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भारत का संविधान सबसे अच्छा, सरकार-ज्यूडिशियरी और ब्यूरोक्रेसी इसके मेंबर: मोदी

संविधान दिवस के मौके पर नरेंद्र मोदी ने कहा कि ऐसा कोई विषय नहीं है जिसकी व्याख्या संविधान में नहीं मिलती हो।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Nov 26, 2017, 05:03 PM IST

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नई दिल्ली.संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ऐसा कोई विषय नहीं है जिसकी व्याख्या भारत के संविधान में नहीं मिलती हो। मोदी ने कहा- संविधान सभा के अंतरिम चेयरमैन सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा था कि मानव द्वारा लिखा अगर कोई संविधान सर्वश्रेष्ठ है तो भारत का संविधान है। पीएम ने कहा कि मैं कानून का जानकार नहीं, लेकिन कोर्ट में ईज ऑफ जस्टिस को लेकर कॉम्पिटीशन हो। गरीब कोर्ट तक आने में डरें नहीं, उसे भी कम खर्च में इंसाफ मिले। इस मौके पर दिल्ली के विज्ञान भवन में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा भी मौजूद रहे।

सरकार, ज्यूडिशियरी और ब्यूरोक्रेसी एक परिवार जैसे

- मोदी ने कहा, “ऐसा कोई विषय नहीं है जिसकी व्याख्या संविधान में नहीं मिलती हो। संविधान सभा के अंतरिम चेयरमैन सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा था कि मानव द्वारा रचित अगर कोई संविधान सर्वश्रेष्ठ है तो भारत का संविधान है।”

- “अंबेडकर ने कहा था कि भारत के संविधान को युद्ध काल और शांति दोनों में कामयाब बनाया जा सकता है। सरकार, ज्यूडिशियरी और ब्यूरोक्रेसी इस संविधान के परिवार के सदस्य हैं। एक सवाल है। क्या हम संविधान के दायित्व पूरे कर रहे हैं। एक दूसरे के लिए सहयोग कर रहे हैं। ये सवाल ज्यूडिशियरी और सरकार के लिए नहीं बल्कि हर संस्था के लिए है। इन संस्थाओं का हर फैसला लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। क्या ये संस्थाएं देश के विकास में सहयोग कर रही हैं।”

स्वर्ग और नर्क से उदाहरण से मोदी ने समझाया
- “मुझे ठीक से याद तो नहीं लेकिन वो बचपन में सुना करता था। स्वर्ग और नर्क में अंतर क्या है? विद्वान अपने तरीके से बताते थे। कुछ लोगों को स्वर्ग और नर्क दिखाया। दोनों जगह अन्न भंडार थे। स्वर्ग में लोग खुश थे नर्क में परेशान थे खस्ताहाल थे। उनके हाथों में चम्मच थे। लेकिन, उनके हाथ फोल्ड नहीं हो सकते थे। जो खाते थे वो पीछे गिर जाता था। स्वर्ग में भी हाल यही थे। वो पहले सामने वाले को खिलाता फिर सामने वाला उसे खिलाता था।”

अगले 5 साल में भारत का सपना पूरा करना है

- “75 साल पहले जब गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो लोगों में उत्साह था। लोगों में ऊर्जा थी। 5 साल बाद आजादी भी मिल गई। हमें अगले 5 साल में उस भारत का सपना पूरा करना है, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। संविधान से जुड़ी संस्थाओं को न्यू इंडिया का सपना साकार करना होगा।''

- ''आज जन भावनाओं की प्रबलता है। ये दशकों बाद दिखाई दे रही है। हम नौजवान देश हैं। सभी संस्थाओं का मिलकर काम करने की जरूरत है। हम एक बार ये मौका खो चुके हैं। क्योंकि तब गुलाम थे। अब 21वीं सदी में हमें ये सपना पूरा करना होगा। नए संकल्प के साथ आगे चलना होगा। कई चुनौतियां है। एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।''

- ''राजेंद्र बाबू ने एक किस्सा सुनाया था। उन्होंने कहा था- हम सभी को यकीन दिलाते हैं कि देश से गंदगी, भूख और बीमारी को खत्म करने के लिए हम हमेशा प्रयासरत रहेंगे। हम मिशन पर निकले हैं। हमें उम्मीद है सभी का सहयोग और समर्थन मिलेगा।”

संविधान को सोशल डॉक्यूमेंट माना जाता है
- “हमारे संविधान को सोशल डॉक्यूमेंट माना जाता है। क्योंकि ये सिर्फ कानून की किताब नहीं है। राजेंद्र बाबू की बात आज भी प्रासंगिक है। आज भी हमें देश के आम नागरिक को गंदगी, भूख, बीमारी और इंसाफ देना है। ये काम हर संस्था में संतुलन और संकल्प बनाकर पूरे किए जा सकते हैं।''

