नीरज जी कहते थे-इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में

4 वर्ष पहले
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जीवन कटना था, कट गया 
अच्छा कटा, बुरा कटा 
यह तुम जानो 
मैं तो यह समझता हूं... 

 

नई दिल्ली. महाकवि गोपाल दास नीरज नहीं रहे। वे देह त्यागकर गीत छोड़ गए हैं। नीरज, जीवन के दर्शन के रचनाकार थे। नीरज साहित्य की एक लंबी यात्रा के पथिक रहे। गीत, कविता, दोहे और शेर, उनकी कलम हर जगह चली। मंचीय कविता के कवि के रूप में नीरज को जितनी लोकप्रियता मिली, उतनी शायद ही किसी कवि को मिली। करीब 50 साल तक वे सक्रिय लेखनी और मंच से जुड़े रहे। 90 की उम्र में भी वह मंच पर कविता और गीत पढ़ते रहे। फिल्मों में जीवन रास नहीं आया, तो मुंबई से लौट आए, पर गीत लिखते रहे। देश की जानी-मानी हस्तियों ने उनके साथ बिताए लम्हे साझा किए।

 

काशीनाथ सिंह (बनारस से) ने भास्कर को बताया, '1959 या 60 की बात होगी। मैं विद्यार्थी था उन दिनों। नीरज काशी हिंदू विश्वविद्यालय आए थे। एमफी थिएटर का मैदान ठसाठस भरा था। अंत में नीरज को बुलाया गया, क्योंकि श्रोता उन्हीं के लिए बैठे थे। माइक के सामने जाते ही चारों ओर से आवाज उठी- 'कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे...' और उन्होंने सुनाया भी। फिर तो फरमाइश पर सुनाते रहे। आधी रात के बाद तक। नीरज कवि सम्मेलन की शोभा, गाैरव और परंपरा थे। अगर मुशायरे के समानांतर कवि सम्मेलन प्रतिष्ठित हुआ, सम्मानित हुआ और गंभीरता से लिया जाने लगा तो श्रेय नीरज को है। उस वक्त मुशायरा ज्यादा मशहूर हुआ करता था। क्योंकि उसके कई दिग्गज थे। कैफी आजमी, वामिक जौनपुरी, सरदार जाफरी। और भी बहुत सारे। नीरज ने अकेले उनके समानांतर कवि सम्मेलन को प्रतिष्ठित किया। वो कारवां थे, जो गुजर गया। नीरज खुद में कारवां थे।'

 

गद्य कविताओं के खिलाफ थे नीरज : काशीनाथ ने कहा, 'उस वक्त जो गद्य कविताएं लिखी जा रही थीं, नीरज उनके खिलाफ थे। आम लोगों के बीच गीतों के माध्यम से साहित्य को लोकप्रिय बनाया उन्होंने। उनकी वजह से स्थिति ये हो गई कि जनसाधारण में धारणा बनी कि जो गाया जाए वह गीत है और वही कविता है। क्या अंदाज था उनका गाने का। उनके स्वर ने उनके गीतों को कविता नहीं होने दिया। उन्हें गीतकार के ही रूप में जाना गया, कवि के रूप में नहीं। जबकि गीतों में वे कवि थे। वे हिंदी गीतों के इतिहास पुरुष थे। वे घर बैठ गए और कवि सम्मेलन खत्म हो गए। काव्य गोष्ठियां अब भी हुआ करती हैं। पर मिलन के नाम पर सिर्फ खानापूरी होती है। गंभीरता से गीत सुनाने वाले लोग नहीं रहे। मैंने उन्हें मंचों से सुना है। यानी मैं उनका श्रोता रहा हूं। कविताएं तो कवि लोग लिखते थे, पर गीतों को समृद्ध करने और आम जनता तक पहुंचाने का काम नीरजजी ने किया था। यह जरूर है कि कवि सम्मेलनों में लोकप्रिय होने के कारण उनके गीतों का सही मूल्यांकन आज तक नहीं हुआ है। वे सिर्फ दुख-दर्द और मिलन के गीतकार नहीं थे। उनके गीतों में आम लोगों की पीड़ाएं भी हैं, वंचितों के प्रति हमदर्दी भी है। उनके स्वर ने इन्हें अनदेखा कर दिया।'

 

इतिहासकार एस इरफान हबीब ने बताया, 'नीरज जी कहा करते थे- इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में। न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।'

 

गीतकार मनोज मुंताशिर ने कहा, 'आदमी को आदमी बनाने के लिए, जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए... और लिखने को कहानी प्यार की, स्याही नहीं आंखों वाला पानी चाहिए।' ये आंखों वाला पानी समेटकर नीरज जी चले गए।'

 

गीतकार प्रसून जोशी बोले, 'युग के महान कवि नीरज के निधन का समाचार अत्यंत ही दुखद है। मैं भाग्यशाली था कि उनका स्नेह और आशीर्वाद मुझे मिला। कवि होना भाग्य है, नीरज होना सौभाग्य।' 

 

गायिका लता मंगेशकर ने कहा, 'महान लोकप्रिय कवि गोपालदास नीरज जी के स्वर्गवास की वार्ता सुनकर मैं अत्यंत व्यथित हूं। ये मेरा भाग्य है की मुझे उनके लिखे कई गीत गाने का मौका मिला। मेरी उनको विनम्र श्रद्धांजलि।'

 

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कुमार विश्वास ने कहा, मैं उन्हें गीत-गन्धर्व कहता था: 'राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें हिंदी की वीणा कहा था, वाचिक परंपरा के वे एक ऐसे सेतु थे जिस पर चलकर, महाप्राण निराला, पंत, महादेवी, बच्चन, दिनकर की पीढ़ी के श्रोता मुझ जैसे नवांकुरों तक पहुंच सके। मैं उन्हें 'गीत-गन्धर्व' कहता था। जैसे किसी सात्विक उलाहने से स्वर्ग से धरा पर उतरा कोई यक्ष हो।'

 

मुनव्वर राना ने बताया, मैंने तहजीब, शराफत उन्हीं से सीखी: 'वे हिंदी और उर्दू के बीच एक पुल का काम करते थे। मुझमें जो भी थोड़ी सी तहजीब और शराफत है, वो मैंने गोपालदास नीरज से सीखी। मैं उनसे उम्र में बहुत छोटा हूं, फिर भी वे मुझसे भाई या आप कहकर ही बात करते थे। मुरादाबाद के एक कवि सम्मेलन में तीन-चार बड़े कवि शामिल हुए थे।'

 

जब देवानंद ने उन्हें एसडी बर्मन से मिलाया : देवानंद ने नीरज को मुंबई में एक कवि सम्मेलन में सुना था। उन्होंने उनसे कहा कि हम कभी साथ में काम करेंगे। फिर देवानंद ने उन्हें मुंबई बुलाया। मुंबई आए तो देवानंद उन्हें म्यूजिक डायरेक्टर एसडी बर्मन के पास ले गए। बर्मन ने कहा कि वे रंगीला शब्द से एक गाना चाहते हैं। इस तरह नीरज ने 'रंगीला रे तेरे रंग में...' बनाया।

 

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