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Analysis: बीजेपी ने ढाई साल में लेफ्ट के सामने मजबूत काडर खड़ा किया, त्रिपुरा में ‘वन बूथ-टेन यूथ’ से मिली जीत

बीजेपी को त्रिपुरा की जीत से ज्यादा उत्साह इस बात को लेकर है कि यह वामपंथी विचारधारा पर दक्षिणपंथी विचारधारा की जीत है।

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 09:22 AM IST
नरेंद्र मोदी ने इसे भय और भ्रम नरेंद्र मोदी ने इसे भय और भ्रम

नई दिल्ली. ‘नरेंद्र मोदी जी कांग्रेस मुक्त भारत कर रहे हैं, लेकिन हम आपको कम्युनिस्ट मुक्त भारत का दायित्व देते हैं।’ ये बात सुनील देवधर को त्रिपुरा का प्रभारी बनाते वक्त नवंबर, 2014 में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कही थी तो उस वक्त वे बेहद सहज नहीं थे। पर 600 दिनों से त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में किराए के मकान में रहकर पार्टी की रणनीति को अंजाम देने वाले देवधर को अब शाह की साढ़े तीन साल पुराने कमेंट का मर्म समझ आ रहा है। पार्टी ने ढाई साल में लेफ्ट के सामने मजबूत काडर खड़ा किया और जीत के लिए ‘वन बूथ-टेन यूथ’ का फॉर्मूला अपनाया। बीजेपी के लिए त्रिपुरा की जीत इसलिए अहम है कि यह वामपंथी विचारधारा पर दक्षिणपंथी विचारधारा की जीत है। पहली बार बीजेपी ने किसी वामपंथी गढ़ में जीत हासिल की।

त्रिपुरा में काम आई यूपी जैसी चुनावी रणनीति

- दरअसल, बीजेपी की इस जीत के पीछे मजबूत काडर खड़ा करने की रणनीति रही। पार्टी ने 2014 में त्रिपुरा में पहले मंडल स्तर पर मोर्चों का गठन किया, फिर बूथ कमेटियों का गठन शुरू हुआ।
- राज्य के 3214 बूथों पर यूपी जैसी रणनीति अपनाई। हर बूथ पर बीजेपी ने ‘वन बूथ-टेन यूथ’ का फॉर्मूला अपनाया। साथ ही हर बूथ पर 10-10 महिलाएं, एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और किसानों को भी जोड़ा। 2700 बूथों पर 10-10 महिलाओं की टीम तैयार की।
- त्रिपुरा वोटर लिस्ट के कुल 48,000 पन्नों में से 42,000 पन्नों पर कार्यकर्ता तैनात किए। यानी एक पेज के 60 वोटर पर एक बीजेपी कार्यकर्ता तैनात था। जिसकी ड्यूटी हफ्ते में एक बार सभी वोटर से मिलकर तीन बिंदुओं पर बात करना था। बीजेपी ने क्षेत्रीय दल आईपीएफटी से गठबंधन कर 20 आरक्षित आदिवासी सीटों पर कब्जा किया।

त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में किसे फायदा हुआ?

- बीजेपी को नॉर्थ-ईस्ट के 3 राज्यों में पिछले चुनाव से 61% ज्यादा वोट मिले हैं। पिछली बार 4.5% वोट और एक सीट मिली थी।
- बीजेपी का वोट प्रतिशत 61% बढ़कर 66% हो गया और विधायकों की संख्या भी एक से बढ़कर 48 हो गई है।
- बीते चुनाव में बीजेपी 74 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। 70 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी।
- बीजेपी को त्रिपुरा में 43% वोट मिले। एक राज्य में 40% वोट का इजाफा करने वाली पहली पार्टी बनी।
- त्रिपुरा में कांग्रेस का वोट बैंक 36.53% से 1.8% रह गया। पिछली बार 10 सीट मिली थी। इस बार खाता नहीं खुला।

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# यूपी फॉर्मूला

शाह ने पहले बिप्लव देब को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, फिर देवधर को भेजा
- पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में सबसे पहले राज्य के युवा नेता बिप्लव देब को प्रदेश की कमान सौंपी, जो कभी सांसद गणेश सिंह के पीए थे। उसके बाद संगठन से जुड़े और मोदी के वाराणसी संसदीय सीट के प्रभारी रहे सुनील देवधर को त्रिपुरा का प्रभारी बनाया। फिर अमित शाह ने यूपी चुनाव की तर्ज पर त्रिपुरा में भी बूथ और पन्ना प्रमुख की रणनीति को कारगर ढंग से लागू कराया।

# सबसे बड़ा चेहरा

देवधर ने वाम मोर्चा के बूथ काडर की कमजोरी को हथियार बनाया

- त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर भास्कर से बातचीत में कहते हैं कि वाम काडर कोई मामूली काडर नहीं है। पर उसकी एक कमजोरी है कि सत्ता में आते ही प्रशासन का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण में लग जाता है। जिससे बूथ स्तर का काडर भी पार्टी पर निर्भर हो जाता है और सरकार की योजना में लाभ उठाने लगता है। इसी वजह से बंगाल में वाम काडर खत्म हो गया।

1. त्रिपुरा

50% से ज्यादा बीजेपी कैंडिडेट 5 साल में पार्टी से जुड़े, 200 सांसदों ने डाला डेरा

- त्रिपुरा में बीजेपी के 50% उम्मीदवारों ने पिछले 5 साल में पार्टी की सदस्यता हासिल की है। बीजेपी के 52 केंद्रीय मंत्रियों और 200 से ज्यादा सांसदों और नेताओं ने राज्य में चुनावी रैलियां कीं।
- पीएम मोदी ने राज्य में 4 चुनावी रैलियां कीं। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह 6 रात गुजारी। त्रिपुरा में यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने 7 सभा और चार रोड शो किए। उनमें से 7 जगहों पर पार्टी को जीत मिली।

2. नगालैंड

कांग्रेस का 22% वोट घटा, बीजेपी काे 11 सीट, 50 साल बाद भी नहीं जीती महिला

- बीजेपी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा, 11 पर जीत हासिल की, यह अब तक सबसे बेहतर प्रदर्शन है। राज्य के तीन बार सीएम रहे एनडीपीपी प्रमुख नेफ्यू रियो पहले ही उत्तर अंगामी-2 से निर्विरोध चुने गए हैं।
- नगालैंड में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला है। कांग्रेस 18 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। कांग्रेस को राज्य में महज 2.1% वोट मिले। पिछले बार उसे 8 सीटें और 24.89% वोट मिला था।

3. मेघालय

सरकार बनाने कांग्रेस ने अहमद पटेल को भेजा, बीफ मुद्दा बीजेपी पर भारी पड़ा
- कांग्रेस ने अपने रणनीतिकार अहमद पटेल, मुकुल वासनिक को मेघालय भेजा। ताकि छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार बना सके। राज्य में 10 साल से कांग्रेस की सरकार है।
- मेघालय में बीजेपी को 20 साल बाद 2 सीटे मिलीं हैं। राज्य में 75% वोटर ईसाई हैं, इसलिए कांग्रेस ने बीजेपी को बीफ और चर्च के मुद्दे को लेकर लगातार घेरा। इसका बीजेपी को काफी नुकसान भी हुआ।