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वडाली ब्रदर्स की जोड़ी टूटी: सूफी गायक प्यारेलाल वडाली का अमृतसर में हार्ट अटैक से निधन

प्यारेलाल, अपने बड़े भाई पूरनचंद वडाली के साथ ही गाया करते थे।

Danik Bhaskar

Mar 09, 2018, 11:31 AM IST
प्यारेलाल कुछ वक्त से बीमार चल रहे थे। (फाइल) प्यारेलाल कुछ वक्त से बीमार चल रहे थे। (फाइल)

अमृतसर. सूफी गायक प्यारेलाल वडाली (75) का शुक्रवार को दिल का दौरा पड़ने से अमृतसर में निधन हो गया। प्यारेलाल, अपने बड़े भाई पूरनचंद वडाली के साथ ही गाया करते थे। प्यारेलाल, पूरनचंद को ही अपना गुरु मानते थे। उनकी जोड़ी ने दुनियाभर में अपनी गायकी से एक अलग मुकाम बनाया था। हाल ही में उन्होंने कंगना रणौत की फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ में रंगरेज मेरे....गाया था। यह नंबर बेहद हिट रहा था।

कुछ वक्त से बीमार चल रहे थे प्यारेलाल

- प्यारेलाल कुछ वक्त से बीमार चल रहे थे। इसलिए पूरणचंद अपने बेटे लखविंदर वडाली के साथ स्टेज शेयर कर रहे थे।

- वडाली ब्रदर्स शुरू से ही संगीत में रमे थे। उनके घर में ही संगीत का माहौल था। वो उसी संगीत घराने से थे जिससे उस्ताद बड़े गुलाम अली थे। इसे संगीत के क्षेत्र में पटियाला घराना कहा जाता है।
- कहा जाता है कि वडाली ब्रदर्स फिल्मों में गाने से परहेज करते थे। लेकिन, रंगरेज गाने का जब उन्हें ऑफर मिला तो उन्होंने इनकार नहीं किया। बाद में ये गाना बेहद हिट हुआ।

स्कूल नहीं गए; जो पिता ने सिखाया, वही याद

- उज्जैन में भास्कर से बातचीत में पूरनचंद ने बताया था, “ढाई दशक तक अखाड़ा ही हमारा सबकुछ था। जमकर पहलवानी की। कई खिताब भी जीते। एक दिन पिता ठाकुरदास वडाली आकर बोले- संगीत सीखना होगा। अब पिता का कहना था तो टाल नहीं सकते थे।”
- “पहले उन्होंने ही सिखाया, फिर पं.दुर्गादास और उस्ताद बड़े गुलाम अली खान पटियाला घराना से स्वर साधना सीखी।” जो आज भी जारी है।
- “1975 में जालंधर के गांव हरवल्लभ में पहली बार प्रस्तुति दी थी। यहां मौनतीर्थ पर महर्षि मौनीबाबा के 108वें जन्मोत्सव के अवसर पर सूफी गायन की प्रस्तुति देने आए थे।”

अवार्ड मिला तो भरोसा नहीं हुआ
- पूरनचंद ने बताया कि 1992 में केंद्र सरकार ने संगीत नाटक अवार्ड से सम्मानित किया तो भरोसा ही नहीं हुआ कि जो लोग स्कूल नहीं गए उन्हें सरकार सम्मानित कर रही है।
- 1998 में वडाली बंधुओं को तुलसी अवॉर्ड तो 2003 में पंजाब संगीत अवार्ड दिया गया। 2005 में पूरनचंद को पदमश्री से सम्मानित किया गया।

जुबान पर मत जाइए, सिंधी-पंजाबी में बोलूं तो चलेगा

- “हिंदी में मेरा हाथ जरा तंग है। मेरी जुबान पर मत जाइए। मैं सिंधी-पंजाबी में बोलूं तो चलेगा।” पूर्णचंद वडाली ने यह कहकर सभी का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्होंने हर सवाल का जवाब सिंधी-पंजाबी में ही दिया।
- उन्होंने कहा सूफी गायन की एक विशेषता यह है कि आप भले ही फिल्मी गाने सुनें, आपको यही लगेगा कि प्रार्थना जैसा लग रहा है। असल में सूफी गायन प्रार्थना ही है। संगीत की ऐसी विधा जो आपको सीधे परमात्मा से जोड़ देगी।

कई महान कवियों की रचनाओं को गाया
- वडाली बंधुओं ने बुल्ले शाह, कबीर, अमीर खुसरो और सूरदास के पदों को अपने संगीत में पिरोया। उन्होंने गुरबानी के अलावा गजल और भजन भी गाए।
- 2003 में वडाली बंधुओं की बॉलीवुड में एंट्री हुई। फिल्म पिंजर में उन्होंने गुलजार का लिखा गाना गाया। इसके अलावा उन्होंने धूप, तमिल फिल्म चिक्कू बुक्कु, तनु वेड्स मनु और मौसम फिल्म के लिए भी गाने गाए।
- 2005 में भारत सरकार ने पूरनचंद वडाली को पद्मश्री से सम्मानित किया।

तू माने या न माने दिलदारा

- वडाली ब्रदर्स ने एक से बढ़कर एक सूफी गाने गाए। ‘तू माने या न माने दिलदारा, असां तो तेनू रब मनया...’ हमेशा हिट रहा है। आज भी ये यूट्यूब पर खूब देखा और सुना जाता है। खासतौर पर युवाओं में उनका ये गीत बहुत पसंद किया जाता है।
- हाल ही में लोगों की गुजारिश पर वडाली ब्रदर्स ने इस गाने में कुछ नए अंतरे और ठुमरी के अंंश जोड़े थे। इसके अलावा दमा दम मस्त कलंदर और आवां भी उनके हिट नंबर्स थे।

प्यारेलाल, अपने बड़े भाई पूरनचंद वडाली के साथ ही गाया करते थे। प्यारेलाल, पूरनचंद को ही अपना गुरु मानते थे। (फाइल) प्यारेलाल, अपने बड़े भाई पूरनचंद वडाली के साथ ही गाया करते थे। प्यारेलाल, पूरनचंद को ही अपना गुरु मानते थे। (फाइल)
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