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रसगुल्ले की खोज प. बंगाल में हुई थी, ओडिशा का इस स्वीट डिश पर दावा खारिज

रसगुल्ले की खोज कहां हुई? ये सवाल सबसे पहले 2011 में सियासी मुद्दा बना।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Nov 14, 2017, 04:28 PM IST

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    गलवार को रसगुल्ले का जीआई ( geographical indication) टैग पश्चिम बंगाल को मिल गया।
    कोलकाता.रसगुल्ले की खोज कहां हुई? इस पर दो राज्यों के बीच जंग अब थमती नजर आ रही है। मंगलवार को रसगुल्ले का जीआई ( geographical indication) टैग पश्चिम बंगाल को मिल गया। ओडिशा ने भी इस पर दावा किया था और पश्चिम बंगाल से उसकी जंग दो साल से चल रही थी। बता दें कि जीआई टैग वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन देता है। ममता बनर्जी ने राज्य के लोगों को इस कामयाबी पर बधाई दी है।

    मीठे पर जंग क्यों?

    - रसगुल्ले की खोज कहां हुई? ये सवाल सबसे पहले 2011 में सियासी मुद्दा बना। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी दूसरी बार सीएम बनीं। उन्होंने रसगुल्ले पर पश्चिम बंगाल का दावा करते हुए कहा कि इसकी खोज यहीं हुई। ममता ने इसके जीआई सर्टिफिकेशन के लिए अप्लाई किया।
    - ममता के बाद ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार सामने आई। उसने भी इसी सर्टिफिकेशन के लिए दावा कर दिया। ओडिशा सरकार का कहना है कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में लंबे वक्त से यह डिश भगवान को प्रसाद के तौर पर चढ़ाई जाती रही है। लिहाजा, यह माना जाना चाहिए कि इस डिश की खोज ओडिशा में हुई।
    - 2015 में दोनों राज्यों ने जीआई टैग हासिल करने के लिए वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन का रुख किया। अब फैसला पश्चिम बंगाल के फेवर में आया है।

    बंगाल ने क्या दावा किया था?

    - पश्चिम बंगाल का दावा है कि 1868 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के नोबिन चंद्रा दास ने रोसोगुल्ला (बांग्ला में यही नाम है) की खोज की थी। पश्चिम बंगाल में इस नाम से स्वीट्स चेन भी है।

    ममता ने दी बधाई

    - ममता बनर्जी फिलहाल ब्रिटेन के दौरे पर हैं। लंदन से किए गए ट्वीट में उन्होंने कहा- यह हम सभी के लिए मीठी खबर है। हम बहुत खुश हैं और खुद पर गर्व करते हैं कि बंगाल को रोसोगुल्ला के लिए जीआई स्टेटस मिल गया है।

    कोलंबस ऑफ रोसोगुल्ला

    - ममता सरकार ने जब रोसोगुल्ला के लिए जीआई सर्टिफिकेशन का दावा पेश किया तो इसके लिए सबूत भी पेश किए। दावा किया गया कि 1868 में पहली बार नोबिन चंद्र दास नाम के एक मिठाई बनाने वाले शख्स (हलवाई) ने रोसोगुल्ला बनाया था। आज पश्चिम बंगाल के हर त्योहार मेें इसका इस्तेमाल होता है।
    - इन्हीं नोबिन चंद्र दास को ‘कोलंबस ऑफ रोसोगुल्ला’ भी कहा जाता है। उनका जन्म 1845 में नॉर्थ कोलकाता में हुआ। उनके पिता शक्कर के कारोबारी थे। पिता की मौत के बाद परिवार गरीबी में जी रहा था।
    - नोबिन के एक रिश्तेदार कहते हैं- वो कई साल तक एक नई स्वीट डिश बनाने की कोशिश करते रहे। फिर छेना तैयार किया और इसके बाद रोसोगुल्ला। नोबिन के बेटे कृष्ण चंद्र ने पिता के रास्ते पर चलते हुए ‘रोसोमलाई’ या रसमलाई नाम की डिश तैयार की।
    - कोलकाता के 532 रबिंद्र सारनी में दास फैमिली रहती है। इसे रोसोगुल्ला भवन भी कहा जाता है।
    - पश्चिम बंगाल में जो भी सेलेब्रिटीज आए उन्हें रोसोगुल्ला का स्वाद खूब पसंद आया। इनमें फिदेल कास्त्रो से लेकर मैडोना के नाम शामिल हैं।
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    ममता ने एक ट्वीट में कहा- यह हम सभी के लिए मीठी खबर है। हम बहुत खुश हैं और खुद पर गर्व करते हैं कि बंगाल को रोसोगुल्ला के लिए जीआई स्टेटस मिल गया है। - फाइल
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