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त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत, 25 साल बाद इस राज्य में हारा लेफ्ट फ्रंट

त्रिपुरा असेंबली इलेक्शन में बीजेपी और उसके सहयोगी दल IPFT ने मिलकर यहां 41 सीटें जीतीं।

Dainik Bhaskar

Mar 03, 2018, 02:49 PM IST
त्रिपुरा में 25 साल से वामदलों (CPI-M) की सरकार थी। यहां बीजेपी ने लेफ्ट को बड़ी शिकस्त दी। - फाइल त्रिपुरा में 25 साल से वामदलों (CPI-M) की सरकार थी। यहां बीजेपी ने लेफ्ट को बड़ी शिकस्त दी। - फाइल

अगरतला. देश के तीन पूर्वोत्तर राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे शनिवार को आए। हालांकि, इनकी औपचारिक घोषणा अभी नहीं की गई है। ये राज्य हैं त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड। सबसे ज्यादा नजरें त्रिपुरा पर थीं। यहां 25 साल से वामदलों (CPI-M) की सरकार थी। यहां बीजेपी ने लेफ्ट को बड़ी शिकस्त दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीजेपी और उसके सहयोगी दल IPFT ने मिलकर यहां 41 सीटें जीतीं। लेफ्ट को 18 सीटों पर विजय हासिल हुई। राज्य में कुल 60 विधानसभा सीटें हैं।

त्रिपुरा चुनाव क्यों चर्चा में था?

- बीजेपी ने इन चुनावों में पूरी ताकत लगाई। संघ से जुड़े एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संगठन आदिवासियों के बीच पिछले कई साल से काम कर रहे हैं। इसके चलते भाजपा का आदिवासी इलाके में वोटबैंक काफी बढ़ा। बीजेपी हर साठ वोटर पर एक पन्ना प्रमुख बनाकर एक-एक वोटर तक पहुंची।

चुनाव में सबसे ज्यादा किसे फायदा?

- BJP को इन चुनावों में सबसे ज्यादा फायदा हुआ। इंडिजीनियस पीपुल्स फ्रंट आॅफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ अलायंस करने का भी उसे फायदा मिला। 2013 में इन दोनों पार्टियों को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार दोनों सरकार बनाने की स्थिति में दिख रही हैं।

सबसे ज्यादा नुकसान में कौन रहा?

- सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ 25 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस यहां मुख्य विपक्षी दल था।

कांग्रेस को क्या हासिल हुआ?

- नार्थ ईस्ट में बीजेपी की लगातार बढ़ती सक्रियता और वहां हो रही राजनीतिक उठापठक का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हो रहा है। त्रिपुरा में 2013 में उसके भले सिर्फ 10 विधायक थे लेकिन पार्टी का वोट शेयर 36.5% था। चुनाव से पहले कांग्रेस के अधिकतर विधायक पहले टीएमसी बाद में बीजेपी में चले गए। वोट शेयर भी घटकर 2 फीसदी से कम हो गया है।

बीजेपी की जीत के क्या मायने?

- बीजेपी को त्रिपुरा के मूल आदिवासी और बंगाली की लड़ाई का फायदा हुआ। त्रिपुरालैंड की समर्थक आईपीएफटी से अलांयस करने का भी उसे फायदा हुआ। त्रिपुरा की 70% हिंदू आबादी नाथ सप्रदाय को मानती है। योगी आदित्यनाथ इसके सबसे बड़े धर्मगुरु हैं। बीजेपी को इसका भी फायदा हुआ।

लेफ्ट ने क्या खोया?

- पिछले 40 साल के दौरान त्रिपुरा में हुए 8 चुनावों में लेफ्ट का वोट शेयर कभी भी 45% से कम नहीं था। इस बार ये घटता दिख रहा है। बंगाल में सत्ता जाने के बाद त्रिपुरा लेफ्ट का सबसे मजबूत गढ़ था। त्रिपुरा से भी सत्ता जाने के बाद लेफ्ट के पास अब केवल केरल में ही सत्ता में रह गया है।

कौन बन सकता है CM?

- यहां बीजेपी को मिली कामयाबी में पार्टी के तीन दिग्गज हेमंत बिस्व सरमा, बिप्लब कुमार देब और सुनील देवधर का काफी अहम किरदार रहा है। इनमें से मुख्यमंत्री पद की रेस में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े बिप्लब सबसे आगे है।

कौन हैं बिप्लब देब

नाम: बिप्लब कुमार देब

उम्र: 48 साल
जन्म: उदयपुर, त्रिपुरा
सीट: बनमालीपुर, पश्चिम त्रिपुरा
पत्नी: एसबीआई में डिप्टी मैनेजर

बिप्लब पर कोई केस दर्ज नहीं
- त्रिपुरा यूनिवर्सिटी से 1999 में ग्रेजुएट किया। समाजसेवा के काम करते रहे हैं।
- साफ-सुथरी छवि। कोई भी क्रिमिनल केस दर्ज नहीं है।
- हलफनामे में अपनी कुल प्रॉपर्टी 5.85 करोड़ बताई।

संघ से करीबी रिश्ते

- संघ से जुड़े रहे हैं। संगठन में रहकर काम किया है। बीजेपी के थिंक टैंक रहे केएन गोविंदाचार्य के साथ काम कर चुके हैं।

बिप्लब कुमार देब को त्रिपुरा के सीएम की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है।- फाइल बिप्लब कुमार देब को त्रिपुरा के सीएम की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है।- फाइल
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त्रिपुरा में 25 साल से वामदलों (CPI-M) की सरकार थी। यहां बीजेपी ने लेफ्ट को बड़ी शिकस्त दी। - फाइलत्रिपुरा में 25 साल से वामदलों (CPI-M) की सरकार थी। यहां बीजेपी ने लेफ्ट को बड़ी शिकस्त दी। - फाइल
बिप्लब कुमार देब को त्रिपुरा के सीएम की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है।- फाइलबिप्लब कुमार देब को त्रिपुरा के सीएम की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है।- फाइल
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