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सम्मान से सबको मरने का हक, शर्तों के साथ सुप्रीम कोर्ट को इच्छा मृत्यु की इजाजत

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 09, 2018, 12:27 PM IST

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    स्पेशल डेस्क. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों को वसीयत के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का हक होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लिविंग विल पर भी मरीज के परिवार की इजाजत जरूरी होगी। साथ ही एक्सपर्ट डॉक्टर्स की टीम भी इजाजत देगी, जो यह तय करेगी कि मरीज का अब ठीक हो पाना नामुमकिन है।

    क्या है पैसिव यूथेनेसिया
    एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया में अंतर ये होता है कि एक्टिव में मरीज की मृत्यु के लिए कुछ किया जाए, जबकि पैसिव यूथेनेशिया में मरीज की जान बचाने के लिए कुछ ना किया जाए।

    लिविंग विल क्या है?
    - यह एक लिखित दस्तावेज होता है, जिसमें संबंधित शख्स यह बता सकेगा कि जब वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तब उसे जबरन लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर न रखा जाए।

    इच्छामृत्यु क्या है?
    - किसी गंभीर या लाइलाज बीमारी से पीड़ित शख्स को दर्द से निजात देने के लिए डॉक्टर की मदद से उसकी जिंदगी का अंत करना है। यह दो तरह की होती है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) और सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)।

    निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है?
    - अगर कोई लंबे समय से कोमा में है तो उसके परिवार वालों की इजाजत पर उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाना निष्क्रिय इच्छामृत्यु है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे इजाजत दी है।

    सक्रिय इच्छामृत्यु क्या है?
    - इसमें मरीज को जहर या पेनकिलर के इन्जेक्शन का ओवरडोज देकर मौत दी जाती है। इसे भारत समेत ज्यादातर देशों में अपराध माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूरी नहीं दी है।

    कॉन्स्टीट्यूशन बेंच में कैसे पहुंचा मामला?

    - 2014 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर अरुणा शानबाग मामले में 2011 में दिए गए फैसले को असंगत बताया था और यह मामला पांच जजों की बेंच के पास भेज दिया था। तब से यह पेंडिंग था।

    पिटीशन में कहा था- सम्मान से मरने का भी हक हो
    - एनजीओ कॉमन कॉज ने लिविंग विल का हक देने की मांग को लेकर 2005 में पिटीशन लगाई थी। इसमें कहा गया था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को लिविंग विल बनाने का हक होना चाहिए।

    क्या कहा चीफ जस्टिस ने?
    चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि हम ये देखेंगे कि इच्छामृत्यु में यानी इच्छामृत्यु के लिए वसीहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो, जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी हों। कोर्ट इस मामले में पर्याप्त सेफगार्ड देगा। इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

    केंद्र सरकार किस बात के खिलाफ थी?
    - केंद्र सरकार लिविंग विल के खिलाफ थी। वह अरुणा शानबाग मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर सक्रिय इच्छामृत्यु पर सहमति देने को तैयार थी।

    - उसका कहना था कि इसके लिए कुछ शर्तों के साथ ड्राफ्ट तैयार है। इसमें जिला और राज्य के मेडिकल बोर्ड सक्रिय इच्छामृत्यु पर फैसला करेंगे। लेकिन मरीज कहे कि वह मेडिकल सपोर्ट नहीं चाहता यह उसे मंजूर नहीं है।

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    सुप्रीम कोर्ट ने शानबाग मामले में क्या फैसला सुनाया था?

    अरुणा शानबाग का क्या मामला है?

    - अरुणा शानबाग के साथ 27 नवंबर 1973 में मुंबई के केईएम हॉस्पिटल में एक वार्ड ब्वॉय ने कथिततौर पर रेप किया था। हालांकि, उस पर यह आरोप साबित नहीं हुआ था।

    - उसने अरुणा के गले में जंजीर कस दी थी, जिससे वे कोमा में चली गई थीं। वे 42 साल तक कोमा में रहीं। उनकी 18 मई 2015 को मौत हो गई थी।

    - इससे पहले जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी ने शानबाग की हालत को देखते हुए 2011 में उनके लिए इच्छामृत्यु देने की मांग की थी और सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की थी।

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Web Title: Supreme Court Verdict On Right To Passive Euthanasia
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