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एक्सपर्ट्स बोले, बच्चों के लिए खतरनाक हैं इतने ज्यादा नंबर, इस अंधी होड़ में न भागें

CBSE एग्जाम में स्टूडेंट्स को इतने नंबर क्यों मिल रहे हैं? इससे पूरे एजुकेशन सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं।

Dainik Bhaskar

May 31, 2018, 02:16 PM IST
CBSE Results : Why students get too much marks?

नेशनल डेस्क। मंगलवार को CBSE के 10वीं बोर्ड के नतीजे आए। इनमें 1,31,493 स्टूडेंट्स को 90% से ज्यादा तो 27,476 स्टूडेंट्स को 95% से ज्यादा मार्क्स आए हैं। वहीं, रिजल्ट के तुरंत बाद उम्मीद से कम नंबर आने पर तीन बच्चों ने सुसाइड कर लिया।

आखिर सीबीएसई की एग्जाम में स्टूडेंट्स को इतने नंबर क्यों मिल रहे हैं? और नंबरों की इस अंधी दौड़ ने क्या बच्चों और पैरेंट्स पर एक्स्ट्रा प्रेशर नहीं डाल दिया? नंबरों की इस मार-काट वाली प्रतिस्पर्धा ने हमारे पूरे एजुकेशन सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर दिए है। इस सवाल को लेकर DainikBhaskar.com ने बात की सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली, एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर व शिक्षाविद् जेएस राजपूत, सीबीएसई में काउंसलर एंड साइकोलॉजिस्ट डॉ. शिखा रस्तोगी और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े अन्य जानकार लोगों और टीचर्स से।

नंबर्स की बाढ़ से बढ़ेंगी ये 3 प्रॉब्लम :

1.अनावश्यक प्रेशर बढ़ेगा : सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली कहते हैं कि नंबरों की यह दौड़ चिंताजनक है। बच्चों पर प्रीमियम परफॉर्मेंस के लिए जोर दिया जा रहा है। इससे न केवल बच्चों और पैरेंट्स पर प्रेशर बढ़ेगा, बल्कि जिन बच्चों के ज्यादा नंबर नहीं आएंगे या 70-75 फीसदी मार्क्स लाने वाले बच्चे अपने फ्यूचर को लेकर दुविधा में आ जाएंगे।

2.बढ़ेगा फ्रस्टेशन : एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर और शिक्षाविद् जेएस राजपूत एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि रिजल्ट डिक्लेयर होते ही एक बच्चा उनके पास आया। उसके 95 फीसदी मार्क्स थे। वह बहुत खुश था। लेकिन जब वह स्कूल गया तो वहां स्कूल मैनेजमेंट ने एक लिस्ट लगा रखी थी जिसमें उसका 47वां नंबर था। वह यह देखकर वह फ्रस्टेट हो गया। वे कहते हैं कि कम नंबर्स लाने वाले बच्चे तो फ्रस्टेट होंगे ही, जिन बच्चों के अधिक नंबर आए हैं, उन्हें भी भविष्य में दिक्कत हो सकती है। अब उनसे हमेशा बेहतर परफॉर्म करने की उम्मीद रहेगी। अगर वे फ्यूचर में अच्छा परफॉर्म नहीं करते हैं तो उनमें और ज्यादा फ्रस्टेशन आएगा। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसे बच्चे ज्यादा परेशान होंगे।

3.इमेजिनेशन के लिए जगह ही नहीं होगी: शिक्षा पर काम करने वाले बड़े एनजीओ में से एक एकलव्य के एक्स डायरेक्टर सुब्बू सी.एन. कहते हैं कि सीबीएसई की वैल्यूएशन की मौजूदा पूरी पद्धति ही ऑब्जेक्टिव टाइप है। सीबीएसई के इस सिस्टम में इमेजिनेशन और सोच-विचार के लिए जगह ही नहीं बचेगी। बिल्कुल टाइप्ड टैलेंट निकलकर आएगा जिसके पास इनोवेशन करने के लिए कुछ नहीं होगा।


