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बात देश की या जज्बे की, देश-दुनिया के इतिहास में नारी की ताकत के रूप में दर्ज हैं ये तस्वीरें

देश-दुनिया के इतिहास में नारी की ताकत के रूप में दर्ज तस्वीरें के किरदारों के बारे में।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 08, 2018, 08:08 AM IST

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    मेडिकल कॉलेज की 21 साल की स्टूडेंट का जज्बे को बयां करती ये तस्वीर।

    नई दिल्ली. देश की महिलाएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन चुनौतियां भी हैं। इन बदलावों व चुनौतियों को आप जान सकें, इसलिए भास्कर बिल्कुल अलग परिदृश्य वाले राज्यों से ग्राउंड रिपोर्ट लाया है। वे राज्य जहां महिलाएं सबसे उपेक्षित, सशक्त या बंदिशों में घिरी हैं। साथ ही जहां पुरुषों से ज्यादा महिला वोटर हैं। इसके अलावा पढ़ें, देश-दुनिया के इतिहास में नारी की ताकत के रूप में दर्ज तस्वीरें के किरदारों के बारे में।

    जब बात हक की थी तब मजबूती से खड़ी रहीं अकेली

    दशकभर पुराना आंदोलन, लेकिन महिलाओं की हिम्मत और दृढ़ निश्चिय का आजीवन प्रतिनिधित्व करने वाली तस्वीर। केंद्र में थीं अर्पिता मजूमदार। तब दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की 21 साल की स्टूडेंट। वे एक आंदोलन का हिस्सा बनकर सड़कों पर उतरी थीं, लेकिन इस आंदोलन का चेहरा बन गईं।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़ें: आगे की स्लाइड्स में पढ़ें- महिलाओं के जज्बे की कहानी और 4 राज्यों से ग्राउंड रिपोर्ट...

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    मुंबई की निधि चाफेकर की यह तस्वीर पूरी दुनिया के मीडिया में आई।

    कभी आत्मबल नहीं खोना चाहती ये महिला

    22 मार्च 2016 को ब्रुसेल्स एयरपोर्ट पर आतंकी धमाकों में घायल मुंबई की निधि चाफेकर की यह तस्वीर पूरी दुनिया के मीडिया में आई। डॉक्टर्स ने कहा था कि वे फिर कभी चल नहीं पाएंगी। एड़ी इतनी क्षतिग्रस्त थी। लेकिन आज वे सामान्य हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम में कह चुकी हैं मैं कभी आत्मबल नहीं खोना चाहती।

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    26/11 हमले की चश्मदी देविका ने नहीं बदली आखिरी वक्त तक अपनी गवाही।

    देविका ने मुंबई हमलाें में दी थी कसाब के खिलाफ गवाही

    देविका रोटवान, जिसकी गवाही पर 26/11 हमले में जिंदा पकड़ाए आतंकी अजमल कसाब को फांसी हुई। कसाब ने देविका के पैर पर गोली मारी थी। तस्वीर में नौ साल की देविका कसाब के खिलाफ गवाही देने जाती दिख रही है। अब वह 18 साल की है। जिस पैर में गोली लगी थी, उसके छह ऑपरेशन हो चुके हैं।

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    हरियाणा: यहां सबसे ज्यादा उपेक्षित थीं, अब नहीं

    हरियाणा में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएं 871 से बढ़कर 937 हुई

    कन्या भ्रूण हत्या, ऑनर किलिंग, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, घोर पुरुषवादी मानसिकता के तौर पर हरियाणा को जाना जाता था। लेकिन अब देश की शीर्ष महिला पहलवान साक्षी मलिक और मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर राज्य की पहचान हैं। ऐसे और भी क्षेत्र हैं, जहां हरियाणा की

    महिलाएं रूढ़ियां तोड़ती दिख रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहां महिलाओं ने अपनी स्थिति सुधारी है। राजनीति में इनकी भागीदारी बढ़ी है। दो साल पहले पंचायती राज चुनाव में 33 फीसदी सरपंचों की जगह अब 42 फीसदी महिलाएं सरपंच बनी हैं। कुल 2565 महिला सरपंच हैं। अब यह देश में सबसे ज्यादा महिला विधायकों (14%) वाले प्रदेशों में से भी एक है।