- ''सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- जब तक हम ऊंचे पदों पर करप्शन को खत्म नहीं करेंगे और बाकी बुरी चीजें खत्म नहीं करते तब तक जरूरी चीजों को लोगों तक नहीं पहुंचा सकेंगे। ये 14 अगस्त 1947 को कहा गया था। आज भी तो यही बातें सुन रहे हैं। तब जिम्मेदारी का भाव था।”

आज देश के लिए गोल्डन पीरियड

- “कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को मिलकर काम करना होगा। हमें कमजोरियां और शक्तियां पता हैं। ये समय देश के लिए गोल्डन पीरिएड है। दुनिया हमें आशाओं की नजर से देख रही है। आज हम ये महसूस भी कर रहे हैं। निश्चित तौर पर इसके पीछे सवासौ करोड़ भारतीयों की इच्छाशक्ति है। हम ये मानकर चलेंगे कि हमारे पास बहुत है। या आने वाले पीढ़ियों पर ये छोड़ देंगे तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। आने वाले पीढ़ियों के लिए काम छोड़ देने की सोच मरी हुई है। क्योंकि ये देश रहने वाला है। हम रहें या ना रहे। हम सुरक्षित और स्वाभिमानी भारत के लिए काम करें।''
- ''ईज ऑफ लिविंग के बारे में विचार करना जरूरी है। पासपोर्ट अब 2 या 3 दिन में मिल जाता है। पहले 2 या तीन महीने लगते थे। सिस्टम में तेजी आ रही है। ये सभी की जिंदगी को आसान बना रही है। सी और डी ग्रुप के इंटरव्यू खत्म कर दिए गए हैं। युवाओं को फायदा हो रहा है। अब अफसरों से अटैच्टेड कराना जरूरी नहीं रहा। हमारे देश में 27 हजार करोड़ रुपए पर किसी का क्लेम नहीं थे। भारत सरकार के पास पड़े थे। नौकरी करने वाला खर्च की वजह से क्लेम नहीं होता था। हमने यूएएन बनाकर इसे हल कर दिया है। अब कर्मचारी कितने भी शहर बदले उसका पैसा उसे मिल जाएगा।”

कानून में राजा की शक्ति है

- “वेद में कहा गया है कि कानून में राजा की शक्ति है। इसी मंत्र पर चलते हुए हमारी सरकार ने भी पुराने कानून खत्म किए, नए बनाए। ताकि ईज ऑफ लिविंग किया जा सके। हमने जीएसटी साकार किया। वन नेशन वन टैक्स आया। बिल्डरों की मनमानी रोकी गई। ताकि आम आदमी की दिक्कतों को कम किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी काले धन के खिलाफ एसआईटी नहीं बनी थी। हमने 3 दिन में ऐसा कर दिया। काले धन का हर लेन-देन कहीं ना कहीं किसी गरीब का हक छीनता है। हमने जनता की समस्याओं को समझते हुए फैसले किए। ईज ऑफ लिविंग की रैंकिंग पहले 142 थी अब हम 100 पर पहुंच गए हैं। हमारे ज्यूडिशियल सिस्टम ने भी बेहतर काम किया है।”

केंद्र और राज्यों के चुनाव साथ कराने की चर्चा

- ''आज कल चर्चा हो रही है कि केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ कराए जाएं। इससे काफी खर्च बचेगा। आचार संहिता के लागू हो जाने से काम रुक जाते हैं। कई देशों में चुनाव की तारीख तय होती है। हमारे देश में भी हो सकती है और देश हमेशा चुनावों के मोड में नहीं रहेगा। संविधान दिवस के मौके पर मैं आग्रह करता हूं कि देश इस चर्चा को आगे बढ़ाए।''
- ''ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा कि चुनाव के दौरान लागू होने वाली आचार संहिता किसी कानून ने नहीं बनाई है, बल्कि इसे पार्टियों ने खुद तय किया है। आज हमें ध्यान रखना होगा कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन बना रहे। तीनों संविधान की बैक बोन हैं। इमरजेंसी के दौरान इसे खत्म करने की कोशिश की गई।''

मेरा क्या और मुझे क्या को पीछे छोड़ना होगा

- “हम संविधान दिवस मना रहे हैं। आज जब हम न्यू इंडिया के सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे हैं। हमें जनता की आकांक्षाओं को पूरा करना है। दुनिया के लिए हम उम्मीदों का केंद्र हैं। ऐसे में हम सभी को मिलकर काम करना होगा। यहां सबकी राय का अपना महत्व है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इस तरह के संवाद जरूरी हैं। संवाद हमेशा जारी रहे। इस बारे में सोचा जाना चाहिए। समय की मांग है कि एक संस्था दूसरे की समस्याओं को समझें। देश की मानसिकता दो शब्दों में फंसी हुई है। ‘’मेरा क्या” और नहीं है तो “मुझे क्या”? इसी में अटके हुए हैं। इसे छोड़ना होगा। यह समय की मांग है। अधिकार के संघर्ष में कर्तव्य पीछे ना छूटे।”

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