तो ये हैं इसके 3 सॉल्यूशन :

1.अशोक गांगुली कहते हैं कि नंबर्स की इस स्फीति (Marks Inflation) को कंट्रोल करना चाहिए, क्योंकि यह फ्यूचर के लिए हेल्दी ट्रेंड नहीं है। जिनके ज्यादा नंबर्स नहीं आ पाते हैं, उनकी प्रॉपर काउंसिलिंग करके बताना चाहिए कि कम नंबर्स के बावजूद वे कैसे मीनिंगफुल लाइफ जी सकते हैं।


2.जेएस राजपूत कहते हैं कि हमें ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए जिसमें टैलेंट का पैमाना केवल नंबर नहीं हो। बच्चों की प्रतिभा को सही ढंग से आंकने के लिए हमें एक प्रॉपर सिस्टम बनाना होगा।


3.डॉ. शिखा रस्तोगी (सीबीएसई में काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट) कहती हैं कि पैरेंट्स की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे नंबर्स को लेकर पैनिक होने के बजाय बच्चों को केवल अच्छी स्टडी करने को मोटिवेट करें। बच्चों में यह विश्वास जगाएं कि कम नंबर्स आने के बावजूद वे उनके साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे, क्योंकि जिंदगी नंबर्स से नहीं चलती।

आगे की स्लाइड में जानिए, ऐसा क्या है सीबीएसई एग्जाम का पैटर्न कि आ रहे हैं ज्यादा नंबर्स…

CBSE Results : Why students get too much marks?

क्यों आ रहे हैं इतने ज्यादा मार्क्स?



इस संबंध में DainikBhaskar.com ने बात की डीपीएस स्कूल भोपाल में सीनियर टीचर और फिजिक्स विभाग के इंचार्ज हेमंत पाटीदार से। 

 

क्योश्चन ही स्पेसिफिक होते हैं :
अब सवाल बहुत ही स्पेसिफिक पूछे जाने लगे हैं। इसलिए जवाब भी स्पेसिफिक होते हैं। जवाब स्पेसिफिक होने से इवैल्यूएटर के लिए मार्किंग आसान हो जाती है। अगर जवाब सही हैं तो पूरे नंबर मिल जाते हैं और गलत है तो पूरे नंबर कट जाते हैं। उदाहरण के लिए, पहले इस तरह के सवाल पूछे जाते थे : दिल्ली के बारे क्या जानते हो, विस्तार से बताइए। अब इस तरह से सवाल पूछे जाते हैं : दिल्ली की स्थापना कब हुई थी? स्थापना किसने की थी? आदि।  इसका मतलब यह है कि अगर बच्चा एक लाइन भी सही लिख देता है तो उसका पूरा जवाब सही हो जाता है। जबकि डिस्क्रिप्टिव या सब्जेक्टिव में बहुत अच्छा जवाब लिखने वाले को भी 6 या 7 नंबर ही मिल पाते थे।

 

टीचर्स और पैरेंट्स ज्यादा फोकस हैं:

सीबीएसई बोर्ड के सिलेबस ज्यादातर प्राइवेट स्कूल्स में रन होते हैं। प्राइवेट स्कूल्स इस बात पर फोकस होते हैं कि उनका रिजल्ट बेहतर से बेहतर हो। प्राइवेट स्कूल्स में टीचर्स को स्टूडेंट्स के परफॉर्मेंस के लिए टारगेट दिया जाता है। इस वजह से टीचर्स से लेकर पैरेंट्स तक सभी फोकस्ड होते हैं।  

 

अब ज्यादा मार्क्स के अलावा कोई ऑप्शन नहीं 
सोसाइटी का एनवायरमेंट कॉम्पिटिटिव हो गया है। स्टूडेंट्स को पता होता है कि कम मार्क्स से अच्छा फ्यूचर नहीं बनाया जा सकता। इसलिए वे ज्यादा मार्क्स के लिए ज्यादा मेहनत करते हैं।  

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