    प्रदेश में महिलाओं के 12473 सेल्फ हेल्प ग्रुप सक्रिय

    इतना ही नहीं यहां पुरुषों की साक्षरता दर की तुलना में महिला साक्षरता दर तेजी से बढ़ी है। 10 वर्ष पहले साक्षरता दर जहां 60.4 प्रतिशत थी, वहीं अब 75.4 फीसदी है। साक्षरता दर बढ़ने के साथ महिलाओं का अनुपात भी सुधरा है। राज्य के स्वास्थ्य िवभाग के अनुसार 2014-15 में यहां प्रति 1 हजार पुरुषों पर 871 महिलाएं थीं, अब 937 हैं। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। महिलाओं के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 2005-06 में 55.2 प्रतिशत महिलाएं यहां एनिमिक थीं। यानी उनमें खून की कमी थी। 2015-16 में यह संख्या बढ़कर 63.1 प्रतिशत हो गई है। इसके बावजूद महिलाएं स्वावलंबन की ओर कदम बढ़ा रही हैं। प्रदेश में महिलाओं के 12473 सेल्फ हेल्प ग्रुप सक्रिय हैं, जिनमें डेढ़ लाख महिलाएं स्वरोजगार चला रही हैं।

    प्रदेश की 45 फीसदी महिलाओं के बैंक में खाते

    नौकरियों की बात करें तो इनमें लगभग 44% महिलाएं हैं। प्रदेश की 45 फीसदी महिलाओं के बैंक में खाते हैं, जो करीब 10 साल पहले सिर्फ 12 फीसदी ही थे। यहां बदलाव सिर्फ आत्मनिर्भर होने तक सीमित नहीं। ये सोच भी बदल रही हैं। यहां महिलाएं सेनेटरी पैड बनाकर 35 गांवों में घर-घर पहुंचा रहीं हैं।

    रिपोर्ट - मोनिल शर्मा।

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    गुजरात: यहां सबसे सशक्त मानी जाती हैं।

    टैक्सटाइल इंडस्ट्री में गुजरात की महिलाओं की ही धाक

    गुजरात वो राज्य जहां महिलाएं देश में सबसे सशक्त मानी जाती हैं। हो भी क्यों नहीं। उदाहरण देखिए हखीबहन का। इन्हीं के नाम पर एक ब्रैंड है-हरखी। धोकावाला गांव की हखीबहन आहीर सेवा संस्थान की गारमेंट इकाई की ब्रैंड एम्बेस्डर हैं। बात सिर्फ हखीबहन की नहीं है देश की टैक्सटाइल इंडस्ट्री में गुजरात की महिलाओं की ही धाक है।

    महिला साक्षरता के मामले में भी गुजरात बेहतर स्थिति में

    देश की मिलों में कुल 2 करोड़ महिलाएं काम करती हैं, जिसमें से 50 लाख अकेले गुजरात में हैं। स्टॉक एक्सचेंज में निवेश के मामले में भी यहां कि महिलाएं पीछे नहीं हैं। राज्य में स्टाॅक एक्सचेंज निवेशकों में 25 प्रतिशत महिलाएं हैं। 32 प्रतिशत महिलाएं कामकाजी हैं। जो राष्ट्रीय औसत 30 प्रतिशत से अधिक है। शहरी गुजरात में 48.1 प्रतिशत महिलाएं कामकाजी हैं, जबकि देश का औसत 42.8 प्रतिशत ही है। यही नहीं महिला साक्षरता के मामले में भी गुजरात बेहतर स्थिति में है। राष्ट्रीय प्रतिशत 64.6 है, जबकि गुजरात में 69.7 प्रतिशत है। राज्य में महिला साक्षरता दर तेजी से बढ़ी भी है। 2001 में महिला साक्षरता 58.6 प्रतिशत थी। देश में लड़कियों के विवाह की औसत उम्र 19.3 साल है, जबकि गुजरात में यह 22 साल तक पहुंच गई है।

    2017 के चुनावों में 13 महिलाएं विधानसभा पहुंची

    लेकिन गुजरात की सशक्त महिलाओं के सामने भी कई चनौतियां हैं। इसमें सबसे बड़ी है घटता लिंगानुपात। 2011 में प्रति हजार पुरुषों में महिलाओं की संख्या 918 रह गई है, जो 1961 में 940 थी। ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात की कुल कामकाजी महिलाओं में एक-तिहाई स्वरोजगार में हैं। लेकिन पुरुषों की तुलना में उनका वेतन 50 प्रतिशत ही है। राजनीति में भागीदारी में महिलाओं की स्थिति देश से कुछ अलग नहीं है। 2017 के चुनावों में 13 महिलाएं विधानसभा पहुंची हैं। जो कुल संख्या का 7.1 प्रतिशत है। जबकि देशभर की विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व 9% है।

    रिपोर्ट- सपना शर्मा।

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    मिजोरम: पुरुषों से ज्यादा महिला वोटर।

    एवरेस्ट फतह कर रही हैं, कैब चला रही हैं; राजनीति को मानती हैं पुरुषों का काम

    यहां के 32 साल के इतिहास में केवल दो महिला मंत्री रही हैं, जबकि महिला वोटर पुरुषों से ज्यादा हैं। वैसे मिजोरम की सिर्फ यही एक बात नहीं चौंकाती। यहां बूचड़खाने या मांस की दुकानों में भी महिलाओं को काम करते देखा जाना आम बात है।

