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सम्मान से मरना इंसान का हक, शर्तों के साथ इच्छामृत्यु की वसीयत मान्य होगी: सुप्रीम कोर्ट

अंतिम सुनवाई में केंद्र ने इच्छा मृत्यु का हक देने का विरोध करते हुए इसका दुरुपयोग होने की आशंका जताई थी।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Mar 10, 2018, 07:29 AM IST

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    नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इच्छामृत्यु पर एक अहम फैसला सुनाया। कहा है कि कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों के लिए Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (Living Will) कानूनी रूप से मान्य होगी। इस संबंध में कोर्ट ने डिटेल गाइडलाइन जारी की है। कोर्ट ने इस मामले में 12 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखा था। आखिरी सुनवाई में केंद्र ने इसका दुरुपयोग होने की आशंका जताई थी।

    कानून आने तक सुप्रीम कोर्ट की ये गाइडलाइन लागू रहेगी

    1. इच्छामृत्यु के लिए वसीयत बना सकते हैं
    व्यक्ति अपनी वसीयत में लिख सकता है कि लाइलाज बीमारी होने पर उसे जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए। मृत्यु दे दी जाए।

    विल बनाने की प्रकिया: विल दो गवाहों की मौजूदगी में बनेगा। इसे फर्स्टक्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रमाणित करेगा। इसकी 4 कॉपी बनेंगी। एक परिवार के पास और बाकी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट जज और नगर निगम या नगर परिषद या नगर पंचायत या ग्राम पंचायत के पास रहेगी।

    उस पर अमल की प्रक्रिया: बीमारी लाइलाज होने पर इच्छामृत्यु दी जा सकेगी। पर परिवार की मंजूरी जरूरी होगी। परिजनों को अपने राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अर्जी लगानी होगी। कोर्ट मेडिकल बोर्ड गठित करेगा। उसकी अनुमति मिलने पर कोर्ट लाइफ सपोर्टसिस्टम हटाने का आदेश देगा।

    2. अगर वसीयत नहीं बना पाए हैं तो...
    - जिनके पास लिविंग विल नहीं है और उनके ठीक होने की संभावना नहीं है, तो उनके परिजन इच्छामृत्यु के लिए लिख सकते हैं।

    - मरीज के परिजनों को राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करना होगा। बाकी प्रक्रिया वही होगी जो लिविंग विल वाले लोगों के लिए होगी।

    3. और दुरुपयोग रोकने के लिए शर्तें
    - इच्छामृत्यु के दुरुपयोग रोकने के लिए कोर्ट ने शर्तें भी रखी हैं। किसी ऐसे व्यक्ति की लाइफ विल को लेकर पूरी छानबीन होगी, जिसे संपत्ति या विरासत में लाभ होने वाला हो। यह जांच राज्य सरकार स्थानीय प्रशासन द्वारा कराएगी।

    5 जजों के 4 फैसले; 4 जज इच्छामृत्यु के पक्ष में

    चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टस खानविलकर

    - जीवन दिव्य ज्योति है। मृत्यु जीवन से अलग नहीं हो सकती। वह जीने का हिस्सा है। मशीनों से मिली मोहलत सम्मान खंडित करती है।

    जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़
    - मानवीय अस्तित्व की गरिमा होनी चाहिए। और इसके लिए जरूरी है कि मौत के समय की जिंदगी गरिमामय हो। ऐसे में व्यक्ति को अपनी मृत्यु के चयन का अधिकार हो।

    जस्टिस अशोक भूषण
    - सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ज्ञान कौर के मामले में सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दे चुकी है। मैं चीफ जस्टिस के साथ हूं।

    जस्टिस एके सीकरी
    - रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा। वो मुकद्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा। किसी की जिंदगी के फैसले का हक दूसरों

    को नहीं दिया जा सकता।

    पिटीशन में कहा था- सम्मान से मरने का भी हक हो

    - एनजीओ कॉमन कॉज ने लिविंग विल का हक देने की मांग को लेकर 2005 में पिटीशन लगाई थी। इसमें कहा गया था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को लिविंग विल बनाने का हक होना चाहिए।

    - पिटीशनर का कहना था कि इंसान को सम्मान से जीने का हक है तो उसे सम्माने से मरने का भी हक होना चाहिए।

    लिविंग विल क्या है?
    - यह एक लिखित दस्तावेज होता है, जिसमें संबंधित शख्स यह बता सकेगा कि जब वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तब उसे जबरन लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर न रखा जाए।

    इच्छामृत्यु क्या है?
    - किसी गंभीर या लाइलाज बीमारी से पीड़ित शख्स को दर्द से निजात देने के लिए डॉक्टर की मदद से उसकी जिंदगी का अंत करना है। यह दो तरह की होती है। वॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया, इनवॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया, पेसिव यूथनेशिया, एक्टिव यूथनेशिया और असिस्टेड सुसाइड।

