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माथे पर तिलक लगाने के हैं कई फायदे, क्या आप जानते हैं?

तिलक लगाने के पीछे आध्यात्म‍िक भावना के साथ-साथ इसके वैज्ञानिक कारण भी है।

Danik Bhaskar | Mar 05, 2018, 12:50 PM IST

प्राचीन काल से ही मस्तक पर तिलक लगाने की परंपरा चली रही है। आमतौर पर चंदन, कुमकुम, मिट्टी, हल्दी, भस्म आदि का तिलक लगाने का विधान है। तिलक लगाने के पीछे आध्यात्म‍िक भावना के साथ-साथ इसके वैज्ञानिक कारण भी है। जानते हैं तिलक लगाने के फायदे।

1.मनोविज्ञानक दृष्टि से तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, इसलिए मध्य में तिलक लगाया जाता है। इससे व्यक्ति के आत्मविश्वास में इजाफा होता है।

2.माथे के बीच में तिलक लगाने से शांति और सुकून का अनुभव होता है। तिलक लगाने से मानसिक उत्तेजना पर भी काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। हल्दी में एंटी बैक्टीरियल

तत्व होते हैं, जो रोगों से मुक्ति दिलाने में हमारी मदद करते हैं।

3.यदि आप हर दिन चंदन का तिलक अपने माथे पर लगाते हैं तो दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे उदासी दूर होती है और मन में उत्साह जगता है। यह उत्साह मनुष्य को अच्छे कामों में लगाता है। इससे तनाव और सिरदर्द में काफी हद तक कमी आती है।

आगे जानिए कितने प्रकार के होते हैं तिलक...

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तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं।

शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है। 
शाक्त- शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
वैष्णव- वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।
विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है।
रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।
श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है।
अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।