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उपचुनाव रिजल्ट: लोकसभा की तीनों सीटों पर BJP की हार, सपा-बसपा की जीत, क्या हैं इन नतीजों के मायने

यूपी की दोनों सीटों पर सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। दोनों के साथ आने से बीजेपी को कितना फर्क पड़ेगा?

Vikas Kumar | Last Modified - Mar 19, 2018, 06:40 PM IST

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    नेशनल डेस्क. यूपी लोकसभा उपचुनाव में सपा ने गोरखपुर और फूलपुर सीट जीत ली है। वहीं बिहार उपचुनाव में जहानाबाद (विधानसभा) सीट से लालू की पार्टी के कैंडिडेट सुदय यादव जीत गए हैं। भभुआ (विधानसभा) सीट से बीजेपी कैंडिडेट रिंकी रानी पांडेय जीती हैं। वहीं अररिया (लोकसभा) सीट पर आरजेडी के सरफराज ने जीत दर्ज कराई है। यूपी में लोकसभा उपचुनाव में बसपा ने सपा के उम्मीदवारों को समर्थन दिया था। वहीं, कांग्रेस ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। दोनों सीटें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद खाली हुईं थी। यूपी के इस लोकसभा उपचुनाव को 2019 के लिए रिहर्सल के रूप में देखा जा रहा है। जिसमें सपा-बसपा एक साथ आ गई हैं तो वहीं 2014 की तुलना में बीजेपी की लोकप्रियता कम होती दिख रही है। ऐसे में बताते हैं कि आखिर बीजेपी, सपा, बसपा के लिए दोनों सीटों के नतीजों के क्या मायने होंगे।

    यूपी की दोनों सीटों पर जीत-हार के मायने

    यूपी की फूलपुर और गोरखपुर सीटों पर चुनावी नतीजें काफी अहम माने जा रहे हैं। यहां बात सिर्फ दो सीटों की नहीं है बल्कि बीजेपी के लिए दोनों सीटों से पार्टी की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है वहीं सपा-बसपा के लिए उपचुनाव एक एक्सपेरिमेंट है। दोनों सीटों पर सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा। अब सपा-बसपा दोनों सीटे जीत गई है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों 2019 का लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ सकती हैं।

    1993 में पहली बार हुआ था सपा-बसपा गठबंधन
    साल 1993 में पहली बार सपा और बसपा का गठबंधन हुआ था। दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था और 176 सीटें जीतकर सरकार बना ली थी। लेकिन जून 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों अलग हो गए। अब 25 साल बाद दोनों पार्टियां फिर से साथ आईं हैं ऐसे में दोनों सीटों पर जीत के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए दोनों पार्टियां चुनौती बन सकती हैं।

    अपने ही गढ़ में हारने पर जाएगा निगेटिव मैसेज

    गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद रहे हैं। योगी के सीएम बनने के बाद ये सीट खाली हुई थी। ऐसे में बीजेपी चाह रही थी कि ये सीट किसी भी हालत में जीते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। योगी अपने ही गढ़ में हार गए। इस जनता में एक निगेटिव मैसेज जाएगा। वहीं गोरखपुर सीट से जीत विपक्ष के लिए एक संजीवनी साबित होगी। जिसके बाद सपा और बसपा जनता के बीच अपने मुद्दों को लेकर नई उर्जा के साथ जा सकेंगे।

    'सीएम और डिप्टी सीएम की सीट' मतलब सीधा प्रतिष्ठा का प्रश्न

    गोरखपुर लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद खाली हुई थी। फूलपुर सीट केशव प्रसाद मौर्या के डिप्टी सीएम बनने के बाद खाली हुई। दोनों जगहों पर 50% से कम ही वोटिंग हुई। ऐसे में दोनों सीटों से बीजेपी की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है।

    गोरखपुर में जातिगत समीकरण
    गोरखपुर में बीजेपी उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ल थे। जिन्हें केंद्रीय मंत्री शिवप्रताप शुक्ला का करीबी माना जाता है। वहीं सपा से प्रवीण निषाद की उम्मीदवारी थी। यहां बीजेपी उच्च जातियों के वोटो को लेकर निश्चिंत थी। गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में गैर यादव ओबीसी खासकर निषाद समुदाय के लोग ज्यादा हैं। इसलिए सपा ने यहां से प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी निषाद पार्टी के उम्मीदवारों को अच्छे वोट मिले थे। यहा 19 लाख मतदाताओं में से आधे से कुछ अधिक पिछड़ी जातियों के हैं।

    आगे की स्लाइड्स में देखें, क्या ये हार योगी के एक साल के शासनकाल का रिजल्ट है....

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    एक साल के शासनकाल के बाद योगी खुद की सीट हार गए
    लोकसभा उपचुनाव के दौरान सबकुछ योगी आदित्यनाथ पर ही छोड़ दिया गया था। चुनाव प्रचार में न ही मोदी और न ही संघ का कोई दखल दिखा। ऐसे में बीजेपी का गोरखपुर सीट से हारना योगी की लोकप्रियता पर तो सवाल उठाता ही है लेकिन उनके एक साल के शासनकाल का रिजल्ट भी बताता है।

    फूलपुर में जातिगत समीकरण
    फूलपुर में सपा उम्मीदवार नागेंद्र सिंह पटेल जीत चुके हैं। वो सपा मंडल के अध्यक्ष भी रहे हैं। यहां से बीजेपी उम्मीदवार थे कौशलेंद्र सिंह पटेल। जो वाराणसी से मेयर रह चुके हैं। अगर इस सीट का जातिगत समीकरण देखें तो यहां सबसे ज्यादा पटेल मतदाता है। जिनकी संख्या करीब 3 लाख 25 हजार है। इसके बाद यादव आते हैं। इनकी संख्या 2 लाख 80 हजार है। तीसरे नंबर पर ब्राह्मण मतदाता आते हैं। कुशवाहा और मौर्य की मतदाता संख्या करीब एक लाख है।

    आगे की स्लाइड्स में देखें, 2019 के लोकसभा चुनाव पर कैसे पड़ सकता है असर...

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    यूपी में जातिगत वोटबैंक
    यूपी में सबसे ज्यादा 42-45 प्रतिशत तक ओबीसी है। इसके बाद 21-22 प्रतिशत दलित, तीसरे नंबर पर 18-20 प्रतिशत सवर्ण और 16-18 प्रतिशत मुस्लिम हैं। सवर्णों में सबसे ज्यादा तादाद ब्राह्मणों की 8-9 प्रतिशत है। राजपूत 4-5 प्रतिशत और वैश्य 3-4 प्रतिशत हैं।

    लोकसभा चुनाव में यूपी की अहमियत
    उत्तर प्रदेश की राजनीति को लेकर कहा जाता है कि ये राज्य देश का पीएम चुनने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। यहां 80 लोकसभा सीट है। नतीजों से पहले बीजेपी के पास 71, एसपी के पास 5 और कांग्रेस के पास 2 सीटे थी। बाकी दो सीटों पर उपचुनाव हुए। जिसमें सपा ने जीत हासिल की। अब सपा के पास 7 सीटे आ गई हैं। लेकिन संख्या बढ़ते से ज्यादा अहमियत दोनों सीटों की जीत है क्योंकि दोनों बीजेपी की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई हैं। यहां हार का मतलब योगी और साथ ही बीजेपी की लोकप्रियता और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाने जैसा है। जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा।

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Web Title: UP Chunav: What UP Bypoll Results Mean For BJP SP And BSP
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