    आंत्रप्रेन्योर से लेकर एवरेस्ट फतह करने वाली तक

    - वैसे राज्य में हन्नाह खियांग्टे जैसी आंत्रप्रेन्योर हैं, जिनके डिजाइन कपड़े यहां के लोकल सेलिब्रिटीज की पहली पसंद है। तीन बहनों द्वारा शुरू किया गया वकीरिया फैशन ब्रैंड है, जिसे हर कोई जानता है। कुल मिलाकर पिछले कुछ सालों में बदलाव यह हुआ है कि महिलाएं लगातार आगे बढ़ रही हैं।

    - 21 मई 2016 को 20 वर्षीय लालरिंटलुआंगी एवरेस्ट फतह करने वाली राज्य की पहली महिला बनी थीं। इसी तरह 27 साल की सपरमछानी पहली मीज़ो महिला हैं, जो मैक्सी कैब चला रही हैं।

    चुनौतियां यहां भी कम नहीं हैं

    वैसे दूसरी तरफ एक भयावह तस्वीर भी दिखती है। यहां भले ही 3,33,046 (पुरुषों से 16,573 ज्यादा) महिला वोटर सरकारें बनाती-गिराती हों, लेकिन जब खुद के जीवन की बात आती है तो अपने निर्णय लेने की आजादी इन्हें अभी भी नहीं है। यहां रहने वाली लालहमुआकलियानी कहती हैं कि हमारे पारंपरिक रीति-रिवाज महिलाओं के हित की बात नहीं करते। सभी चीजें पुरुषों पर ही जाकर रुकती हैं। यहां महिलाओं को संपत्ति में कुछ भी हिस्सा नहीं दिया जाता है। पुरुष 400-500 रुपए देकर महिला से शादी कर लेते हैं। ऐसे में तलाक के मामले तेजी से बढ़े हैं। फिर भी मिजोरम में करीब 100 वर्षों ऐसे ही रीति-रिवाजों से समाज चलता आ रहा है।

    रिपोर्ट -एम्बेसी लॉबे।

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    कश्मीर: यहां महिला पर सबसे ज्यादा बंदिशें।

    27 साल की आबिदा तीन बार देश का प्रतिनिधित्व कर चुकीं हैं

    कदम -कदम पर रूढ़िवादिता के रोड़े। हर पल बंदिशों में बीतता जीवन। यही है बाकी देश के लिए कश्मीरी महिलाओं की छवि। मगर इन्हीं महिलाओं में से एक है पोंपोर इलाके की आबिदा। किसी भी वक्त आतंकी घटना की आशंका के बावजूद यहां कराते क्लासेस चलाती हैं। 27 साल की आबिदा तीन बार देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

    सेल्फ हेल्प ग्रुप की संख्या 394 पहुंची

    आबिदा जैसे और भी उदाहरण हैं, जो बताते हैं घाटी में बंदिशें अब टूट रही हैं। 2016 में जहां 6886 लड़कियों ने डिस्ट्रिक्ट व नेशनल लेवल के खेलों में हिस्सा लिया था, वहीं 2017 के नवंबर तक ही ये संख्या 7724 रही। इसके अलावा 2012-13 में यहां पर सिर्फ सौ के करीब सेल्फ हेल्प ग्रुप शुरू हो पाए थे, लेकिन इस बार इनकी संख्या 394 रही है। पिछले साल इन ग्रुप्स के तहत महिलाओं की विभिन्न छोटे कामों से इनकम 4000 रुपए प्रति माह थी, जो इस बार आठ हजार रुपए प्रति माह तक पहुंच गई है।

    चुनौतियां और भी हैं

    हालांकि, राह अभी कठिन है। क्योंकि पढ़ाई में लड़कियां अब भी लड़कों के मुकाबले आधी ही हैं। इतना ही नहीं हर तीन में से एक लड़की ड्रॉप आउट कर रही है, जबकि लड़कों में ये आंकड़ा पांच में से एक का है। चुनौती और भी हैं। अब 889 महिला हैं, प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले। एक दशक पहले ये संख्या 900 थी। 40% कुपोषण की शिकार भी हैं। इन सबके अलावा नेतृत्व में तो यहां की महिलाएं बेहद पिछड़ी हुई हैं। 33 फीसदी आरक्षण के बावजूद कश्मीर की पंचायतों की 2400 सीटों में से सिर्फ 3 पर महिलाएं हैं। वहीं जम्मू में 1900 में 25 पर।

    रिपोर्ट - ननु जोगिंदर सिंह।

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Web Title: Woman Day Special Story Shows Empowerment
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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