दिल्ली का बॉस कौन है? चुनी हुई सरकार या उपराज्यपाल, कल आएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

4 वर्ष पहले
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- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- न एलजी सभी मामले राष्ट्रपति को भेज सकते, न दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल सकता

- पांच जजों की बेंच ने कहा- न किसी की तानाशाही होनी चाहिए, न अराजकता वाला रवैया होना चाहिए

- केजरीवाल सरकार ने उपराज्यपाल के पक्ष में आए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी

 

 

नई दिल्ली.  केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों के विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा- दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल स्वतंत्र फैसले नहीं ले सकते। उनकी भूमिका खलल डालने वाली नहीं होनी चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान बेंच ने यह भी कहा कि उपराज्यपाल न तो हर मामला राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं, न ही दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देती केजरीवाल सरकार की अर्जी पर यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा था कि दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया उपराज्यपाल ही हैं। कोई भी फैसला उनकी मंजूरी के बिना नहीं लिया जाए। अदालत के फैसले के कुछ ही घंटों के बाद दिल्ली सरकार ने नई व्यवस्था के तहत नौकरशाहों की ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार मुख्यमंत्री को सौंप दिए। इससे पहले ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए एलजी मंजूरी देते थे।

 

सुप्रीम कोर्ट ने पांच टिप्पणियां कीं

1) "तीन मुद्दों यानी जमीन से जुड़े मामले, कानून-व्यवस्था और पुलिस को छोड़कर दिल्ली सरकार के पास अन्य मुद्दों पर शासन करने की शक्ति है।"

2) "एलजी मंत्रिपरिषद की सहायता और उसकी राय पर काम करने के लिए बाध्य हैं। दोनों के बीच मतभेद हों तो मामला राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है, लेकिन वे ऐसा हर मामले में नहीं कर सकते।"

3) ''मंत्रिपरिषद को अपने फैसलों की जानकारी एलजी को देना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन पर एलजी की सहमति जरूरी है। न किसी की तानाशाही होनी चाहिए, न अराजकता वाला रवैया होना चाहिए।'' 

4) ''एलजी को मशीनी तरीके से काम करके मंत्रिपरिषद के हर फैसले पर रोक नहीं लगानी चाहिए।'' 

5) ''एलजी को यह समझना होगा कि मंत्रिपरिषद जनता के प्रति जवाबदेह है। एलजी के सीमित अधिकार हैं। वे अन्य राज्यों के राज्यपालों की ही तरह हैं।'' 

 

 

 

 

फैसले पर किसने क्या कहा?

 

A big victory for the people of Delhi...a big victory for democracy...

— Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) July 4, 2018

 

दिल्ली सरकार : उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा, "केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने दिल्ली की जनता को सुप्रीम बताया है।"

भाजपा : दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को आइना दिखा दिया। संविधान सहमत फैसले को उपराज्यपाल नहीं रोक सकते। लेकिन केजरीवाल के तानाशाही फैसले पर वे फैसला ले सकते हैं।"

कांग्रेस : दिल्ली के कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने सबकुछ साफ कर दिया है। केजरीवाल जी अब सिर्फ मांग नहीं कर सकते। आप हमेशा धरना नहीं दे सकते। दिल्ली के लिए समय निकालें और लोगों के लिए काम करें। 

 

संविधान बेंच ने की सुनवाई : दिल्ली सरकार की याचिकाओं पर सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने पिछले साल 2 नवंबर से सुनवाई शुरू की थी। महज 15 सुनवाई में पूरे मामले को सुनने के बाद 6 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। आप सरकार की ओर से पी चिदंबरम, गोपाल सुब्रमण्यम, राजीव धवन और इंदिरा जयसिंह जैसे वकीलों ने दलीलें रखीं। एक सुनवाई में कोर्ट ने कहा था, ''चुनी हुई सरकार के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए, नहीं तो वह काम नहीं कर पाएगी।'' वहीं, केंद्र और उपराज्यपाल की ओर से दलील दी गई थी कि दिल्ली एक राज्य नहीं है, इसलिए उपराज्यपाल को यहां विशेष अधिकार मिले हैं।

 

तीन साल से एलजी-केजरी में चल रही जंग: केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों की लड़ाई 2014 में तब शुरू हुई, जब अरविंद केजरीवाल ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल), यूपीए में तत्कालीन मंत्री वीरप्पा मोइली समेत अन्य के खिलाफ गैस के दाम तय करने को लेकर एफआईआर दर्ज कराई। इसी साल 8 मई को केंद्र ने दिल्ली के एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा केंद्रीय मंत्रियों की जांच का विरोध किया और कहा कि एसीबी के पास ये अधिकार नहीं हैं। एसीबी ने कोर्ट से कहा कि 23 जुलाई 2014 को केंद्र ने नोटिफिकेशन जारी करके केंद्रीय कर्मचारियों के मामले में जांच के अधिकार वापस ले लिए हैं। जिसके बाद दिल्ली सरकार ने कहा कि एसीबी आरआईएल और मंत्रियों की जांच कर सकती है। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी कहा कि एसीबी के पास उन पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार करने का अधिकार है, जो केंद्र के तहत आते हैं। इसके बाद एलजी द्वारा एसीबी में एमके मीणा की नियुक्ति के खिलाफ आप सरकार हाईकोर्ट गई। अप्रैल 2016 में आप सरकार ने हाईकोर्ट से कहा कि दिल्ली प्रशासन को लेकर एलजी के अधिकारों का मामला बड़ी बेंच को भेजा जाए। इसके बाद हाईकोर्ट ने अगस्त में आदेश दिया कि राष्ट्रीय राजधानी के एडमिनिस्ट्रेटिव हेड एलजी हैं और वे मंत्रियों की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी आप की उन 6 अपीलों पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जिसमें एलजी के दिल्ली के एडमिनिस्ट्रेटिव हेड होने को चुनौती दी  गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने ये याचिकाएं संवैधानिक बेंच को भेज दीं। 6 दिसंबर 2017 को बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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