    इच्छामृत्यु के 5 तरीके

    वॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया: मरीज की मंजूरी के बाद जानबूझकर ऐसी दवा देना, जिससे उसकी मौत हो जाए। यह केवल नीदरलैंड और बेल्जियम में वैध है।

    इनवॉलंटरी एक्टिव यूथनेशिया: मरीज खुद अपनी मौत की मंजूरी देने में असमर्थ हो, तब उसे मरने के लिए दवा देना। यह दुनिया में गैरकानूनी है।

    पेसिव यूथनेशिया: मरीज की मृत्यु के लिए इलाज बंद करना। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इसी का अधिकार दिया है।

    एक्टिव यूथनेशिया: ऐसी दवा देना, ताकी मरीज को राहत मिले। पर बाद में मौत हो जाए। यह कुछ देशों में वैध है।

    असिस्टेड सुसाइड:सहमति के आधार पर डॉक्टर मरीज को ऐसी दवा देते हैं, जिसे खाकर आत्महत्या की जा सकती है।

    21 देशों में है कानून
    - स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स, लक्जमबर्ग, अलबानिया, कोलंबिया, जर्मनी, जापान, कनाडा, बेल्जियम, ब्रिटेन, आयरलैंड, चीन, न्यूजीलैंड, इटली, स्पेन, डेनमार्क, फ्रांस, रोमानिया, फिनलैंड में इच्छामृत्यु का अधिकार है। इसके अलावा अमेरिका के 7 और ऑस्ट्रेलिया के एक राज्य में भी इसका कानून है। कई देशों में मामला कोर्ट में चल रहा है।

    अमेरिका:ओरेगन, वाशिंग्टन और मोंटाना में चिकित्सकों की अनुमति पर इच्छामृत्यु दी जाती है। सक्रिय इच्छामृत्यु गैर-कानूनी है।

    स्विटजरलैंड: यहां इच्छामृत्यु गैर कानूनी है। पर लोगों को स्वयं जहर का इंजेक्शन लेकर आत्महत्या की अनुमति है।

    नीदरलैंड: यहां के कानून में मरीज की मर्जी से और डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली सक्रिय इच्छामृत्यु स्वीकार्य है।

    आगे की स्लाइड में पढ़ें, अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था...

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    अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?...

    - सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग मामले में दायर जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी की पिटीशन पर 7 मार्च 2011 को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी थी। हालांकि, अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की मांग खारिज कर दी थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने वीरानी की पिटीशन क्यों खारिज की थी?

    - सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुछ खास परिस्थितियों में संबंधित हाईकोर्ट के निर्देश पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए तीन डॉक्टरों और मरीज के परिवार वालों की इजाजत जरूरी है। पिंकी वीरानी शानबाग की परिजन नहीं थीं, इसलिए उनकी पिटीशन खारिज कर दी गई।

    अरुणा शानबाग का क्या मामला है?

    - अरुणा शानबाग के साथ 27 नवंबर 1973 में मुंबई के केईएम हॉस्पिटल में एक वार्ड ब्वॉय ने कथिततौर पर रेप किया था। हालांकि, उस पर यह आरोप साबित नहीं हुआ था।

    - उसने अरुणा के गले में जंजीर कस दी थी, जिससे वे कोमा में चली गई थीं। वे 42 साल तक कोमा में रहीं। उनकी 18 मई 2015 को मौत हो गई थी।

    - इससे पहले जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी ने शानबाग की हालत को देखते हुए 2011 में उनके लिए इच्छामृत्यु देने की मांग की थी और सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने शानबाग मामले में क्या फैसला सुनाया था?

    - सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2011 को पिंकी वीरानी की पिटीशन खारिज कर दी थी। हालांकि, कोर्ट ने कहा था कि परिवार की इजाजत पर किसी को इच्छामृत्यु दी जा सकती है।

    केंद्र सरकार किस बात के खिलाफ थी?
    - केंद्र सरकार लिविंग विल के खिलाफ थी। वह अरुणा शानबाग मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर सक्रिय इच्छामृत्यु पर सहमति देने को तैयार थी।

    - उसका कहना था कि इसके लिए कुछ शर्तों के साथ ड्राफ्ट तैयार है। इसमें जिला और राज्य के मेडिकल बोर्ड सक्रिय इच्छामृत्यु पर फैसला करेंगे। लेकिन मरीज कहे कि वह मेडिकल सपोर्ट नहीं चाहता यह उसे मंजूर नहीं है।

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    अरुणा शानबाग मामले में पहली बार 2011 में इच्छामृत्यु पर बहस शुरू हुई थी। -सिम्बॉलिक इमेज
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    कोर्ट ने इस मामले में 12 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखा था।
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Web Title: Live Updates: Supreme Court Verdict On Right To Passive Euthanasia, इच्छामृत्यु की इजाजत
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