असम के चाय बागान : ‘जो भी यहां आता है, वो यहीं दफन हो जाता है’

3 वर्ष पहले
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मालिकों की मौज

-2017-18 में रिकॉर्ड 26.66 करोड़ किलो चाय एक्सपोर्ट कर 5064 करोड़ रुपए का कारोबार किया। चाय का उत्पादन और खेती की जमीन बढ़ी है।

मजदूरों की मजबूरी

- 41 साल काम करने के बाद एक मजदूर का वेतन 137 रु. प्रति दिन पहुंचा। यहां मजदूरों को प्रति माह पीएफ कटने के बाद करीब 2500 रु. ही मिलते हैं।

 

असम. हम खड़े हैं गुवाहाटी से 280 किलोमीटर दूर गोलाघाट जिले में। हल्की धूप, 31 डिग्री तापमान के बीच बूंदें बरसती हैं और बागानों में चाय की पत्तियां तोड़ने में जुटे महिला और पुरुष मजदूरों के हाथ तेजी से चलने लगते हैं। वे अपनी पीठ पर लगी टोकरी को अधिक से अधिक भर लेना चाहते हैं। इसके बावजूद 8 घंटे में वे 25 किलो पत्तियां नहीं तोड़ पाते। उन्हें दो घंटे ज्यादा काम करना पड़ रहा है ताकि पूरे दिन का पारिश्रमिक 137 रुपए मिल सकें।

भास्कर से बातचीत में बागान मजदूर कहते हैं कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो भी इन चाय बागानों में आता है उसका जीवन यहीं बीत जाता है और यहीं दफन भी हो जाता है। धूप, बारिश और गर्मी में 30 दिनों के काम के बाद उनका पारिश्रमिक 2880 रु. हो रहा है, लेकिन पीएफ के 400 रु. की कटौती के बाद 2480 रुपए उन्हें घर चलाने के लिए मिल रहे हैं। इतने रुपए भी इसी साल से मिलने लगे। 

 

पारिश्रमिक बढ़ाने का छलावा: मजदूरों की यह कहानी नई नहीं है, बरसों से ऐसी ही है। रिकॉर्ड बताते हैं, इतने ही काम के 2012 में 84 रुपए रोजाना दिए जा रहे थे। 2013 में पारिश्रमिक बढ़ा, लेकिन महज 5 रुपए। मजदूरों का रोजाना पारिश्रमिक 89 रुपए हो गया। 2014 में फिर से पारिश्रमिक बढ़ाने का छलावा किया गया। इस बार भी राशि की बढ़ोतरी के लिए पहले से चली आ रही प्रक्रिया अपनाई गई। असम के 74 बागान गोलाघाट जिले में हैं। असम की 2.33 लाख हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती होती है। असम विश्व चाय बाजार की करीब 22% जरूरतों को पूरा करता है। यहां के बागानों में करीब 8 लाख मजदूर काम करते हैं। इनमें भी 57% यानी 4.56 लाख महिलाएं हैं। बगानों की मालिकों के पांच संगठन नॉर्थ ईस्ट टी एसोसिएशन, टी-एसोसिएशन ऑफ इंडिया, असम टी प्लांटेशन एसोसिएशन, भारतीय चा परिषद और इंडिया टी-एसोसिएशन के साथ सीसीपीए ने मिलकर फिर से मजूदरों के दैनिक वेतन में 5 रु. बढ़ाकर रोजाना 94 रु. कर दिए।

 

असम के चाय बागान : ‘जो भी यहां आता है... 2015 में 11 रुपए रोजाना मजदूरी बढ़ा दी गई। इस बार मजदूरों का रोजाना वेतन 115 रुपए हो गया। 2016 में फिर 11 रुपए बढ़े और दैनिक वेतन 126 रुपए पहुंच गया। इस 2017 में भी 11 रुपए बढ़ाए और अब मजदूरों को रोजाना 137 रुपए मिल रहे हैं। चाय बागानों में काम कर मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए 60 साल पुराना असम चाह मजदूर संघ (एसीएमएस) भी काम नहीं कर पा रहा। 1958 में अस्तित्व में आए संघ ने 2009 तक 3.25 लाख मजदूरों को सदस्य बनाया। इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस से एफिलिएटेड यह संघ राज्य व केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी मजदूरों को हक नहीं दिला सका। 49 साल पहले बने भारतीय चाह मजदूर संघ (बीएसएमएस) ने भी पूरे असम में 2 लाख मजदूरों को अपना सदस्य बनाया, लेकिन उन्हें सम्मानजनक मानदेय नहीं दिला सके।

 

पूरे देश में चाय का रकबा बढ़ रहा है, उत्पादन भी बढ़ रहा है रकबा: देश में चाय की खेती का रकबा तीन साल में 10814 हेक्टेयर बढ़ गया। साउथ इंडिया में 6029 हेक्टेयर जमीन पर खेती बंद हुई। इसके बावजूद देश के कुल चाय के रकबे में बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2013 में नॉर्थ इंडिया के संगठित क्षेत्र में असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, बिहार, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और उत्तराखंड में 884 बागान मालिक 4,59,815 हेक्टेयर जमीन पर 1226 चाय बागान चला रहे थे। 2016 में इस रकबे में 16843 हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई और 476658 हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती हुई। हालांकि 2013 में साउथ इंडिया के संगठित क्षेत्र में तमिलनाडू, केरल, कर्नाटक में 169 बागान मालिक 106848 हेक्टेयर जमीन पर 246 चाय बागान चला रहे थे। 2016 में इसमें 6029 हेक्टेयर जमीन पर खेती नहीं हुई। इसका रकबा घटा। आंकड़े बताते हैं, 2013 में नॉर्थ और साउथ इंडिया में 566663 हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती होती थी। 2016 में यह रकबा बढ़कर 577477 हेक्टेयर हो गया।
उत्पादन में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी: नॉर्थ ईस्ट टी एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में पूरे देश में 123.3 करोड़ किलो चाय का उत्पादन था। 2016-17 में यह बढ़कर 125.49 करोड़ किलो हो गया। 2017-18 में रिकॉर्ड उत्पादन 132.5 करोड़ किलो में अब तक रिकॉर्ड 25.657 करोड़ किलो चाय एक्सपोर्ट कर 5064.88 करोड़ रुपए का कारोबार किया।

