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एससी-एसटी एक्ट: पुराने प्रावधान बरकरार रखने के लिए अध्यादेश लाने पर विचार कर रही सरकार

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में प्रदर्शन के दौरान 10 से ज्यादा राज्यों में हिंसा हुई और 15 लोगों की मौत हो गई थी।

Dainik Bhaskar

Apr 15, 2018, 02:31 PM IST
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले को लेकर याचिका दायर की थी। -फाइल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले को लेकर याचिका दायर की थी। -फाइल

नई दिल्ली. एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को बदलने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश के दलित संगठनों में नाराजगी है। संगठनों के आक्रोश को लेकर सरकार चिंतित है। ऐसे में सरकार अध्यादेश या विधेयक के जरिए पुराने प्रावधानों को बरकरार रखने के विकल्प पर विचार कर रही है। न्यूज एजेंसी को सूत्रों ने बताया कि आगामी मानसून सत्र में इन विकल्पों में से किसी एक पर सरकार अमल कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के गिरफ्तारी समेत कुछ प्रावधानों में बदलाव किया था। इसके विरोध में 2 अप्रैल को भारत बंद बुलाया गया था। प्रदर्शन के दौरान 10 से ज्यादा राज्यों में हिंसा हुई थी और 15 लोगों की मौत हो गई थी।

सरकार मानसून सत्र में ला सकती है बिल

- न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि सरकार पूरे देश के दलितों के गुस्से को ठंडा करने के लिए जुलाई में शुरू होने वाले मानसून सत्र में एससी/एसटी एक्ट, 1989 में संशोधन का बिल ला सकती है। हालांकि, प्रावधानों में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को उलट देने का यह दूसरा विकल्प होगा है।
- वहीं, एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "अगर अध्यादेश आता है तो उसे बिल में परिवर्तित करके सदन में पारित कराना होगा। मूल प्रावधानों को बरकरार रखने के लिए दोनों ही प्रक्रियाओं का नतीजा एक जैसा होगा। हालांकि, अध्यादेश के जरिए तुरंत नतीजे हासिल किए जा सकेंगे और लोगों का गुस्सा ठंडा करने में मदद मिलेगी।"

दूसरे विकल्पों पर विचार क्यों?

- सूत्रों ने कहा, "अभी ये फैसला नहीं लिया गया है कि पुराने प्रावधानों को बरकरार रखने के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी। सरकार का कदम सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सामाजिक न्याय मंत्रालय की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई और इसके नतीजों पर टिका है। हो सकता है कि पुनर्विचार याचिका के जरिए तुरंत नतीजे ना हासिल हों, हो सकता है कि अदालत का फैसला पक्ष में ना आए। इसके बाद सरकार इस मसले पर ठोस कदम उठाने पर विचार करेगी।"

कानून प्रभावित नहीं हाेने देंगे: मोदी
- नरेंद्र मोदी ने 13 अप्रैल को कहा था, "मैं देश को विश्वास दिलाता हूं कि जो कड़ा कानून हमारे द्वारा बनाया गया है, उसे प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।''

- केंद्र सरकार ने भी कहा था, "सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जो फैसला दिया, उससे देशभर में लोगों के बीच हलचल, गुस्सा और असहजता बढ़ी है। इसके अलावा कोर्ट के आदेश से जो भ्रम की स्थिति पैदा हुई है, उसे ठीक करने के लिए फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।"

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को फैसले में क्या कहा था

- सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के साथ आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत मिले। पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए। सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती।

क्यों फैसले का विरोध शुरू हुआ, सरकार ने क्या किया
- इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और विपक्ष ने केंद्र से रुख स्पष्ट करने को कहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की।

- दलित संगठनों का तर्क है कि 1989 का एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस एक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है।

प्रावधानों में बदलाव को लेकर सुप्रीम के फैसले का पूरे देश में दलित संगठनों ने विरोध किया। -फाइल प्रावधानों में बदलाव को लेकर सुप्रीम के फैसले का पूरे देश में दलित संगठनों ने विरोध किया। -फाइल
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले को लेकर याचिका दायर की थी। -फाइलकेंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले को लेकर याचिका दायर की थी। -फाइल
प्रावधानों में बदलाव को लेकर सुप्रीम के फैसले का पूरे देश में दलित संगठनों ने विरोध किया। -फाइलप्रावधानों में बदलाव को लेकर सुप्रीम के फैसले का पूरे देश में दलित संगठनों ने विरोध किया। -फाइल
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