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क्या है Euthanasia, जिसकी 42 साल कोमा में रहीं अरुणा शानबाग के केस में नहीं मिली थी इजाजत?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को शर्ताें के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु को इजाजत दे दी।

Danik Bhaskar | Mar 09, 2018, 12:03 PM IST
8 मार्च 2011 को अरुणा को इच्छा मृत 8 मार्च 2011 को अरुणा को इच्छा मृत

नई दिल्ली. बयालिस साल तक कोमा में रहीं अरुणा शानबाग की 18 मई 2015 को मौत हो गई थी। अरुणा 1973 में मुंबई के केईएम हॉस्पिटल में रेप की शिकार हुई थीं। उन्हें इच्छा या दया मृत्यु देने की मांग करती जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी की पिटीशन सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2011 को ठुकरा दी थी।

कौन थीं अरुणा शानबाग?
- मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में दवाई का कुत्तों पर एक्सपेरिमेंट करने का डिपार्टमेंट था। इसमें नर्स कुत्तों को दवाई देती थीं। उन्हीं में एक थीं अरुणा शानबाग। 27 नवंबर 1973 को अरुणा ने ड्यूटी पूरी की और घर जाने से पहले कपड़े बदलने के लिए बेसमेंट में गईं। वार्ड ब्वॉय सोहनलाल पहले से वहां छिपा बैठा था। उसने अरुणा के गले में कुत्ते बांधने वाली चेन लपेटकर दबाने लगा। छूटने के लिए अरुणा ने खूब ताकत लगाई। पर गले की नसें दबने से बेहोश हो गईं। अरुणा कोमा में चली गईं और कभी ठीक नहीं हो सकीं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों ठुकरा दी थी पिटीशन?
- 8 मार्च 2011 को अरुणा को दया मृत्यु देने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी। वह पूरी तरह कोमा में न होते हुए दवाई, भोजन ले रही थीं। डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर अरुणा को इच्छा मृत्यु देने की इजाजत नहीं मिली।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पिटीशनर पिंकी वीरानी का इस मामले से कुछ लेना-देना नहीं है, क्‍योंकि अरुणा की देखरेख केईएम हॉस्पिटल कर रहा है।
- बेंच ने कहा था कि अरुणा शानबाग के माता-पिता नहीं हैं। उनके रिश्तेदारों काे उनमें कभी दिलचस्पी नहीं रही। लेकिन केईएम हॉस्पिटल ने कई सालों तक दिन-रात अरुणा की बेहतरीन सेवा की है। लिहाजा, अरुणा के बारे में फैसले करने का हक केईएम हॉस्पिटल को है।
- बेंच ने यह भी कहा था कि अगर हम किसी भी मरीज से लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लेने का हक उसके रिश्तेदारों या दोस्तों को दे देंगे तो इस देश में हमेशा यह जोखिम रहेगा कि इस हक का गलत इस्तेमाल हो जाए। मरीज की प्रॉपर्टी हथियाने के मकसद से लोग ऐसा कर सकते हैं।

क्या है Euthanasia?
- जब कोई मरीज बहुत ज्यादा पीड़ा से गुजर रहा होता है या उसे ऐसी कोई बीमारी होती है जाे ठीक नहीं हो सकती और जिसमें हर दिन मरीज मौत जैसी स्थिति से गुजरता है तो उन मामलों में कुछ देशों में इच्छा मृत्यु दी जाती है।

- बेल्जियम, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और लक्जमबर्ग में Euthanasia (दया या इच्छामृत्यु) की इजाजत है। अमेरिका के सिर्फ 5 राज्यों में ही इसकी इजाजत है।

- भारत में यह मुद्दा विवादास्पद है। धार्मिक वजहों से लोग ये मानते हैं कि किसी को इच्छामृत्यु की इजाजत देना ईश्वर के खिलाफ जाने के समान है। मरीज के परिवार के लोग भी इसे लेकर सहज नहीं रहते। यह उम्मीद भी रहती है कि मरीज किसी दिन अपनी बीमारी से बाहर आ जाएगा।

कितनी तरह की इच्छा मृत्यु?
- Active Euthanasia में मरीज को डॉक्टर ऐसा जहरीला इंजेक्शन लगाता है जिससे उसकी कार्डिएक अरेस्ट के कारण मौत हो जाती है।

- Passive Euthanasia में डॉक्टर्स उस मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा देते हैं, जिसकी जीने की उम्मीद खत्म हो जाती है।

- Physician-assisted suicide के मामले में मरीज खुद जहरीली दवाएं लेता है, जिससे मौत हो जाती है। जर्मनी जैसे कुछ देशों में इसकी इजाजत है।

भारत में कितने मामले आए?
- 1994 में पी. रथिनम के केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति को ‘मरने का अधिकार’ भी होता है। हालांकि, 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पुराना फैसला पलट दिया। कहा- मरने का अधिकार देना तो संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीने के अधिकार का उल्लंघन है। 2000 में केरल हाईकोर्ट ने कहा कि इच्छामृत्यु की इजाजत देना आत्महत्या को स्वीकार करने के बराबर होगा।

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों को वसीयत (Living Will) के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का हक होगा। उसे सम्मान से जीने का हक है तो सम्मान से मरने का भी हक है।

- सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लिविंग विल पर भी मरीज के परिवार की इजाजत जरूरी होगी। साथ ही एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम भी इजाजत देगी, जो यह तय करेगी कि मरीज का अब ठीक हो पाना नामुमकिन है।