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धारा 377: समलैंगिकता जुर्म है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले पर फिर विचार करेगा

SC ने समलैंगिकता को जुर्म माना था। बेंच धारा 377 के तहत समलैंगिकता को जुर्म मानने के इस फैसले पर फिर विचार करेगी।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 08, 2018, 06:32 PM IST

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    2013 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता (gay sex) को जुर्म करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट 2013 में अपने ही फैसले पर फिर विचार करने जा रहा है। - फाइल

    नई दिल्ली.समलैंगिकता जुर्म है या नहीं? इस पर सुप्रीम कोर्ट फिर से विचार करेगा। 2013 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता (gay sex) को जुर्म करार दिया था। सुप्रीम कोर्टअपने पुराने फैसले पर फिर विचार करने जा रहा है। मामला समलैंगिकता को जुर्म के दायरे में रखने या नहीं रखने का है। कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बदलते हुए बालिग समलैंगिकों के संबंध को गैरकानूनी करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने सोमवार को कहा कि संवैधानिक पीठ आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को जुर्म मानने के इस फैसले पर फिर से विचार करेगा।

    इस बेंच में कौन-कौन है?
    - इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और डी वाय चंद्रचूड़ की बेंच कर रही है।

    यह याचिका किसने दायर की थी?
    - एलजीबीटी कम्युनिटी की तरफ से दायर याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। इन्होंने कोर्ट से अपील है कि जेंडर पहचान नहीं मिलने से उन्हें डर के माहौल में जीना पड़ रहा है। इस बेंच की अध्यक्षता खुद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने की। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक मामला होने के नाते इस फैसले पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है।


    सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया था फैसला

    - समलैंगिकता के इस मामले में 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अंग्रेज सरकार के जमाने से चले आ रहे समलैंगिकता के कानून को बदल दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे क्राइम कैटेगरी से निकाल दिया था।
    - दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। दिसंबर, 2013 में हाईकोर्ट के ऑर्डर को पलटते हुए समलैंगिकता को IPC की धारा 377 के तहत जुर्म की कैटेगरी में बरकरार रखा। दो जजों की बेंच ने इस फैसले पर दायर की गई रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दी थी।

    कपिल सिब्बल ने इसे बताया था गलत

    - सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का तब के कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने विरोध किया था। सिब्बल ने कहा था कि दो बालिगों के बीच आपसी रजामंदी से समलैंगिक संबंध को जुर्म के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहना था कि सरकार समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर लाने के लिए सभी ऑप्शंस पर विचार कर रही है।

    किसने क्या कहा?

    -बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि यदि कोई भी काम प्राइवेसी के तहत होता है, तो उनकी गोपनीयता बरकरार रखी जाए। हां अगर आप इसका सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन करते हैं, तो फिर इसके लिए उन्हें सजा दिया जाना चाहिए। यहां धारा 377 का होना जरूरी है।

    - कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को स्वागत किया है। सुष्मिता देव ने कहा- "हर शख्स को अपनी तरह से जिंदगी जीने का पूरा हक है।"

    - एलजीबीटी वर्कर अक्काई ने कहा- "हमें इसका स्वागत करना चाहिए। ज्यूडिशियरी पर हमें यकीन है। हम 21वीं सदी में रहते हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों को चुप्पी तोड़नी चाहिए और लोगों के व्यक्तिगत यौन पसंद का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने सभी राजनीतिक पार्टियों से इस मुददे पर अपना पक्ष रखने की भी अपील की है।"

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    समलैंगिकता के इस मामले में 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अंग्रेज सरकार के जमाने से चले आ रहे समलैंगिकता के कानून को बदल दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे क्राइम कैटेगरी से निकाल दिया था।- सिम्बॉलिक
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Web Title: Section 377: Supreme Court Will Review Constitutional Validity
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