 

 

 

घर की स्थिति: दरक गई दीवारें, कभी भी घर बन सकता है कब्रिस्तान

वेणु तांती 61 साल के हैं। 20 साल की उम्र में उन्होंने 1977 में इस चाय बागान में नौकरी शुरू की। 41 साल पहले 1.80 रुपए रोजाना मजदूरी मिलती थी। इस पैसे से 8 सदस्यों वाले परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। पैसे की तंगी से उनकी परवरिश वैसे नहीं कर सके कि बच्चों को चाय बागान के अलावा कहीं और रोजगार दिला सके। जनवरी-2018 में बागान की डिस्पेंसरी से गार्ड के पद से रिटायर हुए तो उनका रोजाना पारिश्रमिक 137 रुपए हुआ। वेणू को रहने के लिए चार कमरों वाला एक मकान दिया। ब्रिटिश जमाने में बनी यह इमारत किसी खंडहर से कम नहीं है। किसी भी समय दीवारें टूट सकती हैं और पूरा घर कब्रिस्तान में तब्दील हो सकता है।

 

 

स्वास्थ्य के हालात: रसायन ने मद्धिम कर दी इनकी आंख की रोशनी

प्रिया 32 साल की हैं। 1946 से चल रहे इस बागान में वह तीन साल पहले आईं। बाग से पत्तियां तोड़ना और बागों में चाय के पौधों पर कीटनाशक का छिड़काव करना उनका काम है। यह उनकी सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। एक्ट कहता है, मास्क, ग्लव्स, आंखों की सुरक्षा के लिए संसाधन चाय बागान मालिक देंगे। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। प्रिया कहती हंै, डेढ़ साल पहले चाय के पौधों में पहली बार उसे एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम) के छिड़काव का काम मिला। बिना संसाधन छिड़काव तो किया, लेकिन उनकी हथेली की चमड़ी में अजीब तरह की बीमारी हो गई। आंख की रोशनी धीमी पड़ गई, उधार लेकर इलाज कराया।

 

परिवार का दर्द: तकलीफ तब ज्यादा होती है, जब बच्चों के खिलौने भी नहीं खरीद पाता

ये कहानी सूरज पात्रे की है। पहले उनके पिता इस बागान में काम करते थे। अब 17 साल से सूरज काम कर रहे हैं। सूरज की वृद्ध मां, पत्नी और तीन बच्चों के रहने के लिए प्रबंधन ने जमीन दे दी। लेकिन कंपनी ने सीधा कह दिया, घर खुद बना लो। सूरज ने मिट्टी, बांस-बल्ली के तीन कमरे बनाए। छत पर टिन शेड डाला है। सूरज ने टूटी हिन्दी और असमी भाषा को मिक्स कर कहा, चाय बागानों की दुनिया ही अलग है। एक बार पूरे खानदान से कोई एक भी इस बागान में आ गया तो उसकी कई पीढ़ियां इसी बागान में सांस लेती हैं। काम करती हैं और फिर इसी मिट्टी में दफन हो जाती हैं। वे बाहर नहीं निकल पातीं। मेरे पापा के बाद मैंने काम शुरू किया। मेरा बेटा भी इसी बागान में काम करेगा। हम कहीं जाते हैं और वहां दुकानों पर खिलौने देखता हूं तो मेरा भी मन करता है अपने बेटे के लिए खरीदूं। लेकिन ये खिलौने मुझसे बहुत दूर हैं।

 

 

पढ़ाई की परेशानी: बागान ही हमारा घर है, वर्तमान और भविष्य भी

देव दीप एक चाय बागान में मजदूरों के सरदार हैं। 1991 से काम कर रहे हैं। उनकी पत्नी पार्वती चाय की पत्तियां तोड़ती हैं और देव मजदूरों को गाइड करते हैं। बदले में देव को हर माह 4150 और पार्वती को 2440 रु. मिलते हैं। बागान में स्कूल है। यहां हायर सेकंडरी तक की पढ़ाई होती है। कॉलेज नहीं है। उनके दो बेटे 9वीं में इसी स्कूल में पढ़ रहे हैं। एक बड़ी बेटी है, उसने हायर सेकंडरी की परीक्षा पास कर ली। गोलाघाट से करीब 20 किलोमीटर दूर इस क्षेत्र में एक भी कॉलेज नहीं है। इसलिए देव ने बेटी की पढ़ाई बंद करवा दी। बेटी पढ़ना चाहती है, लेकिन रोजाना बेटी के गोलाघाट आने-जाने का खर्च परिवार नहीं उठा पा रहा। देव कहते हैं, पढ़ाकर भी क्या करूंगा? किसी मजदूर से ही ब्याही जाएगी। बागान ही हमारा घर है, वर्तमान और भविष्य भी।

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