकोनॉमी के लिए कांटे की तरह हैं और यह पॉलिटिक्स में आरोप-प्रत्यारोप के गेम को उकसाने वाली हैं। और इन्हीं सब झूठे प्रोपेगेंडा के जरिए कॉमन मैन शायद मिसलीड हो रहा है।

हाल ही में सामने आईं कमियों को लेकर इंडियन बैंकिंग सिस्टम को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। कई कंपनियों के समूह को भी फ्रॉड करने वाली कंपनियों की तरह जीना पड़ रहा है, यह भयावह है। यह सभी जानते हैं कि पिछले सालों में कई बड़े इंडियन पावरहाउसेस जैसे रिलायंस, टाटा ने अपने एंटरप्राइज को आगे बढ़ाने के लिए बैंकों से मोटा लोन लिया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इन्हें भी फ्रॉड करने वाली फर्म्स की तरह देखा जाए। कुछ चीजें ऐसी हैं जो इस तरह के प्रोपेगेंडा फैलाने वाले आप तक नहीं पहुंचाना चाहते। ऐसी कंपनियों के बीच एक सख्त लाइन खींची जानी चाहिए जो लोन लेकर फ्रॉड करती हैं और जो ऐसा कभी नहीं करतीं।

कॉरपोरेट लोन इकोनॉमी को ड्राइव करता है
सच्चाई ये है कि लोन इकोनॉमी का एक बहुत महत्वपूर्ण पार्ट है। इसके जरिए बिजनेस में रिजर्व कैश से आगे बढ़कर एक बड़ा इन्वेस्टमेंट हो पाता है। जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होता है और इकोनॉमी को ग्रोथ मिलती है। जितना बड़ा लोन होता है, उतनी तेजी से बिजनेस फैलता है जिससे राष्ट्र निर्माण होता है। कॉरपोरेट्स से जो हाई इंटरेस्ट लिया जाता है वो बैंकों के खजाने में जाता है, जिससे जीडीपी मजबूत होती है।

अभी कुछ पॉलिटिशियन पूरी तरह से अलग-अलग दो मुद्दों को रिलेट कर रहे हैं। वे कॉरपोरेट लोन को किसान लोन से कम्पेयर कर रहे हैं। राज्यसभा में ऐसा नई कंट्रोवर्सी को पैदा करने के लिए किया जा रहा है। यह निराशाजनक है कि हाल ही में हुए बैंक स्कैंडल्स के बहाने आम आदमी की भावनाओं का फायदा उठाना आसान हो गया है, जबकि वो वास्तव में फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस की प्रॉसेस को मुश्किल से ही समझ पाता है।

सोशल मीडिया पर मिसलीड करने वाले मैसेजेस ने देश में अस्थिरता का माहौल बना दिया है। इससे इकोनॉमिक अस्थिरता के साथ प्रतिष्ठित कंपनियों के इन्वेस्टर्स का कॉन्फिडेंस घटा है। जबकि यही इकोनॉमी को तेज रफ्तार देने के काम में लगे हैं। पिछले सालों में इन कंपनियों के संगठन ने लाखों जॉब क्रिएट की हैं। वर्ल्ड क्लास का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है। देश के सोशल-इकोनॉमिक डेवलपमेंट में दिल-खोलकर इन्वेस्ट किया है।

कंपनीज एक्ट, 2013 के तहत सभी कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वे हर साल अपने एवरेज नेट प्रोफिट का 2 परसेंट CSR इनिशिएटिव में दें। अधिनियम की शुरुआत के बाद से दो वित्तीय वर्ष में 12,431 कंपनियां 18,625 करोड़ रुपए सोशल वेलफेयर एक्टिविटीस के लिए दे चुकी हैं। इसी तरह रिलायंस ने देश के लिए महत्वपूर्ण एनर्जी असेट क्रिएट की और कंपनी इनोवेशन और फिलॉन्थ्रपी को लगातार आगे बढ़ा रही है। वहीं, महिंद्रा ग्रुप दुनिया के 100 राष्ट्रों में संचालन कर रहा है। अडानी फाउंडेशन बहुत ही महत्वपूर्ण चार एरिया; एजुकेशन, कम्युनिटी हेल्थ, सस्टेनेबल लाइवली हुड प्रोग्राम और रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट पर काम कर रहा है। आखिरकार इन ब्रांड्स की सक्सेस राष्ट्र की समृद्धि को मजबूत करती है। इससे बने विश्वास पर बैंक असेट के अगेंस्ट लोन देते हैं, जिससे राष्ट्र निर्माण होता है।

कुछ मीडिया ग्रुप्स ने अडानी ग्रुप के खिलाफ भी बेबुनियाद आरोप लगाए हैं कि अडानी ग्रुप देश की कॉरपोरेट लोन पॉलिसी को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। इससे गलत ओपिनियन बन रहा है, जबकि फैक्ट्स और नंबर्स एक अलग कहानी सामने लाते हैं। इकोनॉमिक्स को अच्छे से समझने वाला कोई भी पर्सन जानता है कि ऋण का एकमात्र टेस्ट उसकी रेग्युलर सर्विसिंग से होता है। इस टेस्ट में लोन के अगेंस्ट की जाने वाली रीपेमेंट की एबिलिटी भी शामिल है। अडानी ग्रुप ने शुरुआत से ही इसका पालन किया है।

इन सबके बीच आम आदमी के लिए सुझाव है कि गलत तथ्यों और अफवाहों के आधार पर राय बनाने से बचना चाहिए। साथ ही आसानी से अफवाहों को फैलाए जा सकने वाले माहौल में तभी सही राय बनाई जा सकती है जब हम सही तथ्यों से परिचित हों।

हम सभी के लिए अगर कभी राष्ट्र के दूरदर्शी लोगों पर विश्वास रखने का समय था जिन्होंने कभी किसी तरह के फंड का गबन नहीं किया, तो वो अब है।

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