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अपने ही देश में 'गुलाम' बनकर जी रहे थे ये 155 लोग

यकीन नहीं होता आज के इंडिया में भी ये सब होता है। 31 बच्चे। 63 औरतें। 61 मर्द। कुल मिलाकर 155 भारतीय।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 17, 2018, 12:02 AM IST

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    स्पेशल डेस्क. यकीन नहीं होता आज के इंडिया में भी ये सब होता है। 31 बच्चे। 63 औरतें। 61 मर्द। कुल मिलाकर 155 भारतीय। अपने ही देश में गुलाम बनकर रह रहे थे। एक शैतान ने उन्हें कैद कर रखा था। सुबह सूरज उगने से लेकर देर शाम तक ये लोग काम करते। कोई आराम नहीं। काम के बीच अगर किसी से गलती हो जाए तो पिटाई भी होती थी। ये कहानी है तमिलनाडु की।


    कहां के रहने वाले हैं?

    ये लोग छत्तीसगढ़ और ओड़ीशा के हैं। इन्हें बिचौलियों ने ईंट भट्ठा चलाने वालों के हवाले कर दिया था। इन्हें पूरे हफ्ते काम करने के महज 200 रुपए दिए जाते थे। इतने पैसे में ये लोग ठीक से खाना तक नहीं खा पाते थे। खाना कम और काम ज्यादा। ऐसे में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो इन 200 रुपए में से भी काट लिये जाते थे। एक हजार ईंटे उठाने के लिए इन्हें महज 20 रुपए दिए जाते थे। इन्हें एकदम अमानवीय हालात में रखा गया था।

    इनसे क्या काम कराया जाता था?

    ये लोग तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में मिले। ये सभी एक ईंट भट्ठे पर काम कर रहे थे। इनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों जैसी थी। इंटरनेशनल जस्टिस मिशन ने सरकारी अफसरों के साथ मिलकर इन लोगों को छुड़ाया। अब धनबाद एक्सप्रेस से इन्हें घर भेजा जा रहा है। ईंट भट्ठा मालिक फरार है। आपको बता दें कि इस जिले में बंधुआ मजदूरी के खुलासे कई बार हो चुके हैं..2016 में इस जिले से 318 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाया जा चुका है।

    बंधुआ मजदूरी - आज के भारत की शर्मनाक सच्चाई

    इंटरनेशनल जस्टिस मिशन के मुताबिक आज भी देश में 1.2 करोड़ बंधुआ मजदूर हैं... ईंट भट्ठों, राइल मिलों, टेक्सटाइल इंडस्ट्री, पत्थर के खदानों, कंस्ट्रक्शन साइटों और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इनकी तादाद सबसे ज्यादा है। बंधुआ मजदूरों के साथ मारपीट, यौन उत्पीड़न जैसी बातें आम हैं।

    क्या है बंधुआ मजदूरी?

    किसी जरूरतमंद को थोड़े से पैसे दिए। उससे कहा कि तुम इन पैसों को काम करके चुका दो। लेकिन यहीं से जुल्म की कहानी शुरू हो जाती है। अक्सर पैसे लेने वाला शख्स अपने परिवार के साथ काम की जगह पर रहने लगता है। फिर उसे पता चलता है कि वो फंस गया है। कहीं आने जाने की छूट नहीं होती। पैसे इतने कम दिए जाते हैं कि उससे कर्ज चुकता करना तो दूर, गुजारा भी मुश्किल हो जाती है। उसे कोई और काम करके कर्ज चुकाने की भी इजाजत नहीं होती। ये लोग अक्सर अनपढ़ होते हैं, लिहाजा खाते में गड़बड़ी करके बताया जाता है कि कर्ज अभी चुकता नहीं हुआ, सो काम करते रहो। कई बार कर्जदार की पूरी जिन्दगी चंद पैसों को चुकाने में निकल जाती है। कई बार उसकी दूसरी पीढ़ी को भी कर्ज के बदले काम करना पड़ता है।

    बंधुआ मजदूरी पर क्या है कानून?

    आजादी से पहले अंग्रेजों ने इंडियन स्लेवरी एक्ट, 1843 लाकर बंधुआ मजदूरी को गैर कानूनी बनाया। आजादी के बाद संविधान की धाराओं 21 और 23 के तहत भी इसे अपराध माना गया। 1976 में बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) एक्ट के तहत इसे खत्म करने की कोशिश की गई । कांट्रैक्ट लेबर एक्ट एबोलिशन एक्ट 1970, इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन एक्ट, 1979 और न्यूनतम वेतन एक्ट 1948 के तहत भी ये गैरकानूनी है। इतना ही नहीं दूसरे राज्यों से काम करने के लिए लाए गए लोगों पर जुल्म होने पर मानव तस्करी का जार्ज भी लगता है। इतना सब होने के बावजूद देश में बंधुआ मजदूरी आज भी चल रही है।

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